राफेल : विवाद और तथ्य

लड़ाकू विमानों की आवश्यकता वायुसेना को हमेशा रहती है। अब लड़ाकू विमान खरीदना किसी शोरूम पर जाकर मारुति आल्टो कार खरीदने जितना आसन काम नहीं है। कार तो छोड़िए एक स्कूटर खरीदने के लिए भी लोग हर प्रकार से विचार करते है। यह सारी प्रक्रिया बहुत ही जटिल होती है।

मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली UPA 2 सरकार के कार्यकाल में, 31 जनवरी 2012 को राफेल को जेट्स खरीदने के लिए चुना गया था।

वो प्रस्तावित समझौता 126 जेट्स का था। उस समझौते में एक एसकेलेशन क्लॉज था, जिसके तहत 18 जेट्स ‘फ्लाईअवे’ अर्थात तुरंत उड़ने के लिए तैयार जेट्स खरीदने का निश्चय हुआ था, और बचे हुए जेट्स हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) के साथ संयुक्त रूप से बनाये जाने थे।

तय हुई कीमतों में बहुत बातों का समावेश नहीं था। समझौते की कोई भी शर्ते तबतक तय नहीं हुयी थी।

उसके अलावा बचे हुए 108 जेट विमानों का उत्पादन HAL से करवाने के लिए राफेल तैयार नहीं थी। HAL में निर्मित जेट्स की गुणवत्ता की जिम्मेदारी लेने के लिए राफेल तैयार नहीं थी।

यह बहुत ही समय खाने वाला काम था और HAL में निर्मित जेट्स की कीमत फ्रांस में उत्पादित जेट्स की कीमत से 3.7% ज्यादा होगी, ऐसी आशंका व्यक्त की गयी थी। बहुत से बिंदुओं पर सहमति नहीं बन पा रही थी। सरकार बदलने तक यह समझौता हो नहीं पाया।

वायुसेना को जेट्स जल्द से जल्द चाहिए थे, क्योंकि UPA के काल में कुछ भी काम हुआ नहीं था। वर्तमान सरकार ने वायुसेना की जरुरत को प्रमुखता दी। अनेक बैठकों के बाद 23 सितम्बर 2016 को राफेल के साथ एक समझौता हुआ।

वर्तमान समझौते के अनुसार फ्रेंच कंपनी को 50% रकम अर्थात 30,000 करोड़ रुपये भारत में निवेश करने होंगे। यह आजतक का सबसे ज्यादा प्रतिशत का निवेश है। महाराष्ट्र को इसमें बहुत बड़ा फायदा होनेवाला है क्योंकि इसका उत्पादन नागपुर जिले में होगा।

तंत्रज्ञान हस्तांतरण (टेक्नोलॉजी ट्रांसफर), देखभाल, भारत की आवश्यकतानुसार बदलाव, राडार, सॉफ्टवेयर, मिसाइल्स आदि बिंदु समझौते में अंतर्निहित है।

वर्तमान समझौते के अनुसार विमानों का संयुक्त उत्पादन नहीं होना है वरन रक्षा उपयोगी उपकरणों का उत्पादन होगा। इसलिए इस करार में HAL का कोई सम्बन्ध नहीं है।

वायुसेना प्रमुख के वक्तव्य के अनुसार HAL को भले ही तंत्रज्ञान न मिलने वाला हो, लेकिन डिफेन्स एंड रिसर्च आर्गेनाईजेशन (DRDO) को 9000 करोड़ और रिलायंस डिफेन्स को 21000 करोड़ का काम मिलने वाला है।

इसी सम्बन्ध में मुझे इन्टरनेट पर राफेल द्वारा किये गए हालिया समझौतों की जानकारी मिली है-

कतर – मई 2015
6.30 बिलियन यूरो मतलब 50762.40 करोड़
24 जेट प्रति 2115.10 करोड़

इजिप्ट – फरवरी 2015
5.2 बिलियन यूरो 41899.03 करोड़
24 जेट प्रति 1745.79 करोड़

भारत – सितम्बर 2016
7.8 बिलियन यूरो 62280.55 करोड़
36 जेट प्रति 1730.01 की दर से

इसमें करेंसी दर आज का लिया गया है। सिर्फ तुलना करने के हेतु।

भारत को यह जेट्स सस्ते मिले हैं और ज्यादा फायदों के साथ।

समझौता हुआ तब 1646 करोड़ प्रति जेट की कीमत थी। जो UPA के समझौते के अनुसार 1705 करोड़ हो गयी होती। अर्थात प्रति विमान 59 करोड़ की बचत।

UPA और NDA की डील में बहुत अंतर है। मोदी सरकार ने जो समझौता किया है उसके अनुसार 50% सेट ऑफ़ क्लॉज है। हमें चाहिए वैसे स्पेसिफीकेशन है, मिसाइल्स है, ट्रेनिंग, तकनीकी सहायता और मेन्टेनेन्स है। यह सब UPA की डील में नहीं थे।

इन सब बातों का विचार करते हुए सरकार ने प्रति विमान 59 करोड़ रुपए प्रति जेट की बचत की है। सरकार ने यह सारी जानकारी कल ही साझा की है।

अंत में सबसे महत्वपूर्ण अम्बानी विवाद।

अनिल अम्बानी ने कल पत्र के द्वारा खुलासा किया है कि इस समझौते में सरकार की कोई भागीदारी नहीं होती। एक बात जो शायद लोग भूल रहे हो, उन्हें याद दिलाना चाहता हूँ 31/01/2012 को राफेल का फाइनल बिडर के रूप में चयन हुआ था। इसके ठीक 15 दिन बाद अर्थात फरवरी के दूसरे हफ्ते में मुकेश अम्बानी की रिलांयस इंडस्ट्रीज ने राफेल के साथ रक्षा उपकरण सम्बन्धी समझौता किया था।

सुरक्षा सम्बन्धी कार्य बहुत ही जटिल होता है। जहाँ तक हो सका मैंने इसे सरलीकरण के साथ प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। सामान्य नागरिक को इनकी तकनीकी बातें समझ नहीं आती लेकिन एक देश के रूप में हमने इस समझौते में किसी प्रकार का नुकसान नहीं उठाया और न ही हमने किसी को मुंहमांगे दाम दिये, यह हमें ज्ञात होना आवश्यक है। किसी प्रकार का कोई भ्रष्टाचार नहीं हुआ है यह भी जानना आवश्यक है।

झूठे प्रचार में सामान्य लोग फंसते है। उनके ज्ञान में थोड़ी वृद्धि करने का यह छोटा सा प्रयास है।

भारत के निष्कलंक प्रधानमंत्री, रक्षामंत्री निर्मला सीतारमण, जब समझौता हुआ तब तात्कालिक रक्षा मंत्री मनोहर पर्रीकर और वायुसेना प्रमुख धनोआ इन पर विश्वास करना है या झूठा प्रचार करनेवाले लोगों पर, यह मैं आप लोगों पर छोड़ता हूँ।

(श्री आनंद देवधर के मूल मराठी लेख का हिंदी अनुवाद। साभार दीप्ति विटवेकर कुलकर्णी)

पप्पू निकला बोफोर्स ले के

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