“हिंदू तालिबान”

धर्मनिरपेक्षता; लगता है तुम पराजित हो गई।

आजकल चर्चा तो हिंदू तालिबान की गरम है। शशि थरूर रोज इसका मंत्रजाप करते हैं।

तो ममता दीदी कैसे पीछे रहें? लेकिन इस शब्द का कॉपीराइट त्याग की देवी के अनीश कपूर नाम के एक कलाकार/सिपहसालार के नाम है।

इस शिल्पी ने नवंबर 2015 में मोदी की ब्रिटेन यात्रा के ठीक एक दिन पहले ‘द गार्जियन’ में एक आलेख ठोका जिसका शीर्षक था, ‘India is ruled by Hindu Taliban’।

लिबरल, इस्लामी और धिम्मी जगत में धमाल मच गया। उनके उत्सव की सूचना मिलते ही मैं भी मौका ए वारदात यानी गार्जियन की वेबसाइट पर पहुंच गया।

लुच्चे से आदमी का टुच्चा सा लेख था। घोर निराशा हाथ लगी। पाठकों की टिप्पणियां कहीं ज्यादा रसदार थीं।

“हिंदू तालिबान” पर 800 से ज्यादा कमेंट थे। अनुभव से जानता हूं कि गार्जियन या न्यू यॉर्क टाइम्स जैसे अखबारों में छपे आलेखों पर टीका टिप्पणी करने वाले टुटपूंजिए नहीं होते।

कई बार लेख और लेखक दोनों की धज्जियां उड़ जाती हैं या अक्सर इन टिप्पणियों में काउंटर व्यू के रूप में ऐसी चीजें मिल जाती हैं जिसे लेखक छिपा रहा था।

क्रोध के वशीभूत मैंने लगभग सारे कमेंट पढ़े और कपूर साहब की तेरहवीं होते देखा।

बहुत से लोगों ने कहा कि आखिर इस तरह के पड़ोस में रहने, चौतरफा इस्लामिक आक्रमण झेलने के बावजूद हिंदू तालिबान के उदय में इतना विलंब क्यों हो रहा है?

बहुतों ने लिखा कि हिंदुओं को अपनी सुरक्षा करनी है तो यह होना ही है। बहुतों ले लिखा कि यह स्वाभाविक सी बात है जब पाकिस्तान जैसे इस्लामी पड़ोसी हों।

असली तालिबान और काल्पनिक तालिबान की भी चर्चा हुई। इस्लामोफोबिक होने का आरोप न लग जाए, इसलिए गार्जियन ने सैकड़ों टिप्पणियां डिलीट की होंगी।

यह वाहवाही लूटने की अनीश कपूर की एक नेक कोशिश थी जो शायद उल्टे पड़ी। एक तथ्य तो स्थापित हो गया कि दुनिया में और भी बहुत से पीड़ित हैं जो हिंदू तालिबान के उदय का स्वागत करने को तैयार बैठे हैं।

पिछले चार-पांच वर्षों में हिंदुओं में अपने धर्म, संस्कृति और परंपरा के प्रति आग्रह और जागरूकता काफी तेजी से बढ़ती है। स्वाभाविक है कि कुछ लोगों को अपने वर्चस्व के बजाय अब अस्तित्व की चिंता सताने लगी है।

लिबरल, वामिस्लामी और धिम्मी बेचैन हो उठे हैं। अब हिंदू तालिबान जैसे जुमले रोज उछाले जाएंगे और पूरा प्रयास रहेगा कि हिंदू पुनर्जागरण की इस प्रक्रिया को अवैध, आपराधिक और पाषाणकालीन साबित कर दिया जाए।

ध्यान दें कि वामिस्लामी हमें सिर्फ इस्लामी देशों की आपसी मारकाट का उदाहरण देकर डराते हैं। इज़राइल और जियोनिज़्म से हमारी तुलना उन्होंने कभी गांजा पीकर भी नहीं की। आप समझ सकते हैं क्यों…। इसलिए वे हमारी तुलना हमेशा तालिबान से करेंगे। इरफान हबीब तो आईएस से भी कर चुके हैं।

इसलिए इस जुमलेबाज़ी पर रत्ती भर ध्यान देने की जरूरत नहीं है। “ट्रिगर वार्निंग” लैंग्वेज इनका सबसे प्रिय हथियार है। अतिशयोक्तियों/ हाइपरबोल के इस दौर में शब्द भी थोड़ा भारी भरकम होने चाहिए। पर भारी भरकम शब्दों के छिछोरे इस्तेमाल के अपने खतरे हैं।

धर्मनिरपेक्ष जमात सांप्रदायिकता के खतरे गिनाती रही और लोगों ने इसका मतलब तुष्टीकरण निकाला। अब तालिबानी जुमला उछाला जा रहा है।

कहते हैं कि शब्दों का चयन सोच समझ कर करना चाहिए। कौन जाने कब किसकी वाणी में सरस्वती जी विराजमान हैं। सेक्यूलर कहावत है कि No one can stop an idea whose time has come. यहीं समाप्त, आगे स्वयं समझें।

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