‘वसुधैव कुटुम्बकम’ तो याद रखा, पर भूल गए ‘शठे शाठ्यं समाचरेत’

अयं निज: परोवेत्ति गणना लघु चेतसाम।
उदार चरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम।।

भावार्थ : यह मेरा है और यह दूसरे का, ऎसी सोच छोटी बुद्धि वाले लोग रखते हैं। उदार चरित्र (समझदार लोग) वाले लोगों के लिए तो पूरी पृथ्वी परिवार के समान है।

ये वह श्लोक है जो हम संघियों को रटाया जाता है। शाखा पर सुभाषितानि में ये श्लोक अवश्य पढ़ा जाता है। विद्या भारती के स्कूल की हर क्लास की किताब देववाणी संस्कृत में यह श्लोक हमेशा मिलेगा आपको।

आज हम इस पर विमर्श कर रहे हैं क्योंकि फेसबुक एक विद्वान् लेखक के अनुसार ये राष्ट्रवादियों का छल है। वो हितोपदेश का हवाला देकर इसे व्यंगोक्ति मात्र सिद्ध करते हैं। ये लेख उसका जवाब तो नहीं है। पर हाँ, इसमें वसुधैव कुटुम्बकम के भाव का समावेश है।

ये लेख बड़ा हो सकता है अत: वही लोग आगे पढ़ें जिन्हें वास्तव में रूचि हो।

इतिहास

ये श्लोक महा उपनिषद से लिया गया है। श्रीमद भागवत पुराण में भी इसका उल्लेख है। सर्वप्रथम हम उपनिषद की चर्चा करते हैं।

सनातनी साहित्य में उपनिषदों का मुख्य स्थान हैं। गुरु शिष्य परंपरा में शिष्यों की शंकाओं का निराकरण उपनिषद हैं। यानि गुरुओं के समीप बैठकर (उपनिषद का शाब्दिक अर्थ) शिष्यों ने प्रश्न पूछे और गुरुओं ने उन प्रश्नों के उत्तर दिए।

अब वो प्रश्न कई तरह के थे। कुछ परिस्थितिजन्य थे। कुछ ज्ञान के लिए। जैसे कठोपनिषद में बालक नचिकेता और यमराज का संवाद है। जिसमें जीवन, मृत्यु और आत्मा से जुड़े रहस्यों पर बालक नचिकेता ने यमराज से प्रश्न किये। यमराज ने नचिकेता से आत्मज्ञान रहस्य पर विमर्श किया। उन गूढ़ रहस्यों का विवेचन कठोपनिषद में संकलित है।

अन्य उपनिषदों में प्रश्नोपनिषद है। जिसमे महर्षि पिप्पलाद जी ने कात्यायन, भार्गव, कोशल्य आश्वलायन, गर्ग, सत्यकाम और सुकेश ऋषि के प्रजा, देह, इंद्री, ॐ, प्राण और कलाओं से सम्बंधित प्रश्नों का उत्तर दिया है।

उपनिषदों की इसी श्रृंखला में एक अति लघु उपनिषद आता है महा उपनिषद। इसी उपनिषद के अध्याय 6 का 72वां श्लोक है –

“अयं बन्धुर्यमनेति गणना लघुचेतसाम
उदार चरितानाम तु वसुधैव कुटुम्बकम”

इस श्लोक को विभिन्न लेखकों ने अपने अपने रचित ग्रंथों में थोड़ी कांट छांट करके लिखा। जैसे इसका उल्लेख श्रीमद भागवत पुराण में है। आप किसी भी अच्छे व्यास से श्रीमद भागवत का पारायण करिये। आपको ये श्लोक सुनने को मिल जायेगा।

तमिल साहित्य में एक प्रसिद्ध ग्रन्थ है। नाम है पुरानंनुरु (उच्चारण थोडा सा भिन्न है)। ये ईसा से करीब 100 साल पहले लिखा गया है। इस ग्रन्थ को करीब 150 लोगों ने मिलकर लिखा है या कहूँ कम्पोज़ किया है। जिनमें से एक लेखक हैं तिरु (तमिल भाषा में श्री शब्द का पर्यायवाची) कनियं पून्गुद्रन। वो इस ग्रन्थ में लिखते हैं –

“येतुम ऊर याव्रम केलि”
जिसका अर्थ है “पूरा विश्व मेरा घर है। हर प्राणी मेरा बंधु है।”

यही सूक्ति फिर क्रमश: पंचतंत्र की कथाओं में आचार्य विष्णु शर्मा द्वारा लगभग तीसरी शताब्दी में, हितोपदेश जो पंचतंत्र की कथाओं से प्रेरित है, में आचार्य नारायण द्वारा लगभग 11वीं शताब्दी में और अंत में स्वामी विवेकानंद द्वारा शिकागो के प्रसिद्ध भाषण में प्रयुक्त की गई।

हितोपदेश से उक्त सूक्ति का सम्बन्ध

अत: ये स्पष्ट है कि वसुधैव कुटुम्बकम की उक्ति हितोपदेश से नहीं ली गयी है। हितोपदेश की एक कथा में क्षुद्रबुद्धि नामक श्रृंगाल ने अपने मतलब के लिए इस उक्ति का प्रयोग किया है। क्षुद्रबुद्धि चित्रांग हिरन को मारकर खाना चाहता है। इसे समझ सुबुद्धि नामक कौआ चित्रांग को सचेत करता है। प्रत्युत्तर में क्षुद्रबुद्धि इस उक्ति का प्रयोग करता है।

कुल मिलाकर हितोपदेश की ये कहानी हमें ये शिक्षा देती है कि वसुधैव कुटुम्बकम की धारणा उचित है। उसे आप धारण कीजिये। किन्तु किसके साथ, इसका विचार अवश्य कीजिये। अन्यथा आपका हश्र भी चित्रांग सरीखा हो सकता है।

सूक्ति का भाव और संघ

सनातन संस्कृति विश्व बंधुत्व का उद्घोष करती है। हम संघी सुबह योग व प्राणायाम करने के बाद और अपनी बैठकों के बाद एक श्लोक पाठ अवश्य करते हैं –

“सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामय: |
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग भवेत् ||”

भावार्थ : सभी (प्राणीमात्र/मनुष्य) सुखी हों। सभी (प्राणी) निरोगी हों। सभी मंगलमय देखें। (किसी को) किसी भी प्रकार का दुःख न हो।

मैं एक #ProudSanghi होने के नाते इन शिक्षाओं से भिज्ञ हूँ। ये सूक्त मेरे अंतर्मन में समाहित हैं। मैं ही क्या, हर संघी के हृदय में आपको इनका समावेश मिलेगा। तभी कानपुर में रेल पटरी से नीचे उतरती है तो बिना जाति मज़हब पूछे दसियों स्वयंसेवक आपको राहत कार्य करते नज़र आते हैं।

कौन भूल सकता है सितम्बर 2014 की कश्मीर में आई वो भीषण बाढ़? और कौन भूल सकता है उसमें सेना और संघ के राहत कार्य? अपनी जान पर खेलकर स्वयंसेवक राहत सामग्री वहां पहुंचा रहे थे।

क्या उन्हें पीड़ितों का मज़हब नहीं मालूम था? क्या एक क्षण को भी उनके मन में कश्मीरी हिदुओं के साथ हुए अत्याचार के कारण बाढ़ पीड़ितों के लिए घृणा उत्पन्न न हुई होगी?

फिर क्या कारण था कि उन्होंने अपने प्राण संकट में डालते हुए सेवा को अंजाम दिया? मेरे ख्याल से वो सुबह शाखाओं में “मा कश्चिद् दुःखभाग भवेत्” के सस्वर गायन का परिणाम था। वो उस तथाकथित विद्वान् द्वारा लिखे गए ‘वसुधैव कुटुम्बकम के संघी छल’ का परिणाम था।

मैं सिर्फ काश्मीर का ही उदाहरण क्यों दूँ? साल 2015 माह दिसंबर को मैं स्वयं चेन्नई में था। खाकी हाफ पैंट पहने संघ के सैकड़ों स्वयंसेवक कन्धों पर भोज्य सामग्री पहुंचा रहे थे।

वाह… क्या विहंगम दृश्य है। इतिहास पशुओं के अनुसार यूरेशिया के घनघोर जातिवादी और संहारक आर्य, भारतवर्ष के मूल निवासी द्रविड़ों को संरक्षण प्रदान कर रहे हैं। क्यों? शायद कारण वही विश्व बंधुत्व की भावना थी।

निष्कर्ष

जब वह विद्वान् लेखक संघ के वसुधैव कुटुम्बकम को राष्ट्रवादी छल कहते हैं तो मुझे लगता है, दोनों तरफ के लोग (यानि कि हम संघी और वो लेखक) कहीं न कहीं गलती कर रहे होते हैं। वस्तुत: होना ये चाहिए कि हम दोनों को ही इसे उचित ढंग से समझें।

जब महा उपनिषद में इस उक्ति को कहा गया तब ये स्पष्ट नहीं लिखा कि ये उक्ति आपको देव के साथ प्रयोग में लानी है, न कि दैत्यों के साथ। दैत्यों के साथ हमें “शठे शाठ्यं समाचरेत” का उपयोग करना है। किन्तु कालांतर में हम ‘शठे शाठ्यं समाचरेत’ को भूल गए।

नीति निर्धारण में एक बात अत्यंत महत्वपूर्ण है। कि किस मनुष्य के साथ किस तरह का व्यवहार किया जाए। नीति में यही वो चूक है जो इतिहास में हमसे हुई। हमने ‘शठे शाठ्यम समाचरेत’ को भुलाकर सिर्फ ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ को याद रखा।

परम नीतिज्ञ आचार्य विष्णु शर्मा ने इस भूल को पकड़ा और अपनी पंचतंत्र की कथाओं के माध्यम से हमें पुन: इस नीति का स्मरण कराया। फिर बाहरी आक्रमण के काल के समय हम पुन: इसे भूल गए, तो आचार्य नारायण ने हमें पुन: इसका स्मरण कराया।

अब हम सभी का दायित्व है कि उपरलिखित दोनों सूक्ति का प्रयोग सही संदर्भों और परिस्थितियों में करें। हमें वास्तव में संघ पर या उस लेखक पर दोषारोपण करने से पहले इसे विचार कर लेना चाहिए।

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