हर दिन के लिए हो एक नया लक्ष्य

कुछ दिनों पहले श्याम सुन्दर अग्रवालजी की एक लघुकथा पढ़ी- संतू

प्रौढ़ उम्र का सीधा-सा संतू बेनाप बूट डाले पानी की बाल्टी उठा जब सीढ़ियाँ चढ़ने लगा तो मैंने उसे सचेत किया, “घ्यान से चढ़ना। सीढ़ियों में कई जगह से ईटें निकली हुई हैं। गिर न पड़ना।”

“चिंता न करो, जी! मैं तो पचास किलो आटे की बोरी उठाकर सीढ़ियाँ चढ़ते हुए भी नहीं गिरता।”

और सचमुच बड़ी-बड़ी दस बाल्टियाँ पानी ढोते हुए संतू का पैर एक बार भी नहीं फिसला।

दो रूपए का नोट और चाय का कप संतू को थमाते हुए पत्नी ने कहा, “तू रोज आकर पानी भर दिया कर।”

चाय की चुस्कियाँ लेते हुए संतू ने खुश होकर सोचा-“रोज बीस रुपए बन जाते हैं पानी के। कहते हैं अभी नहर में महीना और पानी नहीं आनेवाला। मौज हो गई अपनी तो !”

उसी दिन नहर में पानी आ गया और नल में भी।

अगले दिन सीढ़ियाँ चढ़कर जब संतू ने बाल्टी माँगी तो पत्नी ने कहा, “अब तो ज़रूरत नहीं। रात को ऊपर की टूँटी में भी पानी आ गया था।”

“नहर में पानी आ गया! ” संतू ने आह भरी और लौटने के लिए सीढ़ियों पर कदम घसीटते लगा। कुछ क्षण बाद ही किसी के सीढ़ियों में गिरने की आवाज हुई। मैंने दौड़कर देखा, संतू आँगन में औधे मुँह पड़ा था। मैंने उसे उठाया। उसके माथे पर चोट लगी थी।

अपना माथा पकड़ते हुए संतू बोला, “कल बाल्टी उठाए तो गिरा नहीं, आज खाली हाथ गिर पड़ा।”

कई बार बड़ों की कही हुई बड़ी-बड़ी बातें या मोटी-मोटी दार्शनिक किताबें वह नहीं सीखा पाती, जो बात छोटी-छोटी घटनाएँ सीखा जाती है। लक्ष्यहीन जीवन में न सपने होते हैं न कर्म। इंसान के पास यदि कोई लक्ष्य न हो, तो उसका आत्मविश्वास डगमगाने लगता है और फिर जरा-सी ठोकर में ही वह निराशा के गर्त में जा गिरता है।

ऐसे कई अनुभव आपको भी हुए होंगे जब कई दिनों तक आपके पास कोई अर्थपूर्ण कार्य न हो और आपका दिन या तो बुद्धू बक्से के सामने गुजरा हो, या इंटेलीजेंट बक्से के सामने या सिर तक चादर ओढ़े गुनगुनाते हुए…… दिल ढूँढता है फिर वही फुर्सत के रात-दिन……

यह फुर्सत के दिन केवल जीवन की आपाधापी से चुराए हुए पल नहीं होते, यह फुर्सत के दिन वह भी हो सकते हैं, जब आप अपनी दिनचर्या से उबकर कुछ नया न कर पाने का अफसोस मना रहे होते हैं।

हम दिन रात कम्प्युटर मोबाइल में घुसे रहने वाले एक बात बहुत अच्छे से जानते हैं कि जब कोई वेब पेज नहीं खुलता तो एक ऑप्शन होता है रिफ्रेश का, बस क्लिक किया कि दोबारा से नई शुरुआत। ऐसा ही एक बटन हमारे पास भी तो होता है रिफ्रेश का, जिसे हम मूड कहते हैं। बस मूड बदला नहीं कि दिन की शुरुआत भी बदल जाती है।

एक दिन मस्ती का मूड, एक दिन चिंतन का मूड, एक दिन कुछ अच्छा पढ़ लिया तो एक दिन कुछ न कर के खुद से मिल लिया। एक दिन दोस्तों से गप्पे, तो एक दिन गंभीरता से शुरुआत। देखा हर दिन एक नए मूड के साथ शुरू करें तो जीवन में एकरसता नहीं आएगी। हमें रिफ्रेश होने के लिए फुर्सत के दिन नहीं ढूँढना होंगे।

जीवन में हर दिन एक नया लक्ष्य होगा और नया परिणाम। खाली हाथों से गिर पड़े इससे पहले हर दिन का एक नया लक्ष्य बना लिया जाए, तो जीवन कभी लक्ष्यहीन नहीं लगेगा।

किसी को पढ़ने या सुनने में हिचकना क्यूं नहीं चाहिए?

VIDEO : संतुष्टि और सुख, सफलता के दो सगे भाई

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY