काँग्रेस के 6 दशक के शासन के बावजूद पूरी तरह समाप्त नहीं हो पाए हम

हिन्दू प्रतीकों की राजनीति को अडवाणी, तोगड़िया, कटियार, ठाकरेछाप नेताओं के राजनैतिक अवसान के साथ ही ख़त्म हो जाने दीजिए।

अगर प्रतीकों की सस्ती राजनीति के चक्कर में पड़ेंगे तो त्रिपुण्ड लगाए रामलला के दर्शन करते राउल विंची और बियांका वाड्रा के ऊपर अपनी हिंदुत्व के पुनर्जागरण में उठने की कोशिश करती हुई सभ्यता हार बैठेंगे।

गाय, मंदिर, गँगा, गीता ये सब बचाने-बनाने के लुभावने वादों पर सभ्यता को दाँव पर न लगायें, हिन्दू समाज पर मंडरा रहा ख़तरा इन सब प्रतीकों से कहीं ज्यादा बड़ा है।

हम नहीं समझ पाये तो पूरी सभ्यता और सांस्कृतिक पूँजी हार बैठेंगे, स्त्रियाँ भोगदासी बनेंगी और बच्चे भविष्य के मलिक कफूर और काला पहाड़…

हिन्दू सभ्यता का पुनरूत्थान उसकी मजबूत आर्थिकी, परिष्कृत लोकतंत्र औऱ अत्याधुनिक सैन्यीकरण पर टिका हुआ है।

सभ्यताओं के संघर्ष के इस दौर में हम इन तीनों मानकों पर काँग्रेस के 6 दशक के शासन के बावजूद भी पूरी तरह से समाप्त नहीं हो पाए हैं।

बल्कि उनकी पुरज़ोर कोशिशों के बावजूद विश्व के 5 सर्वश्रेष्ठ देशों में अपनी जगह बनाने में सक्षम रहे हैं, क्योंकि इस दुर्भाग्यशाली सभ्यता में कुछ लोग सत्यनिष्ठा के आदर्शों पर चलते रहे।

समझना होगा कि ख़तरा अभी टला नहीं है बल्कि आज की परिस्थितियों में ज्यादा बढ़ गया है। राहुल – प्रियंका अगर कुम्भ नहाते दिखें, रामलला का दर्शन करते हुंकारा भरें तो समझ लीजियेगा कि भेड़ियों ने भेड़ों के रास्ते का पैटर्न समझ लिया है।

चरवाहे पर विश्वास करना न छोड़ें, सिर्फ़ वही है जो पूरी तरह से आपके लिए सत्यनिष्ठ है। वही आपका चौकीदार है।

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