और फिर वक्ता अगर मोदी जैसा हो तो…!

शेक्सपीयर का एक बहुत ही प्रसिद्ध नाटक है जूलियस सीज़र। यूपी बोर्ड की इंटरमीडिएट की कक्षा के अंग्रेजी विषय में इसे पढने का मौका मिला था।

वैसे तो आप इसके कथानक से भलि भांति परिचित होंगे। इसलिये सीधे मुद्दे से जुड़े उद्धरण पर ही आता हूं।

नाटक में जब छह षडयंत्रकारियों द्वारा जूलियस सीज़र की हत्या कर दी जाती है तो उसका दाहिना हाथ समझा जाने वाला मार्क एंटनी, ब्रूटस को विश्वास में लेकर सीज़र के दाह संस्कार और उससे पहले जनता के बीच एक भाषण के लिये सबको राजी कर लेता है।

तमाम विरोधों के बावजूद खुद को आदर्शवादी साबित करने के फेर में ब्रूटस इसके लिये इस शर्त पर तैयार होता है कि भाषण के दौरान सीज़र के नाम तथा उसकी मौत के कारणों का जिक्र नहीं होगा।

शहर के चौराहे पर एक मंच पर सीज़र की लाश रखकर भाषण का कार्यक्रम शुरू होता है। एक एक कर सभी वक्ता आते हैं और बोलकर चले जाते हैं। फिर जब ब्रूटस की बारी आती है तो वह तमाम तर्कों के द्वारा सीज़र की मौत को न्यायसंगत साबित कर देता है।

खुद को सीजर का सबसे अच्छा मित्र बताते हुये वह सीज़र की हत्या को देशहित में किया गया कृत्य बताता है तो जनता उससे एकदम संतुष्ट हो जाती है। भीड़ के बीच से से आवाजे आने लगती हैं कि ब्रूटस को ही सीजर बना दिया जाय।

इसके बाद सबसे अंतिम वक्ता के रुप में मार्क एंटनी की बारी आती है। तमाम बंदिशों के बीच वह बोलना शुरू करता है और एक एक करके उन तमाम तर्कों को खारिज करता है जो उससे पहले के वक्ताओं ने सीज़र की मौत को न्यायपूर्ण साबित करने के लिये दिये होते हैं।

विशेषकर ब्रूटस की कही एक एक बात को वह अपने तर्कों और चतुराई भरे भाषण से ऐसे काटता है कि जनता के बीच से सीज़र की वसीयत पढ़कर सुनाने की आवाजें आने लगती हैं।

जनता के दबाव में ब्रूटस और उसके साथी मौन रहते हैं और एंटनी मंच से ही सीज़र की वसीयत पढ़कर लोगों को सुनाता है जिसमें वह सबकुछ जनता को देने का वादा किये हुये है।

इसके बाद जो जनता अब तक ब्रूटस के जयकारे लगा रही थी वही जनता ब्रूटस और उसके साथियों के खून की प्यासी हो जाती है। इसके बाद वही होता है जो एंटनी चाहता है। बाकी सब कथानक आप जानते ही हैं कि कैसे जनता विद्रोह करती है और सीज़र के सभी हत्यारे मारे जाते हैं।

यह कहानी यहां सुनाने का मंतव्य बस इतना भर है कि पिछले सप्ताह जब सदन में अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा चल रही थी तो पूरे देश के लोगों ने उसके सजीव प्रसारण को टीवी के माध्यम से देखा।

वैसे तो अविश्वास प्रस्ताव टीडीपी की ओर से लाया गया था जिनका बस आंध्र प्रदेश के राजनैतिक हितों से ही मतलब था। लेकिन कांग्रेस और बाकी विपक्षी दलों ने उसका समर्थन इस गरज से किया था कि संख्याबल न होने के बावजूद भी चुनावी वर्ष में सरकार के खिलाफ बोलकर वह जनता के दिलों में अपनी जगह बना लेंगे।

लेकिन विपक्षी एक महत्वपूर्ण बात को नजरंदाज कर बैठे कि उनका मुकाबला मोदी से है और वाक पटुता में मौजूदा समय में विपक्ष का कोई भी नेता उनके नजदीक भी नहीं पहुंच सकता। बाकी जो भी हुआ उसे सभी ने टीवी पर देखा।

बात फिर वहीं लाते हुये जूलियस सीज़र की ही चर्चा से इसे जोड़ रहा हूं। इंटरमीडिएट में हम लोग जब बोर्ड की परीक्षा में जाते थे तो इस नाटक से जुड़ा हुआ एक प्रश्न बहुत कॉमन था जो आमतौर पर पूछा जाता था।

प्रश्न यह होता था कि मार्क एंटनी जनता को अपने पक्ष में करने में कामयाब कैसे हो जाता है?

इसके उत्तर में तमाम तर्कों के साथ एक तर्क यह भी था कि वह सबसे अंतिम वक्ता होता है इसलिये उसके पास अपने से पूर्व के वक्ताओं की कही बातों और दलीलों के संबंध में तर्क देने का एक अच्छा मौका उपलब्ध हो जाता है जिसे भुनाते हुये वह ब्रूटस जैसे आदर्शवादी नेता की बातों को भी तर्क द्वारा गलत साबित कर देता है।

कहने का तात्पर्य बस इतना है कि सबसे बाद में आये वक्ता के पास वह तमाम मसाले सहज ही उपलब्ध हो जाते हैं जो उसे अपने पूर्व के वक्ताओं की बातों को धराशायी करने के लिये जरुरी होते हैं। फिर वक्ता अगर मोदी जैसा हो तो?

विपक्ष ने सबसे बड़ी रणनीतिक भूल इस अविश्वास प्रस्ताव को लाकर कर दी। जब सबको पता है कि अविश्वास प्रस्ताव लाने पर पूरे दिन उस पर सदन में पहले चर्चा होती है और फिर अंत में मत विभाजन किया जाता है।

फिर जब मत विभाजन के समय सरकार गिराने भर की पर्याप्त संख्या न हो तो सहज ही समझा जा सकता है कि यह अविश्वास प्रस्ताव महज चर्चा के लिये ही लाया गया था। फिर संसदीय कार्यों में सामान्य प्रक्रिया है कि प्रधानमंत्री का भाषण सबसे बाद में होता है।

ऐसे में विपक्ष को इतना अंदाजा तो होना ही चाहिये था कि उसके द्वारा कही गयी तमाम बातें और दलीलें मोदी जैसे प्रधानमंत्री के भाषण के लिये रॉ-मैटिरियल का काम करेंगी। फिर तो वही हुआ जिसका अनुमान था और डेढ़ घंटे से अधिक समय तक बोलते हुये मोदी ने उन सभी तीरों के वारों को नेस्तनाबूद कर दिया जो दिन भर में उसपर छोड़े गये थे।

काँग्रेस के हाथों में खेल रहे हैं गर्म दूध पीकर मुंह जलाने वाले राष्ट्रवादी

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY