मैंने तेरे लिए ही सात रंग के सपने चुने…

‘आनंद’ फिल्म में परदे पर यह गीत गाकर राजेश खन्ना अमर हो गए। ये फिल्म और इसके गाने मुझे बेहद पसंद हैं। राजेश खन्ना का किरदार फिल्म के अंत में मर कर भी जीवन में हर पल मर मर कर जीने वालों को जीने की नई राह दिखा गया।

बहरहाल, गीत में गुलज़ार ने सात रंग ही क्यों कहा, छह या आठ क्यों नहीं? क्योंकि रंग सात ही होते हैं। सात रंगो से ही चित्र बन सकते हैं, सात रंगो से ही दृश्य सजीव होता है।

अतः सपने सात रंग से ही बन सकते हैं, देखे जा सकते हैं। ये बात गुलज़ार साहब को पता थी। किसने बताई होगी?

अजीब सवाल है भाई, यह बात स्कूल कॉलेज से रटाई जाती है। क्यों इंद्रधनुष नहीं पता? उसमें भी तो यही सात रंग होते हैं।

सूर्य की रोशनी की किरण वर्षा की बूदों से छिटक कर सात रंगों में बिखर जाती है। लाल, पीला, हरा, नारंगी, नीला, जामुनी, बैंगनी। इसे इंद्र का धनुष कहा जाता है क्योंकि इंद्र को बारिश का देवता समझा जाता है।

जब वर्षा की बूंदों पर सूर्य की किरणें पड़ती हैं तो यह रिफ्लेक्ट अर्थात तिरछी हो जाती हैं। क्योंकि लाल रंग का प्रकाश कम मुड़ता है जबकि सबसे अंदर की परत बैंगनी रंग की होती है इसलिए इसका प्रकाश सबसे ज्यादा मुड़ता है। रंग अलग अलग कोण बना कर मुड़ते हैं इसलिए सभी रंग बिखर जाते हैं।

यहां वर्षा की बूंदे एक प्रिज़्म का काम करती हैं। वही प्रिज़्म, जिसके माध्यम से हम प्रयोगशाला में सूरज की किरणों को सात रंगों में बिखेरते हैं। सारांश है कि प्रतिदिन जो हम रौशनी देखते हैं वो सफेद नहीं होती बल्कि कई रंगों से मिलकर बनी होती है।

विज्ञान ने इसे प्रिज़्म में देखा और फिर हम सब को कक्षा में पढ़ने के लिए दे दिया। इस प्रिज़्म से निकलने वाले रंगों के क्रम को रटने के लिए हम सब vibgyor (वायलेट, इंडिगो से लेकर रेड) शब्द को रटते थे। आज के छात्र भी ऐसा ही कुछ प्रयोग करते होंगे और शायद रटते भी हों।

मगर क्या प्रकृति से बड़ी कोई प्रयोगशाला हो सकती है? नहीं। जितना आसानी से इंद्रधनुष देख कर सप्त रंग को समझा जा सकता है उतना किसी और माध्यम से नहीं। प्रकृति सनातन की प्रयोगशाला रही है और वेद उसके अवलोकन और अनुभव का अनमोल ग्रंथ। एक दो उदाहरण देखते हैं।

वेदों के अनेक सूक्तों में ऋषियों ने सूर्य की महिमा की है। इनमें सूर्य को विभिन्न रूपकों में चित्रित किया गया है। कई ऋचाओं में सूर्य के रथ में सात घोड़ों के जुते होने का वर्णन है।

यहां तक कि बाद की पौराणिक कथाओं में भी सूर्य के साथ सात घोड़े ही आते रहे हैं। वैदिक ग्रंथों में ये सात घोड़े ही क्यों हैं, छ: या आठ क्यों नहीं? और फिर सूर्य के रथ को खींचने के लिए अश्व को ही क्यों चुना गया? आखिर ये सूर्य को कहाँ ले जाते हैं?

असल में यहां सात घोड़े सात रंग हैं सूर्य की किरणों के। इन सात घोड़ों द्वारा खींचकर अर्थात किरणों के माध्यम से ही तो सूर्य हम तक पहुंचता है। अश्व तीव्रतम है अर्थात सूर्य की रोशनी हम तक तुरंत पहुँचती हैं। अश्व बलशाली है अर्थात किरणें भी तो शक्ति से भरी हुई होती हैं।

ये सात रंग रूपी अश्व मिलकर किरण रूपी रथ को जब हम तक पहुंचाते हैं तब ही हमें सूर्य के दर्शन हो पाते हैं और हम ऊर्जा पाते हैं। अगर ये किरण हम तक ना पहुँचती तो क्या हम सूर्य को जान पाते? नहीं।

ब्रह्माण्ड में अनेक मरे हुए पिंड हैं जिनका हमारे लिए कोई अस्तित्व नहीं। सूर्य हमें इसलिए दिख रहा है क्योंकि उसकी सात रंग वाली किरणें हम तक पहुंच रही हैं।

आप सोच रहे होंगे कि मैं यहां यह सब क्या लेकर बैठ गया। अद्भुत हैं वेद की हरएक ऋचाएं जिसे गुरुकुल में पढ़ाया जाता था। चूंकि ये ज्ञान काव्यात्मक शैली में प्रतीकों के माध्यम से होता था इसलिए जन जन के बीच पीढ़ी दर पीढ़ी, सदियों तक स्थानांतरित होता रहा, बिना रटे हुए। हमें भी तो याद है सूरज के सात घोड़े। लेकिन क्या बस इतना ही कुछ है, वेदों में।

एक ऋचा है पहले मंडल के 164 सूक्त की दूसरी,
सप्त युञ्जन्ति रथमेकचक्रमेको अश्वो वहति सप्तनामा।
त्रिनाभि चक्रमजरमनर्वं यत्रेमा विश्वा भुवनाधितस्थुः।।१. १६४.१।।

साधारण अर्थ है कि,
एक चक्र वाले रथ (सूर्य का एक पोषण चक्र है जिसे एक चक्र वाला रथ कहा गया) में सात घोड़े जोते गए हैं। सात नामों (रंग) वाला यह (एक ही किरणरूपी) अश्व इस रथ को खींच रहा है। (ज्ञान संदेश – ये सात रंग से बनी किरणे हम तक सूर्य का पोषण चक्र पहुंचाती हैं)

आगे कहा गया है कि, इस रथ के कारण ही तीन चक्र (शरद, वर्षा, ग्रीष्म) सतत गतिशील हैं, यह कालचक्र अविनाशी और शिथिलतारहित है जिस पर सारा संसार आश्रित है। यहां कई विद्वान्, नाभि (केंद्र) वाले तीन चक्र का सम्बन्ध पृथ्वी, आकाश और अंतरिक्ष से जोड़ते हैं, जिसे सूर्य सतत गतिशील रखता है इसी चक्र में समस्त लोक विद्यमान् हैं।

इसका साफ़ मतलब हुआ कि इस ऋचा को रचने वाले को यह पता था कि सूर्य की किरणें सात रंग की हैं और सूर्य के कारण ही तीन ऋतुएँ हैं जिनके कारण पृथ्वी पर जीवन चक्र है। अब क्या यह विज्ञान नहीं हुआ? ऐसी अनेक ऋचाएं हैं जिनके हर शब्द में ज्ञान विज्ञान भरा हुआ है। एक और उदाहरण देखते हैं।

द्वादशारं नहि तज्जराय वर्वर्ति चक्रं परि दयां रतस्य।
आ पुत्रा अग्ने मिथुनासो अत्र सप्त शतानि विंशतिश्च तस्थुः।।१. १६४. ११।।

अर्थ है कि ऋतुओं को संचालित करने वाला सूर्य बारह अरों (राशियों) वाला चक्र बनाकर आकाश में घूमता रहता है इस तरह से बारह महीने बनाने वाला ये चक्र कभी पुराना नहीं पड़ता, कमज़ोर नहीं होता। (अर्थात आदि काल से अनादि काल तक ये प्रकृति का चक्र सतत चल रहा है।) हे अग्निदेव इस के एक चक्र में सात सौ बीस पुत्रस्वरूप निवास करते हैं (360 दिन और 360 रातें) या फिर (360 अंश सूर्य के और 360 अंश चंद्र के, इस रूप में भी देखा जा सकता है। जहां सूर्य दिन के लिए चंद्र रात्रि के लिए चक्र का विभाजन कर सकता है।)

अब आप मुझे बताइये कि उपरोक्त ऋचाएं क्या सूर्य की मात्र उपासना हैं? इसके द्वारा दिए गए सन्देश, ज्ञान-विज्ञान और आकड़ों में तब से लेकर अब तक में क्या अंतर आया है?

कुछ भी नहीं। जबकि आप को यह जानकार अभिमान भी होगा और आश्चर्य भी कि वेदों में भी ये अति प्राचीन ऋचाएं हैं। ये दोनों ऋग्वेद के प्रथम मंडल के सूक्तों में से हैं। चूंकि प्रथम मंडल प्राचीनतम हैं अर्थात ये ऋचाएं भी प्राचीनतम हुई। ये वो काल था जब सरस्वती नदी अपने पूरे यौवन रूप में ज़िंदा थी।

अब चूंकि सरस्वती को सूखे हुए भी हजारों साल हो गए तो इस गणना के हिसाब से भी यह कम से कम दस हजार साल पुरानी ऋचाएं हुईं। श्रुति रूप में यह रचना तो इस से भी पहले ना जाने कब की होगी।

मैं जानता हूँ, वामपंथी इस प्रामाणिक तथ्य को स्वीकार नहीं करेंगे। जबकि सब कुछ आप के सामने उपलब्ध है। लिखित प्रमाण होने के बाद भी सनातन के साथ यह व्यवहार क्यों किया गया, समझने के लिए कोई शास्त्र पढ़ने की आवश्यकता नहीं। इसे स्वीकार करते ही कइयों का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा, कइयों की बौद्धिकता की दुकान बंद हो जाएगी।

जिस पश्चिम ने पिछले पांच-सात सौ साल दुनिया पर राज किया, उसका घमंड कितना खोखला है यह इस बात से समझा जा सकता है कि वो लम्बे समय तक पृथ्वी को चपटी माने बैठा था और अपने ही एक वैज्ञानिक को ज़हर देकर सिर्फ इसलिए मरवा देता है क्योंकि उसने पृथ्वी की जगह पर सूर्य के केंद्र में होने की बात की थी। ये सब सात-आठ सौ साल पुरानी बातें हैं।

पश्चिम यह कैसे स्वीकार कर सकता है कि जिस सभ्यता पर उसने दो सौ वर्ष राज किया, उसने दस हजार साल से भी पहले वेद रच दिए थे। अंग्रेजों ने अपनी लाइन बड़ी करने के चक्कर में हमारी लाइन छोटी करनी चाही, वो तो गनीमत है कि वेद थे वरना ये हमे संपेरों का देश ही मानते रहते।

हमारा दुर्भाग्य रहा कि आज़ादी के बाद भी एक ऐसे परिवार ने हम पर राज किया जिन्हें काला अंग्रेज कहा जा सकता है, इस परिवार ने भी हमारी हीन भावना को बनाये रखना चाहा। मगर अब सनातन आर्यों को दबाये रखना संभव नहीं, वे जाग चुके हैं।

पहले ‘वैदिक सनातन हिंदुत्व’ पुस्तक (जो अभी प्रकाशनार्थ है) के कारण और अब ‘मैं आर्यपुत्र हूँ’ लिखने के दौरान ऐसे ऐसे मन्त्र श्लोक ऋचाएं पढ़ने को मिल रही हैं कि मैं उनके भावार्थ में घंटों गोता लगाता हूँ।

मित्रों, अगली बार एक ऐसी ऋचा आप के सामने ले कर आऊंगा जिसे देख कर आधुनिक चिकित्सा विज्ञान अबतक हैरान है। ऐसे अनगिनत अनमोल रत्न इस देवभूमि पर बिखरे पड़े हैं। आवश्यकता है उन्हें एक सूत्र में पिरोकर पुनः आम सरल भाषा में प्रस्तुत करने की। मैं अकेला नहीं अनेक हैं जो इस यज्ञ में अपनी आहुति दे रहे हैं।

उठो आर्य, सात रंग वाले सपनों से जागो, और सात अश्व वाले सूर्य के रथ पर सवार होकर आओ, भूलोक में आप की पहले से अधिक आवश्यकता है।

सनातन को तो जीना है, सृष्टि के साथ, सृष्टि के अंत तक, निरंतर

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