टैक्स को जीवन का अनिवार्य अंग बना कर, सर गर्व से ऊंचा करके कब दिखाएँगे हम!

मैं अभी जून में बिजली फिटिंग का सामान लेने गया। प्लाज़ा की केबल के दाम बताये 1800, 1450 और 1000 रूपए।

इसी के सापेक्ष एक दूसरी कम्पनी (नाम तो नहीं लिख पाऊंगा) की केबिल के दाम 1250, 1050, और 700 बताये।

मैंने केबिल को ध्यान से देखा ISI मार्क CML No चैक किये… दांतों से चबा कर PVC चैक की… LPM और LPY का भी शक दूर किया… LPM ही था।

फिर भी मन नहीं माना तो प्लाज़ा और उस केबिल के बण्डल वहीँ रखे कांटे पर भी तोल कर देखा तो 2.5 mm वाला तार प्लाज़ा से 200 ग्राम ज्यादा भारी था।

अब हर तरह से संतुष्टि करके बारगेनिंग की तो दुकानदार दस परसेंट और भी कम करने को तैयार हो गया।

सामान खरीद कर बिल मांगा तो दुकानदार हंस दिया… बोला “अजी भाई साहब इन रेटों पर बिल भी मांग रहे हो?”

तब मैंने कहा, ‘ना भाई बिल तो मुझे चाहिए कुछ रिकॉर्ड में रखने के लिए।’

“अच्छा तो केबिल छोड़ कर सबके बिल दे दूंगा लेकिन 9% एक्स्ट्रा लूंगा।”

‘9% काहे के?’

“अब जो भी हो, पूरी मार्केट में कोई भी इन रेट्स के साथ बिल भी दे दे तो मैं दस परसेंट और छोड़ दूंगा।”

भतीजा साथ में था, सो झुंझला कर दुकानदार से बोला ‘अरे भईया हमको कुछ नहीं चाहिए, ट्रांसपोर्ट की जिम्मेदारी आपकी है कि वो माल की बुकिंग कर ले।’

फिर मुझसे बोला, ‘चाचा पूरी सियानपत्ती करो, दुकानदार की आत्मा खींच लो, फिर भी बिल चाहिए…’

दुकानदार को जल्दी से भुगतान कर गुस्से में बाईक को स्टार्ट करके चल दिया। रास्ते में लगभग मुझे लताड़ते हुए बोला, ‘कभी इतनी घटिया चीज हमारे यहाँ लगी है, जो इन केबिलों में ही सारी सयान दिखा दी… मिल में 35 साल पहले प्लाज़ा के ही तार थे जो अभी भी देखो कैसे नए रखे हैं… सालों साल की चीज में पन्द्रह हजार बचा कर कौन सी बचत कर ली।’

मैंने उसे समझाया, “अबे भाई, क्वालिटी की पहचान में हमारे ऊपर शक मत कर… सब GST का खेल है। दस प्रतिशत ब्रांड के लिए तो 18% GST की बचत, बाकी 10% तो वो प्लाज़ा के अन्दर कूपन होंगे, वो मिस्त्री ले जाता खामखा ही।”

खैर भतीजे के गले तो बात उतरी ही नहीं उलटे मुझे अपने ऊपर ही गुस्सा आने लगी कि दस पन्द्रह हजार के पीछे बेमतलब की चालाकी में घटिया माल ना ले आया होऊं….

लेकिन जब फिटिंग के समय बण्डल खुले तो क्वालिटी देख मिस्त्री द्वारा की गयी तारीफ़ के बाद ही चैन आया, संतोष हुआ।

इससे पहले एक दिन सरिया वाले सेठजी से बिल के पीछे झगड़ा हो गया था। 43 रूपए 50 पैसे की तय की थी सरिया… दुकानदार ना तो RTGS से, और ना ही चैक से पैसे ले रहा था। बिल माँगा तो कह दिया, “भाई आपको बिल से क्या करना? अपना पता बताओ, माल आपके ठिकाने पर पहुँच जाए तब भुगतान पहुंचा देना।”

मैं बिल पर अड़ गया तो बोला, ‘भाई साहब आपको बिल के लिए पहले बोलना था।’

“इसमें क्या बोलना?”

‘अब आपको क्या बताऊं? आपने पूरी तो जान निकाल कर रख दी। खून तक बाहर निकाल लिया रेट तय करने में। खैर अब ऊपर के पचास पैसे खत्म कर लो, लेकिन बिल मत मांगो।’

“मुझे तो बिल ही चाहिए।”

‘भाई जी मैं अभी अभी आपकी सरिया के बिहाफ पर बिल की सैटिंग कर चुका हूँ… उसको बिल डन कर दिया है। आपको दो रुपया मंदी रेट लगाई है, 4.5% परसेंट पर बिल बिका है, एक रुपिया नब्बे पैसे बचेंगे… और आपको दो रुपया और अब पचास पैसे और छोड़ दिए।’

अब दुकानदार परिचित था सो ज्यादा बात बढ़ाये बिना मन मार कर बिना बिल लिए चला आया… बता दूँ सरिया भी 18% स्लैब में है।

और वो परिचित गुटखा पान मसाला बेचने वाला दुकानदार… पट्ठे के यहाँ महीने में चार बार गोदाम भर जाता है। माल दस लाख का होता है, बिल ढाई लाख का…

वो मैन्युफैक्चरर तो इतना माल एक Eway Bill पर चार चक्कर लगा कर पर 4 से 5 लाख के टैक्स का घल्लूधारा करता है… लेकिन इसको बमुश्किल 5000 का ही एक्स्ट्रा लाभ मिलता है।

मूर्ख को खूब समझाता हूँ कि मरेगा किसी दिन… लेकिन मानता ही नहीं… कहता है कि मेरे मना करते ही और तमाम लोग हैं लेने वाले…

और एक दिन एक पान मसाला तम्बाखू कम्पनी वाले से मुलाक़ात हुई तो उसके रोना रोने के अनुसार कम्पटीशन की ये हालत है कि 188% और 88% वाली टैक्स रेट के एक बिल पर चार की वजाय तीन चक्कर भी लगे तो कम्पनी भारी घाटे में आ जाएगी।

गुस्सा आता है कारोबार की इस स्टाईल पर… बीसियों साल, दसियों पीढियां गुज़र गयी इस स्टाईल में कारोबार करते करते… कम्पटीशन में टैक्स बचा कर राष्ट्र, कानून, समाज सबके लिए चोर बनते हैं… लेकिन कमबख्त एक पैसे की बचत का प्रयोग भी तो ये दुकानदार अपने घर परिवार के ऊपर नहीं करते हैं।

अंततः उस बिजली केबिल वाले ने 18% बचा कर तो सरिया वाले ने 4.5% और पान मसाला वाले ने 88 से 188% तक बचा कर भी अपने लिए क्या कमाया? सब कुछ ग्राहक को ही तो दिया।

लेकिन सवाल तो ये है कि उन्होंने दूसरों को दिया ही क्यों?

चलिए अभी तक तो सिस्टम में काफी खामियां थीं सो ईमानदार से ईमानदार व्यापारी भी पूरे टैक्स का धंधा नहीं कर सकता था… लेकिन अब तो ईमानदार बन कर काम करने की बहुत बड़ी गुंजाइश है…

आखिर कब तक चोर बनोगे दूसरों के लिए… इस कृतघ्न समाज के लिए अपने बच्चों के माथे पर कब तक उनके बाप को चोर लिखवाओगे…

हम व्यापारीगण क्यों डरें GST से? ये कौन सा हमारी जेब से जाना है? क्यों रोना रोयें हम इसका? क्यों राजनेताओं की दया का पात्र बनें? क्यों उनकी लड़ाई का मोहरा बनें?

आखिर हम सर्वाधिक परिश्रमी… सर्वाधिक ईमानदार… सर्वाधिक राष्ट्रवादी… सर्वाधिक राष्ट्रभक्त… सर्वाधिक धर्मभीरू… सर्वाधिक धर्म परायण… सर्वाधिक दानशील… सर्वाधिक योग्य… सर्वाधिक बुद्धिमान… हम हर क्षेत्र में अग्रणी हैं… तब हम केवल इस टैक्स के कारण ही क्यों दब कर रहें?

हम टैक्स को अपने जीवन का अनिवार्य अंग बना कर समाज में अपना सर गर्व से उंचा करके कब दिखाएँगे!

संघ-भाजपा के DNA को दलित विरोधी बताने वाले, अपने वंश और पार्टी का DNA तो बताएं

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1 COMMENT

  1. बिल्कुल सही बात,
    ये भारत-भूमि है यहाँ “जस राजा(शासक) तस प्रजा” सदैव चरितार्थ होता आया है, अब तो शासक सद्चरित्रार्थता को प्रश्रय दे रहे हैं; सो हर वर्ग के व्यापारियों को इस राष्ट्रहित-यज्ञ में अपनी श्रेष्ठतम आहुति ही आहूत कर अपनी सद्चरित्रता सर्वश्रेष्ठता का प्रमाण बढ़-चढ़ कर प्रस्तुत करना ही चाहिये।

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