राष्ट्र क्या होता है ये ‘हमने’ 18वीं सदी में बताया, तो भारत सदियों पुराना राष्ट्र कैसे!

हाल ही में सोशल मीडिया पर एक विमर्श ने जन्म लिया। एक राष्ट्र के रूप में भारत कितना पुराना है?

क्या ये 18वीं सदी में पैदा हुआ राष्ट्र है, जैसा कि पाश्चात्य विद्वान् कहते हैं। या ये सहस्त्राब्दियों पुराना राष्ट्र है, जैसा कि हिन्दू राष्ट्रवादी दावा करते हैं।

पश्चिम का मानना साफ है कि हमने नेशनलिज़्म की परिभाषा ही 18वीं सदी में तय की। राष्ट्र क्या होता है ये हमने 18वीं सदी में बताया तो भारत सदियों पुराना राष्ट्र कैसे हो सकता है?

अब चूँकि पश्चिम श्रेष्ठता के झूठे दंभ से पीड़ित है। अपने झूठे यशोगान में लिप्त प्रशंसापिपासु लोगों का कथित बौद्धिक समूह ये स्वीकारने को तैयार ही नहीं कि सदियों से अमिट एक राष्ट्र आज भी अपनी सांस्कृतिक एकता को संभाले चट्टान की तरह अविचल खड़ा है। जबकि उनकी कथित महान सभ्यताएं आईं और हवा एक झोंके के साथ हवा हो गईं।

ये लेख उन कोशिशों का जवाब भर है। इसे हर्फ़ दर हर्फ़ पढ़िए। इसमें ये सिद्ध किया गया है कि भारत 18वीं सदी में अचानक प्रकट हुआ या अंग्रेजों की दयादृष्टि से उत्पन्न देश मात्र नहीं है। ये हजारों हजार साल की चेतना अपने प्राण में समेटे हुए सजीव सतत जीवन प्रवाह है।

इतिहास के पन्नों में भारतवर्ष :

कभी आपने यज्ञ किया है? शास्त्रों के अनुसार उसमें सबसे पहले आपको संकल्प करना होता है। संकल्प का एक अंश मैं यहाँ लिख रहा हूँ।

संकल्प में हम कहते हैं “…श्री श्वेत वाराह कल्पै वैवस्वत मन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे युगे कलियुगे कलि प्रथमचरणे भूर्लोके जम्बूद्वीपे भारत वर्षे भरत खंडे आर्यावर्तान्तर्गतैकदेशे…”

ध्यान दीजिये। ” जम्बूद्वीपे भारत वर्षे भरत खंडे…” अर्थात जम्बूद्वीप के भारतवर्ष के भरत खंड के अमुक स्थान पर… यहाँ हम मगध नहीं कहते… कौशल नहीं कहते… पांचाल, कम्बोज, काशी और कुरु भी नहीं। यहाँ तक कि चेरी और अवंति भी नहीं।

यहाँ स्पष्टत: उन्होंने भारतवर्ष शब्द का प्रयोग किया है। अब भारतवर्ष क्या है इसे जानने के लिए हमें पीएचडी बिलकुल भी नहीं करनी।

आइये कुछ और उदाहरण देखते हैं…

आप लाख हिंदुत्व विरोधी हों पर एक बात तो आप मानेंगे सर्वाधिक समृद्ध साहित्य सनातनियों ने ही लिखें हैं। प्रमाणित शास्त्रों में पुराणों का नाम प्रमुख रूप से लिया जाता है। कुल 18 पुराण हैं। गरुड़ पुराण, शिव पुराण और भी कई अन्य।

इन्हीं पुराणों में एक प्रमुख पुराण है विष्णु पुराण। अत्यंत प्राचीन इस पुराण का वाचन किया है महर्षि पराशर ने।

शास्त्रों में लिखा है तो जाहिर है ये सदियों पहले की बात है… आजकल या 1947 के बाद की नहीं। इसमें संसार के पालनहार श्री विष्णु की कथाएं हैं। साथ में ज्योतिष, भूगोल और कर्मकांड का भी वर्णन है। इसी विष्णु पुराण के द्वितीय अंश में एक श्लोक है जिसे संघी स्कूल में मैंने पढ़ा है।

श्लोक है –

“गायन्ति देवा किल गीतकानि,
धन्यास्तु ते भारत भूमि भागे|
स्वर्गापवर्गास्पद – मार्गभूते,
भवन्ति भूय: पुरुषा: सुरत्वात्||”

भावार्थ – स्वर्ग के देवता गीत गाते हैं कि वो भारतभूमि धन्य है जहाँ स्वर्ग और मोक्ष का मार्ग दिखलाया जाता है। देवता भी बार बार इसी भू (जगह) पर जन्मते हैं।

इस हजारो साल पुराने श्लोक में भी आर्यावर्त के लिए भारत शब्द का प्रयोग हुआ है। लेकिन फिर भी मैं अभी इसे राष्ट्र घोषित नहीं कर रहा हूँ। एक दो उदाहरण और देखते हैं।

विष्णु पुराण में ही एक अन्य श्लोक है –

“उत्तरं यत्समुद्रस्य,
हिमवत दक्षिणं च यत|
वर्षं यद भारतं नाम,
यत्रेयं भारती प्रज||”

भावार्थ – समुद्र के उत्तर में और हिमालय के दक्षिण में जो देश है उसे भारत कहते हैं तथा उसकी संतानों (नागरिकों) को भारती कहते हैं।

इस श्लोक से स्पष्ट है कि हजारों साल पहले भी इस पावन धरा पर भारत नाम का राष्ट्र था। उसकी सीमाएं दक्षिण में समुद्र तक और उत्तर में हिमालय तक फैली थीं। इस राष्ट्र का नाम सिर्फ भारतवर्ष ही नहीं था बल्कि आर्यावर्त, ब्रह्मवर्त और पृथ्वी भी इस राष्ट्र के प्रचलित नाम थे।

ऐसा नहीं है कि सिर्फ विष्णु पुराण में ही इस भारतवर्ष का उल्लेख है। आचार्य कौटिल्य ने इसका वर्णन अपने महान ग्रन्थ अर्थशास्त्र में किया है। एक बानगी देखिये।

“देश: पृथिवी! तस्यां हिमवत्समुद्रान्तरमदां चीन|
योजन सहस्र परिमाणं तिर्यंक चक्रवर्तिक्षेत्रम||”
(नवम अधिकरण १३५ प्रकरण)

भावार्थ – पृथ्वी पर स्थित भारत देश जो हिमालय से लेकर दक्षिण में समुद्र तक वह पूर्व दिशा से पश्चिम दिशा में 1000 योजन तक जिसका परिमाण (परिधि) वह विस्तृत चक्रवर्ती क्षेत्र है।

यहाँ दो शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। प्रथम यहाँ भारत की जगह पृथ्वी, द्वितीय चक्रवर्ती क्षेत्र।

पृथ्वी का अर्थ यहाँ विभिन्न मत और विचारधाराओं से है। यानि विस्तृत भारतभूमि में भिन्न भिन्न मत हैं। इसका एक अभिप्राय देश का नाम पृथ्वी होने से भी लगाया जाता है। जबकि चक्रवर्ती का मतलब हम सभी जानते हैं। चक्रवर्ती का अर्थ यहाँ राजनैतिक एकता से है।

यानि पूर्व से पश्चिम उत्तर से दक्षिण सारा राष्ट्र सारे मत मतान्तर और तमाम विचारधाराएँ सभी एक राजनैतिक चेतना के आधीन है। ये न सिर्फ राजनैतिक एकता के लिए है बल्कि यह सूक्त तत्कालीन भारत की सांस्कृतिक एकता को भी दर्शाता है। क्यों हम सहस्त्राब्दियों से भारत को एक राष्ट्र कहते हैं ये इस सूक्त से स्पष्ट है।

एक विवाद ज़रूर यहाँ उठा कि पृथ्वी तो समस्त संसार है वहां 1000 योजन में कैसे बांध रहे हैं इसे आचार्य चाणक्य और ये कौन सी भूमि है। इसका जवाब अगर हम बौद्ध त्रिपिटक में ढूंढ सकते हैं।

त्रिपिटक की एक बहुत पुराने अंश महागोविंद सुत्त में भारतवर्ष भूमि भाग का वर्णन है। इसमें इस पुण्य धरा को बैलगाड़ी के अप्रतिम उपमान से समझाया है। यहाँ लिखा गया है –

“पृथ्वी के उत्तर का भाग चौड़ा और दक्षिण भाग शकटमुख (बैलगाड़ी) के त्रिकोण जैसा है।”

महागोविंद सुत्त में भी भारत को पृथ्वी से पुकारा गया है। यहाँ हम चाणक्य के अर्थशास्त्र में उपजे सन्देह को प्रमाणित कर सकते हैं। अर्थात भारतवर्ष का नाम कभी पृथ्वी भी रहा होगा। पर इतना तय है हजारों वर्ष पूर्व इस भारतवर्ष का अस्तित्व एक राष्ट्र के रूप में था।

कुछ विद्वानों का मत है कि हिन्दू नाम हमें अरब से मिला। किन्तु ऋग्वेद के बृहस्पति आगम में ये श्लोक है –

“हिमालयं समारभ्य यावत् इंदु सरेावरम्|
तं देवनिर्मितं देशं हिंदुस्थानं प्रचक्षते||”

भावार्थ – हिमालय से इन्दुसरोवर तक देवताओं द्वारा बनाये गए राष्ट्र को हिन्दुस्थान के नाम से जाना जाता है।

कमाल है न… कहाँ हम भारत को खोज रहे थे और यहाँ हमें हिन्दुस्थान शब्द के भी प्रमाण मिल गए। ऐसे कई प्रमाण हम और दे सकते हैं।

श्रीमद भागवत के व्यास की तरह बाबा अनुज अग्रवाल सुबह से शाम तक प्रवचन कर सकते हैं कि सुनो वत्स ये जो तुम भारत का इतिहास अठारहवीं सदी से उठा के देख रहे हो, इसे 1947 में पैदा हुआ कथित देश बता रहे हो वो सदियों से सरस्वती गंगा आदि को अपने आँचल में समेटे अविचल अमिट राष्ट्र है।

भारतवर्ष, आर्यावर्त, ब्रह्मवर्त, हिन्दुस्थान पृथ्वी आदि नामों से प्रचलित ये देवभूमि अपने आप में हजारों हजार वर्ष का इतिहास समेटे है। इस राष्ट्र ने मिस्र, यूनान, चीन, जापान, मेसोपोटामिया आदि अनेक सभ्यताओं को जन्मते और मरते देखा है। और आप कहते हैं कि हम एक राष्ट्र ही नहीं हैं।

चूँकि आपकी डिक्शनरी में नेशन शब्द 1880 में एड हुआ तो क्या 1880 से पहले इस संसार में कोई राष्ट्र मौजूद नहीं था?

1882 में रेनन ने राष्ट्र शब्द को परिभाषित किया। उन्होंने लिखा कि “राष्ट्र आत्मिक और आध्यात्मिक दो सिद्धांतों से बना है जो कि वास्तव में एक ही हैं। एक वर्षों की परम्पराओं को खुद में समाहित किये हुए है, दूसरी स्वयं वर्तमान है। अविभाजित रूप से साथ रहने की इच्छा और अपनी परम्पराओं को सहेज कर रखना ही राष्ट्रवाद है।”

ऐसा तो हम सदियों से करते आये हैं। आपने ये परिभाषा अब पढ़ी है इसमें हमारा दोष नहीं है। इस परिभाषा के बल पर भारत राष्ट्र को महज दो सदी पुराना कहना ऐसा है जैसे कोई कहे कि न्यूटन के ग्रेविटी प्रिंसिपल खोजने से पहले संसार में गुरुत्वाकर्षण का अस्तित्व ही नहीं करती थी। पर हम सब जानते हैं पांचवीं पास बच्चा भी इस पर विश्वास नहीं करेगा। फिर हम अपने राष्ट्र के सम्बन्ध में इस कुप्रचार को कैसे सहन कर सकते हैं?

राष्ट्र की अवधारणा पर फिर कभी…

अनीति ने अधर्म का शिरोच्छेद कर दिया और धर्म स्थापना की नींव रखी

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY