“…पर सेठ, जा अमित्सा ने करौं भौत बुरौ एं”

बात पिछली साल चल रहे उत्तरप्रदेश चुनाव प्रचार के दौरान की है।

तब भाजपा अध्यक्ष अमित शाह हर टीवी इंटरव्यू में ‘जीतने के चार घंटे के अन्दर उत्तर प्रदेश के अवैध और मशीनी क़त्ल खानों को बंद कर दिया जायेगा’ वाली घोषणा किया करते थे।

तब हिन्दू तो इसको लेकर जो सोचते थे वो सोचते ही थे, लेकिन मुसलमानों में इस घोषणा की बहुत तीव्र प्रतिक्रिया थी।

गांवों से भैंस पड्डे खरीद कर कत्लखानों तक पहुँचाने वाले व्यापारियों में इसको लेकर बेचैनी थी लेकिन परम्परागत कसाईयों में इस वाक्य को लेकर एक अजीब सी फीलिंग थी।

तब कई कसाई जिनको कि मशीनी कत्लखानों के कारण अपना परम्परागत कट्टी का काम खत्म करना पड़ गया था, मेरे पास आते थे और मशवरा करते थे कि कत्लखाने बंद हुए तो क्या उनको कट्टी के लायसेंस मिल सकते हैं।

हालांकि ये तो नहीं कहा जा सकता कि वे अमित शाह के ऐलान से भाजपा को वोट देने की सोच रहे थे, लेकिन उनमें एक छोटी सी आशा की किरण को मैं साफ़ अनुभव करता था कि उनके मन में अपनी खोई रोज़ी मिलने की संभावना जागृत हो रही है।

अब जिस दिन चुनाव परिणाम आये उस दिन मेरे घर और संस्थान दोनों के तीन ओर स्थित मुस्लिम बस्ती में कब्रिस्तान जैसा सन्नाटा पसर गया था।

कमाल की बात यह रही कि अपने लोगों की चिंता किये बिना, रात्रि में तीन चार कसाई मेरे पास आये बोले “भईया गिरधारी, तो सै हमारा दस दस पीढ़ियों का का नाता है… कछू हो सके तौ भईया हमारे लैसंस बहाल करवा दियो…”

यानी वे कसाई बिलकुल मान चुके थे कि अब मशीनी क़त्लखाने बंद होंगे तो छोटे लेवल पर कट्टी की परमीशन मिलनी ही मिलनी है।

उधर कुछ ही दिनों में सड़क से उठ कर खरबपति बन चुके यूपी के बड़े मीट मैन्युफैक्चरर के घर हमारे गाँव के पास का एक हिन्दू लड़का काम करता था… वो आया और बोला, “सेठ जी, तियाई जुगाड़ काऊ टोल या पेट्रोल पम्प पे होय तौ नौकरी लगवा देओ।”

‘चों… कर तौ रेयौ ए तू कसाई के हियाँ।’

”मर गयौ मेई सासू कौ कसयिया, #@$%… मोदी ने… रोटी उ नाएं बनीं दो दिना तै बाके हियाँ…”

अगले दिन, “कसयिया ने सिगरे कमेरे नु बुलाय कै कह दई ऐ कै कऊँ अंत काम देख लेओ।”

फिर एक दिन, “आज तौ घर के सबरे मर्द बयियर इकट्ठे भये… कछु और काम करवे की बात चल रईं एं।”

अब इधर दूसरी ओर चुनाव परिणाम के तीन दिन बाद कत्लखानों को भैंस सप्लाई करने वाला मजीद आया…

मैंने उसको बोला ही था, ‘बेटा अब तौ हराम की कमाई ख़तम, अब का करैगौ फ्रूट की ढकेल लगानी ए, कै पल्लेदारी करनी ए?’

कि एक दम तपाक से वो बोला, “अबे गिरधारी, जा भाजपा के पीछे हमारी तेरी दुश्मनी ए जिन्दगी निकल चली पर एक बात हम तो सै बार बार कैहवें कै तेरी भाजपा सै जादा बज्जी पार्टी और कोई है ना है… एक बी कतलखाना बंद ना होगा… और देख अब तौ इनका जमाना आवैगा… जे गली मकानों में कट्टी करने वाले छुटभईये सब खतम हो जंगे… बस अब तौ इन कतलखानौ की ई पिलैगी।”

ये सब बकता हुआ वो चला गया… मैं सोच रहा था पट्ठे की खिसियानपंती में बेमतलब का झगड़ा और बन जाता…

दो दिन बाद वो मजीद फिर आया… “देख हम कहते ना कै तेरी बीजेपी #@% पार्टी ए… और देख लियो अब जाका सबूत।”

मेरा टेम्पर एकदम से लूज़ हुआ लेकिन पीढ़ियों के बेतकल्लुफ सम्बन्धों की वजह से नियन्त्रण कर गया… फिर उसके इतने मज़बूत दावे के बारे में टटोला,

तो बोला, “रिजल्ट वाले यी दिन ‘वो’ आ गये… नखलऊ के होटल में मीटिंग हुई… एक हज्जार करोड़ का चंदा बुल गया… वो 5 हज्जार करोड़ मांग कै चले गये… अब दो हज्जार पे फैंसला हो गिया ए…”

मैं फिर से तिलमिलाया तो वो बोला, “अबे ठहर बनिए… तेरा ऊ इलाज करकै लाया ऊँ”, और उसने पिंक कलर की करारी गड्डी निकाल कर मेरे हाथ मैं थमा दी…

बोला, देख चुनाव की शर्त तौ तोसै अब कै हो ना पायी पर अब तू आज एक शर्त बद ले… एक बी कतलखाना बंद हो जाय तौ जे गड्डी तेरी होई गयी… नईं तौ बस जा पे एक लाल किले छाप और रख कै वापस कर दियो… जून तक शर्त चलैगी…”

और वो मजीद उस गड्डी को छोड़ कर चला गया… हालांकि उसकी आत्मविश्वास भरी बैट से में हिल गया था सो शर्त मैंने डन नहीं की थी।

उधर वो मीट मैन्युफैक्चरर के यहाँ काम करने वाला लड़का भी नहीं दिखा… मैंने समझा शायद उसने वो नौकरी छोड़ दी होगी।

इसी बीच योगी जी मुख्यमंत्री बन गये… उन्होंने शपथ ग्रहण कर ली… चार घंटे बीत गये।

फिर मंत्रियों ने शपथ ग्रहण कर ली… चार घंटे बीत गये… चार सौ घंटे बीत गये… वो ना आगरा का कत्लखाना बंद हुआ, ना अलीगढ़ के…

इस बीच मजीद कई बार मेरे पास जरूर आया… कभी भैंस ले जाने के लिए रास्ते का अनुज्ञा-पत्र दिखाकर तो कभी अपनी पासबुक में चढ़ी भैंस बिक्री की जमा रकम दिखा दिखा कर मुझे चिढ़ा जाता।

और एक दिन वो कत्लखाने वाले के यहाँ काम करने वाला लड़का आया, उससे पूछा कि कहाँ काम कर रहा है तो ख़ुशी, दुःख, पीड़ा के मिले जुले भावों से बोला, “बायी कसयिया के हियाँ लगे भये एं… तनखा ऊ पानसौ रुपईया बढ़े दई ए… पर सेठ, जा अमित्सा (अमित शाह) ने करौं भौत बुरौ एं।”

‘क्या?’

“अरे कहाँ बंद भये जे मेई सासू के कट्टी खाने… पैलै हजार पौहे कटते अब दो हजार कट रये एँ… कछु न भयौ जे तौ…”

और एक दिन मजीद आया… हाथ में दाउजी मिष्ठान भंडार का पैकिट था… बताया कि उसके वाले कट्टी खाने वाले ने अपने दो कट्टी खानों से साझेदारी खत्म कर खुद मालिकी ले ली है… और आज एक नया और खोल लिया था सो उसकी मिठाई थी वो।

हालांकि मैं यहाँ उस मजीद की दो हजार करोड़ वाली बात से सहमति नहीं रखता… लेकिन वो अपनी एक-एक बात के एक-एक शब्द को जूते मार-मार कर सिद्ध कर चुका था।

जो भी हुआ हो… यहाँ एक भी पैसा चंदे में ना आया हो… लेकिन इनकी लचर और गलत नीति के कारण एक उस वर्ग के मन में भाजपा नेताओं और पार्टी के बारे में कुत्सित छवि बन गयी… जिसको कि यूपी में बीजेपी की जीत से डर लगा था… वे घरों में दुबक गये थे… लेकिन अब वे ऐलानिया सीना ठोक के घरों से बाहर हैं और वो भी बड़ी हेकड़ी, बड़ी अहसानफरामोशी के साथ भाजपा पर आरोप लगा-लगा कर।

जबकि मशीनी कत्लखाने बंद करने की नीति पर कायम रहते तो संभव है कि छोटे छोटे गरीब कसाईयों की सिम्पैथी भाजपा को मिलने का एक वातावरण और भ्रम तो कम से कम बनता… और ये भ्रम नरेंद्र मोदी के तीन तलाक के खोखले मुद्दे से कहीं बड़ा और सार्थक सिद्ध होता।

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