सेना एक नौकरी है और उसमें लोग रुपये कमाने जाते हैं! भूले तो न होंगे ये कलंकी शब्द

“सेना एक नौकरी है और उसमें लोग रुपये कमाने जाते हैं।”… मुझे नहीं लगता कि सेना और सैनिकों के लिए कहे गए ये कलंकी शब्द किसी भी देशवासी को भूले होंगे।

आइये आज ‘कारगिल विजय दिवस’ पर उन 533 अमर शहीदों में से इन चंद युवा शहीदों की बानगी से गिरोहों के उन आरोपों का नैतिक सत्यापन करें।

कैप्टन सौरभ कालिया

एक ऐसी शहादत, जो जंग शुरू होने से पहले ही दी गयी। सौरभ कालिया और उनके पांच साथियों की। नरेश सिंह, भीखा राम, बनवारी लाल, मूला राम और अर्जुन राम।

सौरभ कालिया की उम्र उस वक्त 23 साल थी और अर्जुन राम की महज 18 साल थी। सौरभ कालिया को फौज की सेवा में बस एक महीने हुए थे, यहां तक कि उन्हें पहली सैलरी भी नहीं मिली थी। वो बटालिक में 6 जवानों की अपनी टुकड़ी के साथ गश्त पर थे।

सौरभ कालिया ने ही सबसे पहले खबर दी कि पाकिस्तान की फौज ने भारतीय पोस्टों पर कब्जा कर लिया है। युद्ध की आशंका से बेखबर सौरभ कालिया अपने साथियों के साथ सीमित गोला-बारूद के साथ गश्त पर निकले थे। पाकिस्तानी सैनिकों से जब उनकी जंग हुई, तो जल्द ही उनका गोला-बारूद खत्म हो गया। इसी का फायदा उठाते हुए पाकिस्तानी घुसपैठियों ने उन्हें अगवा कर लिया।

पाकिस्तान ने सौरभ कालिया और उनके साथियों को अमानवीय यातनाएं दीं। 21 दिनों तक ये भारतीय सैनिक पाकिस्तान का अत्याचार सहते रहे। तीन हफ्ते बाद जवानों के शव क्षत-विक्षत हालत में सेना के पास लौटे, जिनकी पहचान तक करनी मुश्किल थी।

कैप्टन विजयंत थापर

22 साल के इस नौजवान का सपना देश के लिए अपना सबकुछ न्योछावर करने का था। बचपन से ही विजयंत का एक ही सपना था, आर्मी ज्वाइन करने का। उन्होंने अपने जीवन में कुछ और करने के लिए कभी सोचा ही नहीं। विजयंत की पहली पोस्टिंग कश्मीर के कुपवाड़ा में हुई, जहां आतंक सर उठा रहा था।

सेना में विजयंत को सिर्फ तीन महीने ही हुए थे, जब करगिल वॉर छिड़ी। विजयंत अपने कमांडिग ऑफिसर के कमांड पर द्रास पहुंचे, जहां बटालियन 2 राजपूताना राइफल्स को तोलोलिंग से दुश्मनों को मार भगाने का मिशन मिला। 12 जून 1999 को लगातार लड़ाई के बाद तोलोलिंग पर तिरंगा लहराया गया।

शहादत से पहले दुश्मनों को मार गिराया। विजयंत के सामने तोलोलिंग के बाद दूसरी चुनौती थी पिंपल्स और नॉल पर कब्जा करना, जहां से दुश्मन छिपकर गोलियां बरसा रहा था। पंद्रह हजार फीट की ऊंचाई और सीधी चढ़ाई भी विजयंत थापर के हौसलों को डिगा नहीं सकी। इस मुश्किल मिशन में उनकी टुकड़ी के कई जांबाज़ शहीद हो चुके थे, लेकिन विजयंत थापर आगे बढ़ने से रुके नहीं।

वक्त ने विजयंत को उस समय थाम लिया, जब एक सीधी गोली उनके माथे पर लगी और शहादत का तिलक कर गई। सिर्फ 6 महीनों की नौकरी ही विजयंत ने पूरी की और शहादत पर हंसते-हंसते दस्तखत कर दिया।

लेफ्टिनेंट मनोज कुमार पांडे

24 साल की उम्र में ही देश के लिए अपने जान की बाजी लगा दी थी मनोज ने। गोरखा रेजिमेंट के लेफ्टिनेंट मनोज कुमार को 2-3 जुलाई की रात बड़े ऑपरेशन की जिम्मेदारी सौंपी गई। लेफ्टिनेंट मनोज कुमार पांडे को खालुबार पोस्ट फतह करने की जिम्मेदारी मिली। रात के अंधेरे में मनोज कुमार पांडे अपने साथियों के साथ दुश्मनों से लड़ने निकल पड़े।

इस मुश्किल जंग के लिए मनोज कुमार अपनी टुकड़ी के साथ पहाड़ पर बढ़ रहे थे और पहाड़ की ऊंचाई से पाकिस्तानी सेना ने फायरिंग शुरू कर दी। पाक की फायरिंग की कोई परवाह किए बिना मनोज काउंटर अटैक करते हुए और हैंड ग्रेनेड फेंकते हुए आगे बढ़ रहे थे।

सबसे पहले उन्होंने खालुबार से दुश्मनों का खात्मा किया और पहला बंकर ध्वस्त कर दिया। मनोज ने दूसरी पोजिशन पर जमे पाकिस्तानी सैनिकों को मारकर दूसरा बंकर भी ध्वस्त कर दिया।

इसके बाद मनोज कुमार पांडे अपने जवानों का हौसला बढ़ाते हुए तीसरी पोजिशन की तरफ बढ़े और पाकिस्तानी सैनिकों को मारकर उनका बंकर उड़ा दिया। लेकिन इसी दौरान एक एक गोली उनके कंधे और पैर में लगी। गोली लगने के बावजूद मनोज ने दुश्मनों के छक्के छुड़ाते हुए हैंड ग्रेनेड फेंककर पाक का बंकर ध्वस्त कर दिया।

घायल मनोज के सिर पर तभी दुश्मन की एक गोली लगी और वो वीरगति को प्राप्त हो गए। शहादत से पहले वो खालुबार पर भारतीय सेना के कब्जे की नींव रख चुके थे।

मनोज से जब इंटरव्यू में पूछा गया था कि आप सेना में क्यों शामिल होना चाहते हैं, तो उन्होंने जवाब दिया था कि वो परमवीर चक्र हासिल करना चाहते हैं। उनका जवाब सुनकर सब हैरत में पड़ गए थे। मनोज ने अपनी कही बात को सच साबित कर दिखाया।

कैप्टन विक्रम बत्रा

कारगिल लड़ाई के दौरान छुट्टी पर थे, जब उनके दोस्तों ने उनसे कहा था विक्रम संभलकर रहना कारगिल वॉर छिड़ गई है। विक्रम ने यही कहा था कि या तो पहाड़ी पर तिरंगा फहराकर आऊंगा या तिरंगे में लिपटकर आऊंगा।

1997 में विक्रम बत्रा को मर्चेंट नेवी से नौकरी की कॉल आई, लेकिन उन्होंने यह नौकरी छोड़ लेफ्टिनेंट की नौकरी को चुना। 19 जून, 1999 को कैप्टन विक्रम बत्रा के नेतृत्व में भारतीय सेना ने दुश्मन की नाक के नीचे से 5140 प्वाइंट पर कब्जा कर लिया।

बत्रा 7 जुलाई 1999 को इस मिशन के शुरुआती घंटों में दुश्मन के जवाबी हमले के दौरान घायल हुए एक अधिकारी को बचाने के प्रयास में भारतीय सेना की एक टुकड़ी का कमान संभाले हुए थे। इसी मिशन में बत्रा दुश्मनों से लोहा लेते हुए शहीद हो गए।

कैप्टन अनुज नायर

17 जाट रेजिमेंट के अधिकारी थे। जिस वक्त करगिल की जंग में वो शामिल हुए, उस वक्त उम्र सिर्फ 22 साल थी। उन्हें जिम्मेदारी मिली थी पिंपल टू नाम से मशहूर चोटी प्वाइंट 4875 से दुश्मन को खदेड़ने की।

6 जुलाई 1999 को कैप्टन अनुज नायर की चार्ली कंपनी ने बिना किसी हवाई मदद के इस चोटी पर विजय हासिल करने के लिए कूच कर दिया। चोटी की ऊंचाई थी करीब 16 हजार फीट। प्वाइंट 4875 पर पाकिस्तानी सेना ने कई बंकर बना रखे थे। भारी गोलीबारी के बीच कैप्टन अनुज नायर और उनके सात सैनिकों ने हमला बोल दिया।

अकेले अनुज नायर ने पाकिस्तानी सेना के 9 सैनिकों को मार गिराया और तीन मशीनगन बंकरों को तहस-नहस कर दिया, लेकिन चौथे बंकर के हमले के दौरान उनपर एक बम का गोला सीधे आकर गिरा। घायल होने के बावजूद ये अनुज नायर और उनके साथी सैनिकों की जबरदस्त बहादुरी का नतीजा था कि पाकिस्तानी सेना को भारी नुकसान उठाना पड़ा।

इसी बीच दुश्मनों का आरपीजी यानी रॉकेट प्रोपेल्ड ग्रेनेड सीधे कैप्टन अनुज नायर को आ लगा और वो शहीद हो गए। कैप्टन अनुज नायर को उनकी इस बहादुरी के लिए महावीर चक्र से नवाजा गया।

तो ये थे वो रुपये जो ये बच्चे कमाने गए थे!

ये तो महज कुछ बानगियाँ हैं जो उन 533 सहित… आज़ाद भारत के सैन्य इतिहास में देश पर अपने प्राण न्योछावर करने वाले उन तमाम जाने-अनजाने सपूतों की अमर सूची में शामिल हैं।

आइये… आज की शाम अपनी-अपनी जगहों पर शाम 7 बजे, एक दिए… एक मोमबत्ती की जलती लौ से उन्हें नमन करते हुए… रुपये कमाने और सेना को दमनकारी-बलात्कारी कहने वाले कलंकी गिरोहों के वैचारिक अस्तित्व को भस्म करें।

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