प्रेमचंद : ‘सद्गति’ से हुई देश की दुर्गति

“सद्गति” मुंशी प्रेमचंद जी की सर्वश्रेष्ठ कहानियों में से एक है। इस कहानी में उन्होंने एक ब्राह्मण “घासीराम” द्वारा एक चमार “दुखी” पर धर्म के नाम पर किये गए अत्याचार को दिखाया है।

दुखी अपनी बेटी की सगाई के लिए पण्डित जी से सगुन विचार करवाना चाहता है। उसके मन में पण्डित जी और उनकी श्रेष्ठ जाति के प्रति अगाध श्रद्धा और दिव्यता का भाव है। पण्डित जी सगुन विचार के लिए तैयार तो हो जाते हैं पर उससे पहले दुखी चमार से खूब बेगार काम करवाते हैं। बेचारा दुखी का घास काटने का काम था उसे कठोर लकड़ी फाड़ने का अनुभव नहीं था, पर पण्डित जी उससे जबर्दस्ती लकड़ी फड़वाते हैं।

दुखी सुबह से बिना कुछ खाये भूखे पेट काम कर रहा है। उसने सोचा थोड़ा चिलम पी लूँ तो ताकत मिल जाये। चिलम के लिए उसके पास आग नहीं थी तो वो पण्डित जी से घर में आग माँगने घुस गया। पण्डिताइन इससे खूब नाराज़ हुईं और चिमटे से आग दुखी की तरफ फेंका।

दुखी पड़ाइन माता के सम्मान में अपना माथा जमीन पर टेके हुए था, जिस कारण आग उसके माथे से सट गयी और उसका सर जल गया। इसके बाद भी दुखी नाराज नहीं होता बल्कि यही सोचता है कि देखो मैं पण्डित जी के घर में घुसकर जो उसे अपवित्र किया, भगवान ने उसका तत्काल फल दे दिया।

पण्डित जी दिन में खाना खाकर सो जाते हैं, लेकिन दुखी से खाना के लिए पूछते तक नहीं हैं। दुखी खाली पेट सुबह से शाम तक काम करते-करते थकान, भूख, कमजोरी से चक्कर खाकर गिर के मर जाता है। पण्डित और पण्डिताइन उस बेचारे अभागे चमार के लाश के ऊपर भी दया नहीं करते हैं और उसके साथ बेरहमी से पेश आते हैं। प्रेमचंद जी पण्डित और पण्डिताइन सहित गाँव के सभी ब्राह्मणों को गरीब और पिछड़ी जातियों के प्रति असंवेदनशील साबित करने में पूरी तरह सफल रहे हैं।

प्रेमचंद जी यही साबित करना चाह रहे हैं कि इस दुखी चमार का शोषण ब्राह्मण कर रहा है और इसे अपने शोषण का पता तक नहीं है। इसमें वर्ग चेतना का अभाव है। लेकिन उसी गाँव का गोंड़ जिसमें थोड़ी वर्ग चेतना है वो इसकी लकड़ी फाड़ने में भी मदद करता है और इसके मर जाने पर गाँव के लोगों को दुखी चमार के लाश को ब्राह्मण के दरवाजे से नहीं उठाने की अपील करता है। वो पुलिस से इसकी मृत्यु की जाँच करवाने के लिए गाँव वालों को तैयार करता है।

लेकिन सवाल है कि ऐसे ब्राह्मण हैं कहाँ? मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी में आजतक एक भी ऐसा दुष्ट ब्राह्मण नहीं देखा जो किसी गरीब को बेगार कराके जान ले ले। मैं ये बिलकुल नहीं कहना चाह रहा हूँ कि इस देश में दलितों पर अत्याचार नहीं हुआ है। लेकिन प्रेमचंद का वर्णन अतिशयोक्तिपूर्ण और उस समय के वामपंथ आन्दोलन से प्रभावित है। सज्जाद ज़हीर की प्रेरणा से भारत में लखनऊ में 1936 में पहली बार “प्रगतिशील लेखक संघ” का अधिवेशन हुआ, जिसकी अध्यक्षता प्रेमचंद ने ही की थी। ये साहित्यिक जगत में वामपंथ के प्रादुर्भाव का आगाज़ था। यही वो समय है जब साहित्य में प्रगतिवाद का आरम्भ हुआ, जिसकी सुगबुगाहट कुछ वर्ष पहले से ही अनेकों रचनाओं में दृष्टिगोचर होने लगी थी।

मेरी बातों पर यकीन मत कीजिए। आप खुद इस कहानी को एकबार मेरी इस समीक्षा को पढ़ने के बाद पढ़िये। आपको समझ में आ जायेगा कि ये हिन्दुओं को दलितों से अलग बताने की साजिश आज की नहीं है। इसकी शुरुआत प्रेमचंद जैसे लेखकों की रचना में आज से अस्सी साल पहले दिखने लगे थे। इसी कहानी में दुखी चमार के पण्डित जी के घर में गलती से कदम रख देने पर, पण्डिताइन गुस्से में कहती है कि – “चमार हो, धोबी हो, पासी हो, मुँह उठाये घर में चला आये। हिन्दू का घर न हुआ, कोई सराय हुई।” ये पण्डिताइन के मुख से प्रेमचंद बोल रहे हैं। यहाँ स्पष्ट दिख रहा है कि प्रेमचंद हिन्दुओं और दलितों को अलग बता रहे हैं।

जिस प्रेमचंद को महानायक बनाकर हमलोगों ने पूजा की, उसी ने बाद के उग्र दलित साहित्यकारों और वामपंथियों को भरपूर विनाशकारी कंटेंट उपलब्ध करा दिये थे जिसकी मदद से वे आज देश को इस अराजक स्थिति में पहुँचा चुके हैं। स्वतंत्र भारत के साहित्य से लेकर फिल्मों तक जो वामपंथियों का कब्ज़ा है उसकी गहराई में आधारस्तम्भ प्रेमचंद जैसे लेखक हैं।

हर समस्या की शुरूआत पंडित जवाहर लाल नेहरू से देखने के ट्रेंड में ये असली गुनाहगार बचकर निकल जा रहे हैं। बेशक नेहरू ने इन विचारों को प्रमोट किया, इसके वाहक बने, लेकिन बौद्धिक और वैचारिक कंटेंट ऐसे लेखकों ने बहुत पहले से ही प्रोवाइड करना शुरू कर दिया था।

क्यों प्रेमचंद लोकप्रिय थे, लोकप्रिय हैं और लोकप्रिय रहेंगे

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