बहुसंख्यकों की वैध शिकायतों को सांप्रदायिक कहना, गहरा देता है समाज का सांस्कृतिक विभाजन

सन 2014 में प्रधानमंत्री मोदी के अप्रत्याशित रूप से बहुमत प्राप्त कर सत्ता में आने के बाद शुरू में असहिष्णुता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, फिर दलित, और अब लिंचिंग को लेकर अभिजात्य वर्ग के द्वारा कांग्रेस के समर्थन में हवा बनाने का प्रयास देख रहा हूँ।

एक तरह से उनकी छटपटाहट पर आनंद की अनुभूति तो होती ही है, साथ में उनके फैलाये गए कुतर्कों पर कुछ व्यथा भी। (यहाँ स्पष्ट कर दूँ कि लिंचिंग का, चाहे वे गौ तस्कर, या केरल में आरएसएस के कार्यकर्त्ता, या कश्मीर में सैनिको पर पत्थरबाजी, मैं किसी का समर्थन नहीं करता)।

डूबते को तिनके का सहारा की तर्ज़ पर कभी अवार्ड वापसी, तो कभी JNU में देशद्रोह के नारे, तो कभी कारगिल शहीद की पुत्री – जो एक राजनैतिक दल की कार्यकर्त्ता है – की ट्विटर पोस्ट को प्रमोट करना।

इस लेख में मैं इस अभिजात्य वर्ग या इनके प्यादों के तर्क-कुतर्क का विश्लेषण नहीं करूँगा, यह तो मित्रगण कर ही रहे है। बल्कि यह प्रयास करूँगा कि यह भारतीय अभिजात्य वर्ग कैसे बौद्धिक सत्यनिष्ठा से अलग हो गया, कैसे इसने घटनाओं का विश्लेषण करने की अपनी क्षमता को स्वयं ही त्याग दिया।

जब मिस्र की राजधानी कैरो की सड़कों पर युवा वर्ग ने लाखों की संख्या में जमा हो कर होस्नी मुबारक को सत्ता छोड़ने को मजबूर कर दिया तो उसे और उनके आक्रोश को अरब स्प्रिंग या अरबी बसंत ऋतु कहा गया।

उस समय न्यू यॉर्क टाइम्स में उस जनसमूह की रात की एक फोटो छपी थी, जिसमें हर युवा और युवती के हाथों में एक सेल फ़ोन चमक रहा था। चूंकि मैं उस समय मिडल ईस्ट एंड वेस्ट एशिया डिवीज़न में था, तो उस फोटो की काफी समय तक कार्यालय में चर्चा हुई थी।

इसी तरह की एक भारतीय स्प्रिंग या बसंत ऋतु सन 2014 हो गयी जिसे किसी ने नोटिस भी नहीं किया। क्यों? क्योंकि अभिजात्य वर्ग ने अपने स्वार्थ के कारण कभी सोनिया सरकार को तानाशाह और भ्रष्ट नहीं माना।

अभी भी चार लोग विरोध करेंगे कि वह एक लोकतान्त्रिक सरकार थी, स्वयं सोनिया चुनाव जीती थी। किसे बरगला रहे हैं आप? मीडिया के टोटल कण्ट्रोल ने उन्हें मद से भर दिया था कि उनका एक-एक शब्द आकाशवाणी है।

लेकिन अपने घमंड में उन्होंने यह ध्यान नहीं दिया कि अधिकाँश भारतीय – जो JNU में नहीं पढ़े हैं, अंग्रेजी नहीं बोल सकते, निर्धन और बेरोजगार भी हैं – के पास एक सेल फ़ोन है जिससे वह सूचना का आदान-प्रदान करता है, कब रातों-रात सूचना के वितरण से उनका एकाधिकार चला गया, उस अभिजात्य वर्ग को पता ही नहीं चला।

उन्हें अभी भी विश्वास नहीं हो रहा कि पब्लिक ओपिनियन या जनमत को ढालने या प्रभावित करने की उनकी क्षमता समाप्त हो गयी। एक शब्द में, खलास…!

उनके द्वारा मचाया गया ‘शोर’ अब उन्ही के इको चैम्बर या प्रतिध्वनि कक्ष में ही गूँज रहा है, उसके बाहर नहीं जा रहा। चूंकि वह उसी प्रतिध्वनि कक्ष को ही इंडिया मानते हैं, अतः उनको पता ही नहीं चल रहा कि असली भारत कब उन्हें पीछे छोड़ गया।

अब भारतीय युवा और युवती आतंकवाद के बारे में पढ़ते हैं, उसके पीछे की ज़हरीली विचारधारा को समझ रहे हैं, जम्मू-कश्मीर में पंथ-आधारित अलगाववाद, JNU में हमारे टैक्स से मुटाए हुए 30-35 साल के ‘युवा’ को छात्रवृत्ति और उनके अलगाववादी नारों के बारे में पढ़ रहे हैं।

उन्हें पता है कि समुदाय विशेष की लड़कियों से प्यार करने का क्या परिणाम हो सकता है। उन्हें पता है गौ काटने पर वे आह भी नहीं निकाल सकते, लेकिन एक कार्टून पर दंगा हो जाएगा, जिस दंगे का समर्थन अभिजात्य वर्ग करेगा।

उन्हें यह भी पता है यह अभिजात्य वर्ग, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अपने विरोधियो को नहीं देना चाहता। विभिन्न विचारधारा का इतिहास का सम्मलेन हो या सलमान रश्दी या तस्लीमा नसरीन का लेक्चर, वह तो होना ही नहीं चाहिए।

विरोधियों को छोड़िये, क्या कभी अभिजात्य वर्ग के लोग, जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्षधर है, क्या वे वही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अल्पसंख्यक समुदाय की महिलाओं को देना चाहेंगे? क्या वे कोख पर महिलाओं के अधिकार को स्वीकारेंगे?

जब वे अल्पसंख्यक अधिकारों की बात करते हैं, तो कैसे वे उन्ही अल्पसंख्यकों के द्वारा अपने ही समुदाय के अन्य अल्पसंख्यकों (महिलाओं) के अधिकारों के हनन की अवहेलना कर देते है? जब वह मानवाधिकारों की बात करते हैं, तो वे उसी मानवाधिकार का अभिन्न अंग जेंडर इक्वलिटी या स्त्री-पुरुष समानता को अनदेखा क्यों कर देते हैं?

लिबरल डेमोक्रेसी या ‘सहिष्णु’ लोकतंत्र में बहुसंख्यक वर्ग के अधिकारों की बात करना गलत माना जाता है। यद्यपि बहुसंख्यक समुदाय के लोग साम्प्रदायिकता के सन्दर्भ में नहीं सोचते हैं, यह समुदाय इस बात को लेकर असहज है कि इनकी आस्था का कोई महत्त्व नहीं है।

उनकी इस अनुभूति को सांप्रदायिक करार कर देने से उनमें विद्वेष एवं घुटन बढ़ जाती है। सामान्यतः बहुसंख्यक समुदाय की समस्याओं के बारे में नहीं लिखा जाता क्योंकि उनके हितों के बारे में लिखना politically incorrect या राजनीतिक रूप से सही नहीं माना जाता है।

जब लिबरल या ‘सहिष्णु’ ग्रुप जब बहुसंख्यक समुदाय की वैध शिकायतों को सांप्रदायिक करार देता है तो वह समाज के सांस्कृतिक विभाजन को और गहरा कर देता है।

इनकी कहानियों, इनकी पीड़ा को कौन सामने लाएगा?

और इसी बिंदु पर अभिजात्य वर्ग बौद्धिक सत्यनिष्ठा से अलग हो गया।

‘परिवार’ को भारत के सत्ताशीर्ष पर बनाए रखने के, हम भी तो हैं कुछ ज़िम्मेदार

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