मॉब लिंचिंग : समझें भारत के हिन्दुओं की पीड़ा

भीड़ की हिंसा पर खूब विमर्श हो चुका देश में, पर शायद ही कहीं इस विषय पर विचार लिए गए हों कि आखिर भीड़ इतनी उग्र क्यों हो रही है।

भारतीय मीडिया इसी के लिए जानी जाती है, उसके यहाँ किसी भी मुद्दे पर कारणों की चर्चा नहीं होती, बस एक दूसरे पर आरोप लगाने की नौटंकी होती है।

हम सब कह रहे हैं कि भीड़ को न्याय करने का अधिकार नहीं, उसे इस देश के कानून पर भरोसा करना चाहिए।

क्या सचमुच हमारे देश की कानून व्यवस्था इस लायक है कि हम या कोई भी उस पर भरोसा कर सके? मुझे समझ में नहीं आता कि लोग किस मुंह से न्याय व्यवस्था पर भरोसा करने के लिए कहते हैं।

मुज़फ्फरपुर में बालिकागृह में रहने वाली आधी से अधिक लड़कियों का पता नहीं कबसे बलात्कार होता रहता है, और यह बलात्कार इसी न्याय व्यवस्था के लोग करते हैं। क्या देश न्याय के लिए उन्हीं बलात्कारी लोगों के भरोसे रहे?

निर्भया, जिसके बलात्कार के बाद पूरा देश जल उठा था, उसके मुख्य अपराधी को यही न्याय व्यवस्था सिलाई मशीन दे कर सम्मानित करती है, और आप कहते हैं कि लोगों को उसी न्याय व्यवस्था पर भरोसा करना चाहिए। निर्भया यदि आपकी बेटी होती और उसका कातिल अफरोज़ यदि सड़क पर मुस्कुराता हुआ मिलता तो क्या करते आप?

देश के किसी भी राज्य के किसी भी पार्टी का कोई नेता यदि हत्या या बलात्कार करे तो उस राज्य की न्याय व्यवस्था वर्षों तक उसे छू नहीं पाती। क्या इसी न्याय व्यवस्था पर लोग भरोसा करें?

भारत में हर वर्ष लाखों हत्या औऱ बलात्कार की ऐसी घटनाएं होती हैं जो कानून के अनुसार ‘क्रूरतम’ की श्रेणी में आती हैं, पर देश की न्याय व्यवस्था उनमें से पाँच को भी फाँसी नहीं दे पाती। क्या देश इसी न्याय व्यवस्था पर भरोसा करे?

श्रीमान! भीड़ यूँ ही हिंसक नहीं हो जाती। भीड़ हिंसक तब होती है जब उसे कानून पर बिल्कुल भी भरोसा नहीं रह जाता।

भारत जैसे देश के नागरिक और उसमें भी हिन्दू यदि इस तरह का व्यवहार कर रहे हैं तो कम से कम उनकी पीड़ा को समझना ही होगा।

हमारे देश का संविधान ही प्रत्येक व्यक्ति को विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता देता है। सनातन ही नहीं, सनातन के विरुद्ध या उसके अंतर्गत बने सभी भारतीय सम्प्रदाय जीव हिंसा का विरोध करते हैं और गाय को पवित्र मानते हैं। इसके बावजूद पिछले सत्तर वर्षों से देश में गाय काटी जाती है।

क्यों?

कहाँ है विश्वास की स्वतंत्रता? दो-चार प्रतिशत नौटंकीबाज प्रगतिशीलों को छोड़ भी दें, तब भी इस देश की अस्सी फीसदी जनता गाय को माँ समझती है। सनातनी, बौद्ध, जैन, कबीरपंथी, नाथपंथी, गोसाईं, वैष्णव, शैव और जाने क्या क्या… सब गोहत्या का विरोध करते हैं। फिर क्यों काटा जाता है गो माता को? इस देश की न्याय व्यवस्था क्यों नहीं इन अस्सी प्रतिशत लोगों के विश्वास की रक्षा कर रही है?

कुछ मक्कार तर्क देते हैं कि हिन्दू भी गोहत्या में भागीदार हैं। मैं कहता हूँ क्यों हत्यारे का धर्म देखा जाय? बात हिन्दू या मुसलमान की नहीं, बात गो हत्या की है। मुसलमान हो, हिन्दू हो या कोई ईसाई-कसाई, क्यों नहीं सज़ा मिलती है इन हत्यारों को? क्यों हमारे सामने कटती रहती है गोमाता?

कैसे ये लोग सीधे सीधे संविधान की धज्जी उड़ाते हैं? क्या कर रही है देश की न्याय व्यवस्था?

चंद लोग देश के संविधान पर रोज थूक रहे हैं और आप कहते हैं कि लोग इस न्याय व्यवस्था पर भरोसा रखें?

यह हर ओर से हार चुकी जनता है श्रीमान! सत्तर वर्षों से इसके विश्वास को लूटा जा रहा है।

भारतीय जनता की हार की पराकष्ठा देखेंगे, यह नेहरू, और अटल जैसे ब्राह्मणों को चुन कर भी हारी, यह वीपी और चन्द्रशेखर जैसे राजपूतों को चुन कर भी हारी, यह लालू और मुलायम जैसे गो-पालकों को चुनकर भी हारी, और यह मोदी जैसे हिंदुत्ववादियों को चुनकर भी हार ही गयी है।

इसने साधुओं पर गोली चलवाती इंदिरा को भी देखा है, इसने कारसेवकों पर गोली चलवाने वाले मुलायम को भी देखा है, और यह अपना वादा भूल जाने वाले मोदी को भी देख रही है। और आप कह रहे हैं कि सदा की पराजित प्रजा कानून व्यवस्था पर भरोसा कर के चुप रह जाय?

हमारी आँखों के सामने से रोज़ गायों से भरा ट्रक निकलता है जिसमें बोरे की तरह एक पर एक कर लादी गयी गायें काटने के लिए जाती हैं। हम और हम जैसे असंख्य, इसी कानून के भरोसे और अपनी कायरता के कारण चुप रह जाते हैं। पर कुछ हैं जो यह देख नहीं पाते।

वे किसी सर्वेश तिवारी की तरह कायर नहीं हैं, उनसे बर्दाश्त नहीं होता और वे हाथ उठा देते हैं। आप उन्हें लफ़ंगा कहिये, हत्यारा कहिये, जो मन में आये कहिये, पर मेरी नज़र में वे हर ओर से हार चुके लोग हैं जिन्हें इसके अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं दिखता।

जेल जाने से डर उन्हें भी लगता है, सज़ा के डर से वे भी डरते हैं। वे धर्म के नाम पर चलने वाले किसी आतंकवादी प्रशिक्षण शिविर से ट्रेनिंग लेकर आये लोग नहीं हैं, वे लोग भी हमारी ही तरह लफड़े से बच कर चलने वाले लोग हैं। बस उनसे बर्दाश्त नहीं होता… वे भी जब किसी लफड़े में कूदते हैं तो जैसे अपना सब कुछ हार कर ही कूदते हैं। आप उनकी हार को मॉब-लिंचिंग कहिये या कुछ और, पर वे मानेंगे नहीं।

सरकार जब जनता के विश्वास की रक्षा नहीं कर पाती है तो जनता को हार कर अपनी रक्षा करनी पड़ती है।

जिनता मन करे उतना कठोर कानून बनाने का नाटक कर लीजिए, यह अब रुकने वाला नहीं। जब तक आप न्याय व्यवस्था को ठीक नहीं करते, जब तक आप इस हारी हुई जनता को विश्वास की स्वतंत्रता नहीं देते, लोग खुद ही न्याय करेंगे।

ऊपर प्रदर्शित तस्वीर कटने के लिए जा रही एक गाय की है जिसकी आँखों में कटी हुई हरी मिर्च डाल दी गयी है, ताकि वह तड़पती रहे और दर्द के कारण बैठे नहीं। बैठी हुई गाय से गाड़ी में ज्यादा जगह रुकती है। यह है हमारा देश…

50 लाख हिन्दुओं की लाशें उस मुंह में थूकती होंगी, जिस मुंह से जिन्ना की तारीफ़ निकले

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