एक ही प्रश्न : हम जीवित रहना चाहते हैं या नहीं?

संघ और भाजपा की बहुत सी बातों से मेरी गम्भीर असहमति है। उनकी समझ से, उनकी नीतियों से, उनके व्यवहार से।

शिक्षा और स्वास्थ्य, पर्यावरण के मामले में इस सरकार का रेकॉर्ड अच्छा नहीं है। गंगा पर कुछ काम ठीक से नहीं हुआ।

बोलते बहुत हैं, करते कम हैं। बहुत से गम्भीर विषयों की समझ भी बहुत कमज़ोर है। इनके बीच में बहुत सारे निकम्मे और भ्रष्ट लोग हैं।

भारतीयता की उनकी समझ अक्सर बहुत सतही, बहुत उथली, बहुत दयनीय मालूम होती है। उनके यहाँ भी mediocrity का राज्य है।

पर मैं यह भी जानता हूँ कि ये लोग युद्धरत हैं। युद्ध में हर तरह के लोग भाग लेते हैं – भीष्म भी, कृष्ण भी, शिखंडी भी।

और युद्ध में समझौते करने ही पड़ेंगे – कोई उपाय ही नहीं है, यही युद्ध का स्वभाव है, कृष्ण ने भी किए थे। हाल के समय में चर्चिल और रूज़वेल्ट ने स्टालिन से समझौता किया।

और मैं यह भी जानता हूँ कि ये लोग उसी समाज से आए हैं जो बुरी तरह सड़ चुका है, जिसकी जड़ें खोखली हो चुकी हैं, जहाँ विचार के लिए जगह नहीं बची है, जहाँ सतहीपन और दोमुहेंपन का बोलबाला है।

यह देखना और समझना बहुत मुश्किल नहीं है – हम एक नज़र ख़ुद पर डालें, परिवार और पड़ोसियों पर डालें।

पर एक बात है। ये अक्षम होंगे, इनकी समझ उथली होगी, पर ये भारतीयता के शत्रु नहीं हैं।

जिनसे इनका सामना है, वे सारे के सारे प्रत्यक्ष रूप से भारतीयता के शत्रु हैं। उन्हें हर उस बात से घृणा है जिसे हमारे पूर्वजों ने पवित्र माना था।

ये गोहत्या का उत्सव मनाना चाहते हैं, हो सके और बस चले तो किसी मंदिर में। ये हमारी जड़ें काट देना चाहते हैं, हमें इस देश से उखाड़ कर फेंक देना चाहते हैं।

इनमें वे भी हैं जो प्रत्यक्ष रूप से सिपाही की तरह युद्धरत हैं और वे भी जो इन्हें logistic support मुहैया करते हैं।

ये बॉलीवुड वाले, ये शातिर बुद्धिजीवी, ये तथाकथित पत्रकार, ये दिल्ली की शाम की पार्टियों में व्हिस्की पीकर विद्वत्ता का रोब झाड़ने वाले। ये अमर्त्य सेन जैसे लोग। ये सब एक साथ हैं।

हमें क्या करना होगा? यह कोई मुश्किल प्रश्न नहीं है।

इस प्रश्न का उत्तर एक दूसरे प्रश्न के उत्तर पर निर्भर है और वह प्रश्न है :

हम जीवित रहना चाहते हैं या नहीं?

डाह से डरिए! डाह की आग ने राख की है अच्छे अच्छों की ज़िंदगी

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