Vertical Farming : किसानों की सोच बदल सकती है किस्मत भी

संक्षेप में इतना कहूँगा कि इसमें विशेष तरह की बहुमंजिला बिल्डिंग्स बांधकर उनमें स्पेशल तरह की इक्विपमेंट लगाकर वहाँ सब्ज़ी तरकारियाँ उगाई जाती हैं।

उसमें मिट्टी खाद आदि नहीं लगते, बल्कि आवश्यक पोषणद्रव्यों को यथोचित मात्रा में पानी में मिलाया जाता है और अनवरत फसल उगाई जाती है। सीज़न का कोई परिणाम नहीं।

बिज़नस करनेवालों के लिए इसके लाभ ये हैं कि गाँव से फ्रेश सब्जियाँ लाने का समय, उन्हें फ्रेश रखने के लिए रेफ्रीजरेटेड ट्रक्स, वहाँ से स्पेशल ट्रेनिंग दिये लोडर्स वगैरह सभी पर खर्चा बच जाएगा।

पहले उनकी बचत और आगे चलकर मुनाफा होगा क्योंकि शहरियों को तो आज की तारीख में इन सभी खर्चों को जोड़कर जो दाम आता है वह देने की आदत पड़ चुकी है। ये बिज़नसमेन तो ये बचत ग्राहकों को पास ऑन करने से रहे।

बिज़नसमेन को मुझे कुछ नहीं कहना क्योंकि उससे कोई लाभ नहीं है। उनकी आदतें बदलने का ग्राहक में कोई सामर्थ्य नहीं है तो बोलकर क्या फायदा? मैं इस बात का किसान पर क्या असर होगा उसकी बातें करूंगा।

सब्ज़ी उगानेवाले किसान मरेंगे अगर वे अपने उत्पाद बेचने के लिए शहर पर निर्भर हैं। जितने वे शहर से दूर रहेंगे, उतना उनका उत्पादन का खर्चा महंगा होता जाएगा, महज ट्रांसपोर्ट दाम के कारण।

इसलिए गांवों में पहले ही सर्वमत से तय हो कि कौन सब्जियाँ उगाएगा और कौन अनाज ताकि गाँव की जनता को सब्जी मिलती रहे, किसी को तो उगानी ही होंगी। मुनासिब दाम देने से कतराना नहीं चाहिए क्योंकि अगर दूर से आएगी तो महंगे दाम ही देने होंगे।

किसी से स्वार्थत्याग की अपेक्षा रखना मूर्खता होगी, झगड़कर केवल एक दूसरे को नुकसान करने के हेतु सब एक ही चीज उगाएँगे जिसको उतने खरीदार भी न होंगे। अगर प्लानिंग होगी और सब के लाभ का ध्यान रखा जाएगा तो सब कमाएंगे, सभी के घर लक्ष्मी का वास होगा।

अनाज उगानेवाले किसानों को कॉर्पोरेट कंपनियाँ अप्रोच करेंगी। पहले लुभावने दाम की ऑफर करेंगी लेकिन उसके लिए ऐसे एकतरफा कांट्रैक्ट करेंगी कि किसान जिंदगी से जाएगा। ज़मीन बंजर हो जाएगी और बस पछताना नसीब होगा।

बेहतर होगा कि GMO और केमिकल खाद से फसल न उगाकर गोबर, भेड़ बकरी की मींगनी तथा मुर्गियों की बीट जैसे उच्च मात्रा वाले नैसर्गिक खाद का प्रयोग करे, ज़मीन बंजर हो चुकी हो तो गाँव उसे एक साल सहारा दे ताकि वो जमीन को नैसर्गिक खाद से दुबारा उर्वर कर सके।

उसके बाद अन्यों के ऐसे पुनर्वसन में उसको भी हिस्सा उठाना होगा। बड़े ज़मींदारों को चाहिए कि अपने खेतों को part by part खाली छोड़कर नैसर्गिक खाद से उर्वर करते जाएँ।

मल्टी लेयर फ़ार्मिंग से भी फायदा उठा सकते हैं। अनाज तथा तिलहन दलहन को नजदीकी शहरों में सीधा बेचा जा सकता है। एक्सपेलर के बजाय बैल की चक्कियाँ, घानी आदि काम आ सकती हैं, जिससे प्राकृतिक गुणों की हानी नहीं होती।

आज ये स्टोर्स में बहुत महंगे दामों पर बिक रहे हैं, किसान अगर ग्राहकों से तालमेल साध लें तो दोनों का लाभ हो सकता है। यहाँ ग्राहक को नियोजन करना होगा, और जब जो चाहूँ वो चीज़ उपलब्ध होनी चाहिए यह आग्रह छोड़ना होगा, तो लाभ ही लाभ है। वैसे भी हर चीज़ हर ऋतु में खाने योग्य नहीं होती।

आप कृपया गूगल और यू ट्यूब पर इससे संबन्धित जानकारी प्राप्त करें, स्वयं पढ़ें, स्वयं देखें, तसल्ली करें ।











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