2019 के प्रश्न और कसौटियां, जिन पर कसी जानी है मोदी सरकार

देश के राजनैतिक इतिहास के विगत 70 वर्षों में चुनावी मुद्दे बदल जाया करते हैं. नेहरू शासन काल के प्रथम 17 वर्षों को छोड़ दें तो कोई भी दल अगला चुनाव विगत चुनावों में भुनाये गए मुद्दों को दुहराकर नहीं जीत सका है.

2019 भी इसका अपवाद नहीं सिद्ध होने जा रहा है. नोट करके रखें कि 2014 के मुद्दे – वादे – जुमले इस बार कोई भी खास प्रभाव नहीं डाल सकेंगे चाहे सत्ता पक्ष उठाये या विपक्ष ही उनकी याद दिलाने का प्रयास करे.

ध्यान रहे कि बैंकों का राष्ट्रीयकरण, प्रिवी पर्स की समाप्ति, पूर्वी पाकिस्तान का सरेंडर सिर्फ़ एक ही बार (1971) में भुनाया जा सका, आपातकाल (1977) एक ही बार, जनता पार्टी का कुशासन (1980), इंदिरा की हत्या, व बोफोर्स और राजीव गांधी चोर है (1989) राजीव की हत्या (1991) राम लहर (1998) पोखरण औऱ करगिल विजय (1999), किसान कर्ज़माफी और मनरेगा (2009) के आम चुनाव इसके साक्ष्य रहे हैं.

2019 में भी यही पैटर्न रहने वाला है.

ऐसे में नरेंद्र मोदी सरकार के गंभीर समर्थकों से यह अपेक्षा स्वाभाविक रूप से बढ़ जाती है कि वह आगामी आम चुनावों की तैयारी में 2014 के बोझ से बाहर आकर लड़ाई लड़ें.

कुछ प्रश्नों की कसौटियों पर इस सरकार को कसें जिससे कि स्वयं के विश्वास की बुनियाद मज़बूत हो.

1. क्या नरेंद्र मोदी सरकार में जाति आधारित वर्चस्व में लिप्त दबाव समूहों के प्रभाव में कमी आई है एवं आम असंगठित व्यक्ति की लोकतंत्र को निर्देश देने की क्षमता में वृद्धि करने की पहल की गई है?

2. क्या नरेंद्र मोदी सरकार में भारतीय राष्ट्र राज्य की दशा में उल्लेखनीय मज़बूती दर्ज की गई है, तथा भारत देश को पिलपिली महाशक्ति होने के दंश से छुटकारा दिलाने के लिए आवश्यक प्रयास दिखते हैं ?

3. आंतरिक सुरक्षा के मोर्चे पर क्या नक्सली हिंसा एवं इस्लामवादी हिंसा में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई है?

4. क्या इस्लामपरस्त और माओवादी हिंसा के समर्थक समूहों की प्रशासन में दखलंदाजी की हैसियत घटी है?

5. क्या देश के हिंदुओं एवं गैर मुस्लिम अल्पसंख्यकों को पूर्व की भांति एकतरफा संवैधानिक संसाधनों से अब भी भय लग रहा है?

6. क्या एक आम नागरिक के रूप में आपकी खर्च करने, कर्ज़ लेने और कमाई की क्षमता में सामान्य वृद्धि (यहाँ सामान्य वृद्धि से आशय प्रतिस्पर्धात्मक वृद्धि से है ना कि भ्रष्टाचार की रिसावट से हुई अंधाधुंध वृद्धि से) हुई है?

7. क्या समाज के निम्न वर्गों तक सरकारी योजनाओं का लाभ पँहुचता दिख रहा है जिससे उनके सामान्य जीवनस्तर में बदलाव का पक्ष दिखने लगा हो?

8. क्या सरकारी योजनाओं के लाभ निम्न वर्गों तक पहुँचने से लोभ आधारित धर्मांतरण की गतिविधियों पर लगाम लगने की संभावना बढ़ी है?

9. क्या भारतीय सैन्यबलों में उत्साह के लक्षण दिखते हैं, एवं समाज की सामरिक चेतना में वृद्धि दर्ज की गई है?

10. क्या समाज में सार्वजनिक क्षेत्रों के संस्थानों के दशकों तक पिछड़े रहने के कारणों और निदान की चर्चा में बढ़त दर्ज की गई है?

यह कुछ प्रश्न हैं, चुनौतियों के संदर्भ में आप और भी प्रश्न जोड़ सकते हैं, गम्भीर चर्चा करें, सार्थक संवाद करें तभी सभ्यताओं के संघर्ष में आगामी भूमिका निभा सकेंगे, वरना 15 लाख रुपये माँगकर और घण्टा घड़ियाल बजाकर पप्पू जैसे भी चुनौती दे सकते हैं.

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