विषैला वामपंथ : इम्युनिटी क्या होती है? कैसे काम करती है?

शरीर की इम्युनिटी यानी रोग-प्रतिरोधक क्षमता के मूल में है ‘सेल्फ’ और ‘नॉन-सेल्फ’ की पहचान।

शरीर के श्वेत रक्त कणों को शरीर के अवयवों की पहचान करा दी जाती है… और यह काम बिल्कुल फॉर्मेटिव स्टेज में हो जाता है।

इसलिए जब शरीर किसी जीवाणु के संपर्क में आता है तो ये प्रतिरोधी कण उसकी पहचान ‘नॉन-सेल्फ’ या बाहरी के रूप में करते हैं और उसके विरुद्ध सक्रिय हो जाते हैं।

वहीं कुछ ऐसी भी बीमारियाँ हैं जो ऑटो-इम्युन बीमारियाँ कहलाती हैं। यानी शरीर की अपनी प्रतिरोधक क्षमता अपने ही अंगों या अवयवों के विरुद्ध सक्रिय हो जाती है।

जैसे SLE और Rheumatoid Arthritis। इसमें शरीर के अंगों के विरुद्ध अपनी ही इम्युनिटी सक्रिय हो जाती है और इसके बहुत ही घातक परिणाम होते हैं… शरीर के जोड़ों से लेकर किडनी, हृदय, रक्त-कण… सबकुछ प्रभावित होता है।

वामपंथ वैसी ही एक घातक बीमारी है। इसे आप Induced Auto-immunity समझ सकते हैं। समाज के एक अंग को समझा दिया जाता है कि दूसरा अंग आपका अपना नहीं है, शत्रु अंग है। इसका सबसे विषैला रूप जो देखने को मिलता है, वह है नारीवाद।

एक महिला का बहुत ही आक्रोशित लेख पढ़ा। आक्रोशित हैं समाज में स्त्रियों की असुरक्षा से, स्त्रियों पर अत्याचार से… वहाँ से फिसल कर उनका आक्रोश आया है उन पुरुषों पर जो स्त्रियों पर मज़ाक बनाते हैं, स्त्रियों को नीचा दिखाते हैं, स्त्रियों से चिढ़ते और जलते हैं…

उनका आक्रोश अपराधियों की ओर निर्देशित नहीं है। उन अपराधियों की ओर, जो हत्या, लूटमार और बलात्कार करते हैं। उनका आक्रोश निर्देशित है पुरुष-मात्र की तरफ, पुरुषवादी समाज की तरफ।

यह गुस्सा गलत नहीं है, लेकिन गलत तरफ निर्देशित है। यह गुस्सा मेरा भी है, हम सबका है। उस हर पुरुष का है जिसके परिवार की लड़कियाँ असुरक्षित महसूस करती हैं।

पर यह गुस्सा अपराधी तत्वों पर निर्देशित होने की बजाय पुरुषवादी समाज की ओर निर्देशित है। अपराधी पुरुष हैं… क्योंकि प्रकृति ने शारीरिक क्षमता और शक्ति औसतन पुरुषों को अधिक दी है… तो पुरुष को ही उन अपराधियों का प्रतिकार करने का पौरुष भी दिया है।

एक पौरुष-वादी समाज ही अपराधियों से लड़ने की क्षमता और साहस दिखायेगा ना। किंतु नहीं… आपको उसी पौरुष के प्रति आक्रोश व्यक्त करने को प्रेरित किया जा रहा है। आपको उसी सुरक्षा कवच से निकाल कर आसान शिकार बनाने का व्यूह रचा जा रहा है।

अगर नहीं समझ में आ रहा है तो ध्यान से सुनिए… उन (का)पुरुषों के स्वरों को सुनिए जो आपके इस नारीवादी आक्रोश को हवा दे रहे हैं। ये ही वे स्वर हैं जो अपराधियों के अधिकारों के लिए एमनेस्टी इंटरनेशनल बना कर खड़े हैं। ये ही वे स्वर हैं जो जुडिशल एक्टिविस्ट बन कर अपराधियों को प्रश्रय दे रहे हैं।

जब न्याय व्यवस्था पंगु हो जाये और इन अपराधियों के विरुद्ध समाज त्वरित न्याय कर दे तो ये ही वे स्वर हैं जो मॉब लिंचिंग का रोना रोते हैं।

आपका आक्रोश हम सबका आक्रोश है। आपके पिता, पति, भाई… सबका आक्रोश है। समाज का पौरुष ही आपका सुरक्षा कवच है।

आपके आक्रोश को अपने ही कवच की ओर निर्देशित करते स्वरों से बचिए… उन अपराधियों से बचिए जो आपके लिए सबसे बड़ा खतरा हैं। इस induced auto-immunity का इलाज कीजिये।

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