बनिए आज़ाद देश के ‘आज़ाद’

चंद्रशेखर सीताराम तिवारी प्रचलित नाम चंद्रशेखर आज़ाद जन्म 23 जुलाई 1906 – शहादत 27 फरवरी 1931।

आज़ाद और बिस्मिल का ये देश आज भले ही भटका दिखता हो लेकिन संघर्ष का वो समय हमारे लिए एक बहुत ही खूबसूरत, शानदार और फ़क्र देने वाला एक इतिहास लिख रहा था।

बेख़ौफ़, बेबाक और सही मायनों में आज़ाद, चंद्रशेखर आज़ाद आज भी हो सकते हैं बस उनकी तरह निस्वार्थ भाव से कोई अपने चरित्र को उतना बड़ा करने का माद्दा रखता हो। जो पूरे देश को अपना घर, हर एक को अपना परिवार और ख़ुद को अपने उसूलों का गुलाम और टुच्ची शोहरत से आज़ाद मानता हो।

मैं जब इलाहबाद गया तो अपने कार्यक्रम से ज़्यादा दिलचस्पी मेरी उस जगह को देखने की थी जहां इस महामानव ने अपने प्राणों को भी अपना ही गुलाम बनाया था। कंपनी बाग में उस जगह पर आज एक भव्य प्रतिमा है, उस पेड़ का तना भी है जहां अंग्रेज उन्हें पकड़ नहीं पाए थे।

जब इस जगह पर मैं गया तो रौंगटे खड़े हो गए थे और आंखों में आंसू थे कि भगत सिंह के गुरू की शहादत यहां हुई और उसके देश में आज का नौजवान सिर्फ उनकी टीशर्ट स्लोगन और शायद कई बार उसके बिना ही काम चला लेता है, जबकि उसकी विरासत उसे वही बनने का मौका देती है जिसके बारे में सोचने भर से सीना चौड़ा हो जाए और हमारी तरफ नज़र उठाने वाला थर थर कांपने लगे।

चंद्रशेखर आज़ाद को मेरा कोटि कोटि नमन।

मैंने तेरे लिए ही सात रंग के सपने चुने…

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