एक क़ानून और एक शिक्षा ही समय की माँग, और इस समस्या का सम्पूर्ण निदान

आज टीवी पर एक डिबेट में एक पादरी को चर्च में कन्फ़ेशन के मामले पर बोलते सुना।

उन्होंने बताया कि प्रभु यीशु ने चर्च के पादरियों को ये अधिकार दिया है कि वो प्रभु यीशु की तरफ़ से किसी के अपराध क्षमा कर सकते हैं या उसे होल्ड पर रख सकते हैं।

ये एक विशेष प्रकार की शुद्धिकरण प्रकिया है। महिलाओं का एक पुरुष पादरी के सामने कंफेशन इसी का एक हिस्सा है (भले इससे ब्लैकमेलिंग करके रेप क्यों न हों), इसे बंद करना धर्म व आस्था पर आघात है। ऐसा नहीं किया जा सकता।

वास्तव में ये एक टिपिकल अब्राहमिक मत है जहाँ कुछ लोग अपने आप को ईश्वर का दूत बताते हैं और धर्म का मायाजाल पैदा कर उस धर्म के अनुयायियों का शोषण करते हैं।

यहाँ धर्म का आपके उत्थान, अनुशासन या चेतना से कोई लेना देना नहीं होता। बल्कि आपका दिमाग़ हर लिया जाता है, प्रश्न पूछने व तर्क वितर्क करने पे बैन लगा दिया जाता है, जैसा कह रहे हैं वैसा करो नहीं तो ऊपर दुनिया के दूसरे छोर पर बैठा ईश्वर दंड देगा और तुम्हारे साथ बहुत कुछ बुरा होगा, यही बताया जाता है।

पौराणिक दस्तावेज़ों के आधार पर अब्राहमिक मत का अर्थ है वो सारे मत जो दैत्यराज कलि की संतति Adam और Eve के वंशजों ने उत्पन्न किए, अब्राहम उनमें से एक वंशज थे जिनके नाम पर इस मत का नाम पड़ा और कलि के नाम पर इस युग का नाम कलियुग दिया गया। (बताने के ज़रूरत नहीं कि कौन कौन से रिलीजन व मज़हब इसके अंतर्गत आते हैं, नहीं तो आस्था पर चोट हो जाएगा, ख़ैर आप समझ गए होंगे)।

चौथी सदी के महान गणितज्ञ व खगोलशास्त्री आर्यभट्ट के अनुसार कलियुग की शुरूवात 3102 BCE में हुई।

इसी समय के बाद से अब्राहमिक मतों का बोल बाला शुरू हुआ, ईश्वर के तथाकथित दूत धरती पर आने शुरू हुए और धीरे धीरे ईश्वरीय सत्ता आत्मशोध का विषय ना होकर, आस्था (अंध-आस्था) का विषय हो गया और यही वो फ़ंडामेंटल विकृति है जहाँ से सारे काले कारनामे शुरू हुए।

अब बहुत से लोग सोच रहे होंगे कि ऐसा तो हमारे हिंदू धर्म में भी है तो क्या वो भी अब्राहमिक मत है?

ज़ाहिर है कि इतना बड़ा कांड हुआ तो भला हिंदू धर्म इससे अछूता कैसे रह सकता था?

वस्तुतः इतिहास के अनुसार यहाँ चौथी सदी के बाद से अब्राहमिक मतों के प्रभाव वाले देशों में व्याप्त सामंती प्रथा भारत में भी तेज़ी से फैली जब तथाकथित ब्राह्मण देवता वर्ण की मर्यादा छिन्न भिन्न करके भूस्वामी बने और ख़ुद को ईश्वर का दूत बताने लगे। तब इस देश के इतिहास में एक नया काला अध्याय जुड़ा।

एक समय जहाँ इसी देश में ब्राह्मण एक कर्म प्रधान सत्ता थी और इसलिए सर्वोच्च थी, क्योंकि वो भिक्षा व दान पर जनकल्याण व जन चेतना हेतु जीवन यापन करती थी, जिसके द्वारा जन चेतना के लिए वेद, वेदांग और उनके उपभाग जैसे संहिता, आरण्यक, ब्राह्मण, उपनिषद एवम् गणित खगोलशास्त्र, रसायन, भौतिकी, शल्यचिकित्सा, अर्थशास्त्र, न्यायशास्त्र आदि बिना भेद भाव पढ़ाए जाते थे और न दिखाई देने वाला ईश्वर हर किसी के लिए आत्मशोध का विषय था।

गुरुकुलों में और राज दरबारों में विभिन्न प्रकार के मतावलंबी आस्तिक, नास्तिक दोनों शास्त्रार्थ करते थे और चेतना उच्च स्तर को प्राप्त होती थी।

अब इस नए अब्राहमिक मत के प्रभाव में ये सारा कुछ केवल और केवल विश्वास व आस्था का विषय हो गया या कहें अंधविश्वास का विषय हो गया, चेतना निम्न स्तर को जाने लगी।

ज्ञान किसे देना है, ये भी धीरे धीरे लिंग व जाति से निर्धारित होने लगा। यहाँ भी ईश्वर दूसरी दुनिया में जाके बैठने लगा, आँख बंद करके इन्द्रियनिग्रह करने हेतु अंतर्मुखी होने वाले लोग आसमान की ओर बाहर ईश्वर को देखने लगे।

ये सब हुआ क्योंकि इसमें कुछ सामंत लोगों की सत्ता सुरक्षित होती थी। उनका आर्थिक व सामाजिक, दोनों लाभ था।

धीरे धीरे समाज को संचालित करने वाली कर्म प्रधान वर्ण की मर्यादा, जातिप्रथा में बदल दी गई। कर्म प्रधान देश भाग्य पर आश्रित हो गया।

अंधविश्वास, टोने टोटके, जातिप्रथा, सतीप्रथा, छुआछूत, देवदासी प्रथा, बाल विवाह वो सब कुछ इस समाज में आया जो यहाँ कभी था नहीं। उसके बाद क्या क्या हुआ सर्वविदित है।

यदि मूल हिंदू धर्म या उस से जुड़े अन्य सम्प्रदाय जैसे बौद्ध या जैन आदि से सम्बंधित विद्वानों के ट्रैक रिकॉर्ड देखें तो पता चलता है कि इसके दर्शन में किसी का आस्तिक या नास्तिक होना महत्व नहीं रखता, बल्कि उसकी जिज्ञासा, सत्यशोधक प्रवृत्ति, सत्यनिष्ठा, उसकी चेतना, उसकी दिनचर्या, योग आदि महत्व रखती है और इस प्रक्रिया में वो कई बार नास्तिक भी होता है, प्रश्न करता है, तर्क करता है।

ये स्वाभाविक है, ये सोचने विचारने की स्वतंत्रता है। एक व्यक्ति के विकास के लिए उसका मूलभूत अधिकार है।

जबकि अब्राहमिक मत में जो ईश्वर को नहीं मानता, तर्क करता है वो पापी है और मौत का भागीदार है। ईश्वर ने मुझे अपना उत्तराधिकारी बनाया है, मैं जो कुछ कहूँगा, मानना पड़ेगा। तर्क नहीं कर सकते, उसका कोई स्कोप नहीं है। इससे आपकी स्वतंत्रता पर सीधा प्रहार होता है।

इसी क्रम में इन मतों का विरोध करने वाले लाखों लाख लोग मौत के घाट उतारे गये हैं और आज भी क्रम जारी है। कहीं रिलीजन के नाम पर और कहीं मज़हब के नाम पर। और इसी देश में इस मत के प्रभाव में अतीत में हिंदू सम्प्रदायों के बीच भी ख़ूनी संघर्ष हुआ है।

इस मत के विरोध में ख़ुद यूरोप में बड़े बड़े आंदोलन हुए, यहाँ तक कि कई चर्च के पादरियों को लोगों ने मारा पीटा, जान से मार दिया, तब जाकर आधुनिक यूरोप ने जन्म लिया, जहाँ सोचने व विचारने की स्वतंत्रता मिली। ये अलग बात है कि समय के साथ स्वच्छंदता की विकृति भी वहाँ आयी, लेकिन पुरानी वाली ज़्यादा भयावह थी।

इतना कुछ हो गया और जब विभिन्न देशों में उस मत के प्रभाव में रहे विक्टिम लोगों ने ही जिसका विरोध किया तो अब इस देश में रिलीजन की आड़ में या अल्पसंख्यक का राग अलाप के कोई चर्च में एक महिला के कंफेशन को धर्म से जुड़ा मामला और ख़ुद को ईश्वर द्वारा स्थापित धर्माधिकारी बता कर संविधान की दुहाई दे, तो सबसे पहले ऐसे संविधान को बदला जाना चाहिए जहाँ से इन कुकर्मों को संरक्षण मिलता है।

हिंदू धर्म में तो बहुत सुधार किए, बाक़ियों में संरक्षण क्यों? एक क़ानून और एक शिक्षा ही समय की माँग है और इस समस्या का सम्पूर्ण निदान है।

कहाँ मोमबत्ती लेकर घूम रहे हो भैया, जाके आइने में देखो अपनी शक्ल

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY