अपनी संस्कृति में अगाध निष्ठा ही राष्ट्र तथा राज्य-सत्ता का आधार हो सकती है

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जब संन्यासी गण भोजन ग्रहण कर चुके तो महाराज और महारानी ने अपने हाथों से उनके जूठे पात्र उठाए और उनके हाथ धुलाकर कुल्ला कराया।

जब यह हो चुका तो काशिराज ने गुरु शंकराचार्य जी के सम्मुख खड़े हो, हाथ जोड़कर विनीत भाव से कहा, “भगवन! इस दास को आप क्या आज्ञा करते हैं?”

स्वामीजी ने महाराज और महारानी को, जो हाथ जोड़े सामने खड़े थे, उपदेश दिया।

स्वामीजी ने कहा, “महाराज! दूर विदेश से एक काली आंधी उमड़ रही है। वह अज्ञान से उत्पन्न हुई है और पूर्ण संसार को अपने अन्धकार में निगल जाने का प्रयास कर रही है। वह जहां-जहां भी जाती है, वहाँ धर्मान्धता का अन्धकार फैलाती जाती है। इससे मानव भारी दु:ख और कष्ट सहन कर रहा है।”

“भारत को इस आंधी से बचाना है। कोटि-कोटि वेदमतानुयायियों को इस तम-तोम से बचाने का प्रयास करना है।”

“इसके लिए राज्य-सत्ता को प्रबल करना तथा राष्ट्र को सुदृढ़ बनाना है।”

“अपनी संस्कृति में अगाध निष्ठा ही राष्ट्र तथा राज्य-सत्ता का आधार हो सकती है।”

“हमारी संस्कृति अर्थात हमारे विश्वास, हमारा आचरण और हमारी परम्पराएं समस्त देश में एक-सामान और श्रेष्ठ हों।”

“समानता उत्पन्न करने का उपाय खंडन नहीं, प्रत्युत समन्वय है।”

“समन्वय उनमें हो सकता है, जो समन्वय करने के इच्छुक हों। सबको जीवनदान ही समन्वय का मूल मंत्र है।”

“इस कारण मैं देश में व्याप्त सैकड़ों मत-मतान्तरों को वेद भगवान के मत के अनुकूल मानता हूँ।”

“पूर्ण जाति में ऐक्य की भावना और कर्मफल तथा पुनर्जन्म पर विश्वास हमको इस आने वाली कठिनाई से मुक्ति दिलवा सकता है।”

(लेखक श्री गुरुदत्त जी के उपन्यास ‘दिग्विजय’ का अंश)

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