हिंसक भीड़ से हारता क़ानून, या समाज को हिंसक बनाती विधायिका, कार्य पालिका और न्याय पालिका

आज के दैनिक जागरण में एन के सिंह का लेख, जिसका शीर्षक ‘हिंसक भीड़ से हारता क़ानून’ है।

उनके शब्दों में ख़ासे बड़े, मगर कथ्य में टटपूँजिया लेख का लुब्बो-लुबाब ये है कि अलवर में भीड़ के हाथों गो-तस्करी के संदेह में मारा गया अकबर ख़ान उस दिन मारा गया जब संसद में अविश्वास प्रस्ताव के दौरान भीड़ की हिंसा का मामला उठा था और उसके चंद दिन पहले सुप्रीम कोर्ट ने इस पर एक अलग क़ानून बनाने को कहा था।

उनके अनुसार अकबर की जान बचाई जा सकती थी, यदि अलवर पुलिस ने तत्परता और साथ ही संवेदनशीलता का परिचय दिया होता। पुलिस ने अकबर के पास से मिली गाय को पहले गोशाला पहुँचाया। इसके बाद उसे अस्पताल पहुँचाया। तब तक देर हो चुकी थी।

वो लेख में आगे कहते हैं कि आख़िर उग्र भीड़ को कहीं से तो यह भरोसा रहा होगा कि उसकी गुंडागर्दी का कुछ लोग सीधे या फिर दबे-छिपे समर्थन करेंगे, अगर अलवर में दारोग़ा ने घायल अकबर को चंद किलोमीटर दूरी पर स्थित अस्पताल पहुँचाने में क़रीब तीन घंटे लगा दिए तो इसे महज़ फ़ैसला लेने की चूक नहीं माना जा सकता।

शायद पुलिस को पता था कि हत्यारी भीड़ की नाराज़गी महंगी पड़ सकती है। राजस्थान पुलिस का हिस्सा होने के कारण दारोग़ा को यह भी मालूम होगा कि आज के दौर में गोरक्षा सबसे ज़रूरी हो गया है।

ध्यान रहे कि कथित गो-रक्षकों के उत्पात के लिये राजस्थान कुख्यात हो रहा है। एक साल पहले अलवर में ही पहलू ख़ान नाम के पशु व्यापारी की तथाकथित गौरक्षकों ने हत्या कर दी थी।

उन्हें स्वामी अग्निवेश की कुटाई, अख़लाक़ के वध, गाय के नाम पर मनमानी से पीड़ा है। उनके अनुसार ‘यह सुनना-पढ़ना शर्मनाक है कि लोग गौमाँस खाना छोड़ दें तो भीड़ की हिंसा बंद हो जाएगी। यह सलाह कम धमकी ज़्यादा लगती है एक ऐसी धमकी जो संविधान के लिए ख़तरा बनती जा रही है। यह बयान तो सीधे-सीधे धमकी ही है कि अगर गौहत्या जारी रहेगी तो गाय के नाम पर हत्याएं होती रहेंगी।

पूरा लेख जिस मानसिकता से लिखा गया है उससे स्पष्ट है कि लेखक भारत के मानस, भारत के मूल संस्कार से बिलकुल अनभिज्ञ है। जैसा स्वतंत्रता के समय सत्ता संभाल रहे नेहरू और नेहरूवादियों ने भारत को सोचा, माना और बरता, वही सोच ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन के इस सदस्य और कथित वरिष्ठ स्तम्भकार एन के सिंह की भी है।

इस बात को लेख में बिलकुल गोल कर दिया गया है कि अकबर ख़ान और पहलू ख़ान दोनों ज्ञात गौ-तस्कर थे। गौ-तस्करी में पहले भी गिरफ़्तार हुए थे और ज़मानत पर थे। भारत में अधिकाँश प्रदेशों में गौ संरक्षण की स्थिति लेखक की जानकारी में सम्भवतः नहीं है। यहाँ गौरक्षण के लिए सक्रिय लखनऊ के अधिवक्ता श्री विवेक मिश्र की पंक्तियाँ उद्धृत करना उपयुक्त होगा।

1. संविधान के directive principles के आर्टिकल 48 में राज्यों को गौ एवं गौवंश की हत्या रोकने के सम्बन्ध में स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं और 28 में से 23 राज्यों में (केरल एवं पूर्वोत्तर राज्यों को छोड़कर) इसपर बाक़ायदा क़ानून बना हुआ है। जम्मू कश्मीर में तो यह पूर्ण रूप से प्रतिबंधित है।

2. आज़ादी के बाद जब गौहत्या पर विवाद उठा तो नेहरू ने एक ‘दातार सिंह कमेटी’ बनायी जिसकी 1948 में recommendation थी कि गौहत्या पूर्ण रूप से प्रतिबंधित की जाये लेकिन नेहरू ने उसे रद्दी की टोकरी में फिंकवा दिया।

3. इन सबके बाद 2006 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक निर्णय में गौहत्या को पूर्ण रूप से प्रतिबंधित किया है।

नेहरू और उनकी परम्परा के एन के सिंह जैसे महानुभावों को कभी यह नहीं सूझता कि आख़िर गौ वंश की हत्या, गौ-तस्करी पर रोक लगाने की आवश्यकता क्यों पड़ी? क्या कारण है कि गौ तस्करी आधी रात को की जाती है? किस डर से खेतों-खेतों हो कर गौवंश को चुपचाप ले जाया जाता है?

अभी 10 दिन पहले बझेड़ा-पिलखुआ में आधी रात को खेतों में गौवंश बंधा देख कर क्यों हिंदू पराये गौवंश बचने के लिये टूट पड़े और एक शांतिदूत मारा गया? ये गौवंश उनका नहीं था तो पराये पशुओं के लिये ऐसी चिंता किस लिये की गयी जिसका परिणाम 302 की धारा में जेल जाना हुआ?

एक सवाल यह भी बनता है कि क्या आपमें से कभी किसी ने सुना है कि बकरे को काटते समय हिंदुओं ने काटने वालों पर हर-हर महादेव कह कर लठ पेला? उनकी छातियों में भाले भोंक दिए? उनकी गर्दनें खड्ग से उतार लीं?

इस चिंतन के लोग टी.वी. की बहसों में भी कह रहे हैं कि ‘क्या सरकार तय करेगी कि मैं क्या खाऊं क्या ना खाऊं’।

इन प्रश्नों में ही इनके उत्तर बल्कि एक ही उत्तर निहित है। “मैं (यहाँ मैं का अर्थ हिन्दू समाज लीजिये) गाय को माँ मानता हूँ और मुझे पता भी लगेगा कि किसी ने गौहत्या की कोशिश की या करने जा रहा है तो मैं इसे अपनी माँ की हत्या की तरह ही मानूँगा।”

गौरक्षा के क़ानून भी इस लिये बने हैं कि वो मेरी माँ है। गौ-तस्करी आधी रात को इसी डर से की जाती है। इसी कारण अलवर में कुटाई के कारण मारा गया अकबर या रकबर मेरे लिये दुरात्मा है और उसके वध के लिये धारा 302 में गिरफ्तार श्री सरदार परमजीत सिंह जी और श्री धर्मेंद्र यादव मेरे लिए ‘श्री’ लगाने योग्य बंधु हैं।

अंतिम प्रश्न का उत्तर यह है कि सरकार बहुत से विषयों के साथ-साथ खाने-पीने के लिये नियम तय भी करती है। आप अफ़ीम-हेरोइन-एल.एस.डी का सेवन नहीं कर सकते। आप मोर, काले हिरण, जंगली सुअर जैसे बहुत से पशुओं की बात छोड़िये घरों में उड़ती फिरने वाली गौरेया का मांस भी नहीं खा सकते। आप बिना लाइसेंस के आग्नेयास्त्र नहीं रख सकते।

मुझे ‘सैटेनिक वर्सेस’ अमरीका से लेनी पड़ी। यह पुस्तक भारत में ख़रीदी-बेची नहीं जा सकती। अली सीना साहब की पुस्तक ‘अंडरस्टैंडिंग मुहम्मद’ इंटरनेट से पढ़नी पड़ी। भारत में उपलब्ध नहीं है। ऐसा ही बहुत कुछ है जिसकी सरकार द्वारा वर्जना है। बाक़ी बातों की तो चलिये अवहेलना कर भी दी जाये मगर गौ के साथ तो माँ का पूज्य-भाव जुड़ा है।

आपको सूझता क्यों नहीं कि आख़िर क्यों अलवर में दारोग़ा जी ने अकबर ख़ान को अस्पताल पहुँचाने से पहले गौ को गौशाला पहुँचाना आवश्यक समझा? थाने वालों के लिये कराहते, हाय-हाय करते अकबर को अस्पताल पहुँचाने की जगह भूखी-प्यासी-थकी गौ की रक्षा प्राथमिकता क्यों थी?

इसे समझने में भारत की महान परम्परा से घृणा करने वाले वामपंथियों, नेहरूवादियों, जे.एन.यू. के कुचर्चित दुष्टों, की तरह एन के सिंह भी अक्षम हैं। आप भारत को जो बनाना चाहते हैं वो बरसों की कोशिश से भी नहीं बन पाया। अपने सभ्य विश्वासों, जीवन मूल्यों की रक्षा के नियत कार्यों से चूकती विधायिका, कार्य पालिका और न्याय पालिका के खिन्न हो कर अब वो स्वयं अपने हाथ में न्याय लेने पर आमादा है।

समाज का गौ-तस्कर को दंड देना अर्थात न्याय अपने हाथ में लेना मूलतः विधायिका, कार्य पालिका और न्याय पालिका के अपनी ज़िम्मेदारियों में असफल होने का परिचायक है।

कृपया समाज को अहसास कराइये कि उस पर उसके लोगों का शासन है। उसकी भावना समझने में सक्षम लोगों का शासन है, अन्यथा गोरे अँग्रेज़ चले गए और काले अंग्रेज़ उनकी जगह आ गए। ‘खाल का रंग भर बदला है, शासनकर्ताओं की मानसिकता वही है’, का भाव जँगल के क़ानून ही उपजायेगा।

राजनीति राष्ट्र हित का माध्यम है, लक्ष्य नहीं

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