मासूम नौजवान समझ नहीं पाए बकरी को बावर्चीखाने में ले जाएं या ख्वाबगाह

ये जो बोकर (बकरा) है न ये पाकिस्तान के पहाड़ी इलाकों में पाया जाता है। बहुत जबर बोकर है।
अपन सुरुज भगवान को समर्पित पूजा ‘सुरजाही पूजा’ करते हैं, कहीं-कहीं ‘धरम पूजा’ भी कहते हैं।
इसमें एक मुख्य बोकर की बलि होनी होती है। इस बोकर को छोटे से ही खुला छोड़ दिया जाता है.. इसे कोई भी हानि नहीं पहुंचाता और न पहुँचा सकता है.. क्योंकि अगर उससे खून निकल गया तो वो बलि के काबिल नहीं रहेगा।.. वो किसी के भी बारी में घुस जायेगा, किसी के भी घर मे घुस जायेगा और जो चाहे वो खा जायेगा लेकिन कभी कोई मारेगा नहीं क्योंकि सुरजाही बोकर जो ठहरा।
खाने पीने को छूटा रहता तो शरीर भी खूब बाँधता है।.. जैसे जैसे बढ़ता जाता है शरीर से गंध आने लगता है.. मने कि ‘बोकरादि गंध’ .. ये गली से गुजर गया न तो सबके मुंह से यही निकलेगा ‘केकर सुरजाही बोकर पास भे रहल हो रे!’ केवल गन्ध से।
अब चूँकि ये सबसे ज्यादा मजबूत व जोवाईल रहता है तो बकरियों पे अधिकार भी इसी का रहता है। और शायद ‘बोकरादि गंध’ भी बकरियों को आकर्षित करता हो। और कोई बकरी हीट हो गई तो इसी के पास छोड़ देते हैं। मने इस बोकर को न मार खाने की चिंता, न खाने की चिंता और न मस्ती की चिंता!
सब अवेलेबल है इजली।

इनके यही गुण देख के लगता है कि उन्होंने ने इसको आदर्श बनाया .. ‘बक़रदढ़ियल’ .. और गंधाते भी है सारहे एकदम सुरजाही बोकर नियन ही .. और अगर नहीं गंधाते तो ऊपर से गंधमरवा रुई ठूँस लेते हैं लेकिन सुरजाही बोकर दिखने में कोई कमी नहीं छोड़ते हैं। .. कोई उनके सामने से पास हो गया न तो हमलोग यही बोलते..

“देखही तो रे कौन सुरजाही बोकर पास भेलव से रे.. आन तो साला फरसवा एके छे(वार) में पारे कर देते हैं!!”

लेकिन ये गंधछोड़वे सुरजाही बोकर सब गंधाते हुए करिया बोरे में कैद दू-गोड़वा बकरियों को रिझाते-रिझाते कब सारहे चर-गोड़वा बकरियों पे ही उतर गए पता ही न चला।

इन बोकरों का इलाज वही फरसा ही है। सारहे बहुत गंधा रहा हैं और गंध मचा रहे हैं।

– गंगा महतो

***************************************
“लोलिता” खासी विवावादास्पद किताबों में से एक है। कुछ लोग इसे क्लासिक भी मानते हैं। कभी हमने कहीं मजाकिया परिभाषाओं में पढ़ा था कि क्लासिक वैसी किताबों को कहते हैं जिसका नाम सबने सुना हो (खरीदी भी कई लोगों ने हो) मगर किसी ने पढ़ा ना हो! इस लिहाज से तो लोलिता पक्का क्लासिक होगी। किसी भी स्टेशन से गुजरते इसका हिंदी अनुवाद और अंग्रेजी संस्करण दोनों आसानी से दिख जाता है, जरूर खूब बिकती होगी। साहित्य वालों की नजर इस किताब में दूसरी चीज़ों पर पड़ी।

लोलिता के लेखक वल्द्मिर (रुसी-अमरीकी) एक हम्बर्ट नाम के किरदार के जरिये ये कहानी सुना रहे होते हैं। इसमें द्विअर्थी संवाद भरे पड़े हैं, अक्षरों के हेर-फेर से बदले गए शब्द हैं, किसी और भाषा में जो अश्लील हो जाए ऐसे वाक्य भी हैं। ये 1955 में आई किताब विवादित इसलिए रही है क्योंकि इसके मुख्य किरदार को कमसिन (9 से 14 वर्ष की आयु की) लड़कियों का “शौक” था। इनके लिए वो Nymphlet शब्द का इस्तेमाल करता है, जो कि शायद उसी का गढ़ा हुआ शब्द था।

अब ये शब्द अलग से डिक्शनरी में मिल जाता है। Nymph से ही nymphomaniac शब्द भी बनता है, जिसका मोटे तौर पर मतलब होता है “ठरकी”। जैसे वो nymphlet का इस्तेमाल करते हैं, वैसे ही एक और शब्द Faunlet का इस्तेमाल भी करते हैं। हमारा मकसद Faun शब्द पर ध्यान दिलाना ही था, लोलिता का जिर्क बस इसलिए था ताकि ना चाहते हुए भी कई लोग पढ़ डालें। अगर ऐसे फाउन (faun) समझ नहीं आ रहा तो मशहूर फिल्म क्रॉनिकल्स ऑफ़ नार्निया याद कीजिये।

क्रॉनिकल्स ऑफ़ नार्निया में जैसे ही बच्चे अलमारी में घुसकर दूसरी दुनियां में पहुँचते हैं तो उनकी मुलाकात एक मिस्टर टूम्नस से होती है। ये अजीब से जीव थे जो कि कमर से नीचे की तरफ बकरे थे, और कमर से ऊपर इंसान। इनके कान भी कुछ कुछ बकरी जैसे थे, और सींग भी निकली हुई थी। बच्चों की ये फिल्म अक्सर टीवी पर भी आती है इसलिए आधी बकरी, आधा इंसान आपने देख भी रखा हो, इसकी पूरी संभावना है। बस यही जीव दो नस्लों का वर्णसंकर जीव फाउन (faun) कहलाता है।

मुग़ल काल के एक शायर थे जाफ़र ज़ताल्ली (1659-1713) जिन्हें मुगलों ने मौत की सजा सुना दी थी। मौत की सजा शायद इसलिए मिली थी क्योंकि उन्होंने औरंगजेब के बेटे (मुहम्मद कामबख्श) की करतूतों पर लिख डाला था। औरंगजेब के दूसरे बेटों के “शौक” के बारे में उन्होंने जो लिखा था वो भी मौत की सजा के लायक ही था। अपहृत बच्चे-बच्चियों के साथ ही नहीं जानवरों के साथ भी वो लोग जो करते थे उसके बारे में जाफ़र को हरगिज नहीं लिखना चाहिए था। इस शायर के बारे में आपको “रेख्ता” जैसी वेबसाइट्स पर मिल जाएगा। उर्दू में लिखा है, तो पढ़ने में मुश्किल हो सकती है।

बाकी बकरी के साथ जो हुआ वो आपको अजीब इसलिए लग रहा है, क्योंकि आपकी कंडीशनिंग करके इसे आपके लिए फिल्मों और साहित्य ने स्वीकार्य नहीं बनाया है। फिर आपको तो पता ही है कि सही मतलब ना समझ पाने की वजह से कुछ मासूम नौजवान भटक भी जाते हैं! ऐसे ही कुछ भटके हुए मासूम नौजवान अगर समझ नहीं पाए कि बकरी को बावर्चीखाने में ले जाना है या ख्वाबगाह में तो इतना हंगामा क्यों बरपा है? बकरी ही तो थी ना, जानवर की जान इंसान से कीमती नहीं होती।

– आनंद कुमार

(एक बकरी के साथ हुए गैंग रेप के बाद सोशल मीडिया पर वीरोध में लिखे गए लेख)

Taharrush Gamea : गैंग रेप ‘उनके’ लिए है महज एक खेल!

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यवहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति मेकिंग इंडिया उत्तरदायी नहीं है। इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार मेकिंग इंडिया के नहीं हैं, तथा मेकिंग इंडिया उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY