पुष्य नखत सिर ऊपर आवा, हौं बिनु नाह मन्दिर को छावा।

पुष्य नखत सिर ऊपर आवा,
हौं बिनु नाह मन्दिर को छावा।

आजकल सूर्य पुष्य नक्षत्र में गोचर कर रहा है और हमारी दिल्ली जो बारिश को तरसती रहती है वो भी झमाझम बारिश से तर हो गई है।

ये पंक्तियाँ मल्लिक मोहम्मद जायसी ने ‘पद्मावत’ में नागमती के विरह का वर्णन करते हुए लिखी हैं।

चितौड़ के राजा रत्नसेन सिंहलद्वीप पर पद्मावती को पाने की आकांक्षा में गए हुए हैं और इधर उनकी पत्नी नागमती उनके वियोग में विलाप कर रही है।

जायसी ने ‘बारहमासा’ के रूप में नागमती के वियोग का सुन्दर चित्रण किया है और रानी को बारहों महीने में अलग-अलग प्रकार से विलाप करते दिखाया है।

उस समय के अनेकों सूफी मुसलमान कवियों द्वारा, जो अपने काव्यों की रचना की गई, उनमें कथानक हिन्दुओं के जीवनशैली, तीज-त्योहार, आचार-विचार, धर्म-संस्कृति आदि से लिए गए थे। जायसी इन कवियों में मूर्धन्य हैं जिन्होंने अवधी भाषा में इन कथानकों का उत्कृष्ट प्रयोग किया।

गोस्वामी तुलसीदास जी और जायसी दोनों ने ही अवधी साहित्य में अनेकों प्रयोग किये और उसे समृद्ध बनाया। गोस्वामी जी की अवधी में संस्कृत के कोमलकान्त पदों की मिठास है, वहीं जायसी की अवधी में ठेठ गाँव की खुशबू है। उनके शब्दों में देशज शब्दों की बहुलता है। उनके अलंकार और बिम्ब देशी लोगों के रोजमर्रा के जीवन से उठाए हुए हैं।

जायसी ने नागमती को एक रानी के रूप में विलाप करते हुए नहीं दिखाया है, बल्कि उनका चित्रण एक साधारण हिन्दू पतिव्रता गृहिणी के रूप में किया है। जायसी ने वर्णन किया है कि बारह महीने में अलग-अलग ऋतुओं में पति से दूर रहने वाली एक साधारण दुखियारी हिन्दू गृहिणी को अकेले कितनी समस्याओं का सामना करना पड़ता है।

इस पंक्ति में नागमती एक गरीब गृहिणी के रूप में अपना दुख व्यक्त करते हुए कहती है कि बरसात का मौसम चल रहा है और उसमें भी अब तो सूर्य पुष्य नक्षत्र में प्रवेश कर गया है अर्थात अब खूब वारिश होगी। पति परदेश में हैं, इसलिए बरसात में झोपड़ी के छत की ठीक से मरम्मत नहीं हो पा रही है, इस कारण इस भीषण बरसात में घर की छत से पानी टपकने लगेगा और यहाँ रहना मुश्किल हो जायेगा। सब लोग अपने-अपने घर को बचाने में लगे हैं। इसलिए हे पतिदेव! आपके बिना मेरा कोई आश्रय नहीं है जो इस घर की रक्षा करे, इसलिए आप यथाशीघ्र मेरे पास आ जाइये।

ऐसे अनेक सुन्दर उदाहरण जायसी ने दिए हैं। ऐसे उदाहरण दर्शाते हैं कि एक आम हिन्दू भी प्रकृति से कितना जुड़ा हुआ था। आर्द्रा नक्षत्र में जब सूर्य प्रवेश करता है तो भारत में वर्षा आरम्भ हो जाती है और सूर्य के स्वाति नक्षत्र में प्रवेश करने तक वर्षा होती रहती है। इन सब विषयों का ज्ञान अनपढ़ से अनपढ़ हिन्दुओं को भी रहता था।

अभी पचीस-तीस साल पहले तक ये हमारे जीवन का हिस्सा था। मैं जब छोटा था तब अपनी पाँचवी पास इया (दादी) से सुनता था कि हथिया बरस रहा है। इस समय मूसलाधार बारिश होती थी। मैं इया से पूछता कि हाथी कहाँ है, तो वो बोलती कि आकाश में हाथी अपने सूँड़ से पानी फेंक रहा है। अब जब बड़ा हुआ तो पता चला कि वो हथिया हस्त का विकृत रूप है। सूर्य के हस्त नक्षत्र में प्रवेश को ही वो लोग हथिया से संबोधित करते थे।

जैसे-जैसे ये पुराने लोग मिटते जा रहे हैं, वैसे-वैसे हम प्रकृति से कटते जा रहे हैं। आज गूगल ने हमें सूचनाओं से लबालब भर दिया है, पर ये इन सूचनाओं से आत्मीयता पैदा नहीं कर सकता। आत्मीयता पैदा होती है उस वस्तु को अपने जीवन का हिस्सा बनाकर उसके साथ जीने से।

भले ही हमारे पूर्वजों के पास एकसाथ करोड़ों सूचनाओं का अम्बार नहीं था पर उन्होंने अपने सीमित ज्ञान का उपयोग करते हुए प्रकृति के साथ एक ऐसी आत्मीय जीवनशैली का विकास किया था जो जीव और जगत दोनों का अस्तित्व रक्षण करने में समर्थ था।

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