राहुल गांधी तो नहीं, पर हैरान करता है हमारा यह पतन

काँग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने संसद में अविश्वास प्रस्ताव पर बहस के दौरान जो कुछ भी कहा वो भाषा, विमर्श, तर्क और तथ्यों के स्तर पर हास्यास्पद ही कहा जाएगा, और जैसा आचरण उन्होंने किया उसे शोभनीय तो कतई नहीं कहा जा सकता।

यह सब अब मुझे हैरान नहीं करते, क्योंकि पूर्व में भी वो अनेक बार आधारहीन और हल्की बातों के साथ बेहद गैरज़िम्मेदारी भरा व्यवहार करते रहे हैं।

मुझे हैरानी इस बात से भी नहीं हुई कि देश में गांधी परिवार के द्वारा पीढ़ियों से पोषित पत्रकार, लेखक, बुद्धिजीवी, और कलाकार अपने युवराज के जय जयकार में बिना किसी विलम्ब के जुट गए। यह वे पहले भी करते रहे हैं।

यह भी अब धीरे धीरे समझ आ रहा है कि इस गिरोह का विरोध मोदी से उतना नहीं, जितनी राहुल बाबा से मोहब्बत है। हाँ मुझे इस बात का दुःख जरूर होता है कि फेंके हुए टुकड़ों पर पलने वाले इन तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग को पढ़ने के लिए ये देश लम्बे समय से अभिशप्त है।

विपक्ष द्वारा राजनीतिक नेतृत्व के स्तर पर भारत के जनमत के प्रति ऐसा खिलवाड़ भी मुझे हैरान नहीं करता, क्योंकि पूर्व में भी देश का नेतृत्व जब इस परिवार विशेष के किसी भी सदस्य के पास था तब भी, कभी भी कहीं भी कोई ऐसा प्रभावित करने वाला राष्ट्रकर्म नहीं किया गया, ना ही कभी राष्ट्रधर्म निभाया गया।

ऐसा भी नहीं कि इस देश में कोई योग्य राजनेता नहीं हुए। अनेक हुए हैं। उनमें से मैं अगर आज मोदी का समर्थक हूँ तो सिर्फ इसलिए कि वे वर्तमान में उपलब्ध राजनेताओं में सर्वश्रेष्ठ हैं। उनमें आप लाख बुराइयां गिना दें मगर आप उनसे बेहतर एक भी राजनेता नहीं दिखा सकते।

उन्होंने कल, एक मंझे हुए राजनेता की तरह विपक्ष की कमजोर बॉल का सदुपयोग करते हुए गेंद को संसद से बाहर मार कर आम जनता के बीच एक बार फिर अपने आप को स्थापित कर लिया। मगर अब मुझे मोदी मैजिक भी हैरान नहीं करता क्योंकि विपक्ष ने मैदान खाली छोड़ रखा है। अतः वर्ष 2019 के चुनाव का परिणाम क्या होगा, अब वो भी मुझे हैरान नहीं करेगा।

इन सब से इतर, मुझे वे भी हैरान नहीं करते, जो लोग आज भी एक अभिमानी, भ्रमित और विवेकहीन युवराज, जिनके परिवार का एक लंबा अलोकप्रिय इतिहास रहा हो, उसके समर्थन में वोट करते हैं।

मैं अब हैरान इसलिए नहीं होता क्योंकि हिन्दुस्तान में युवराजों की सूची दिन प्रतिदिन लम्बी होती जा रही है। जिसमे उमर, महबूबा, अखिलेश, उद्धव, तेजस्वी, स्टालिन आदि के नाम हैं और अनेक इसमें जुड़ते जा रहे हैं।

ये सभी कितने सक्षम हैं, बतलाने की आवश्यकता नहीं। इन सब नामों को देख-सुन कर अब मैं हैरान नहीं होता बल्कि अपने आप से यह सवाल जरूर करता हूँ कि क्या हम सच में प्रजातान्त्रिक देश हैं?

और फिर यह कहकर अपना परिहास उड़ाता हूँ कि मैं एक राजतंत्र का नागरिक हूँ जहां मेरे भविष्य के शासक वर्ग उपरोक्त राजवंश के उत्तराधिकारी में से कोई हो सकता है। आनेवाले कल की परिकल्पना करते ही मेरे मन में यह जिज्ञासा उत्पन्न होती है कि आखिरकार मैं गुलाम कब से हूँ?

और मैं हैरान होता हूँ जब भारतगाथा पढता हूँ। मैं हैरान होता हूँ जब इस महान देश का पुरातन इतिहास खंगालता हूँ। जब मैं दुनिया का प्राचीनतम ग्रन्थ वेदों का अध्ययन करता हूँ तब हैरान होता हूँ। जब मैं वेद के हर एक शब्दों में भरा ज्ञान का रसास्वादन करता हूँ तो हैरान होता हूँ। जब उपनिषदों के वेदवाक्यों में जीवनदर्शन पाता हूँ तो हैरान होता हूँ।

हैरान इसलिए होता हूँ कि यह अद्भुत है। गीता के सन्देश का जब विश्लेषण करता हूँ तो पाता हूँ कि यह अद्वितीय है, इसकी यही अद्वितीयता मुझे हैरान करती है। रामायण -महाभारत को जब सुनता हूँ तो ऐसी कथा फिर कभी नहीं लिखी जा सकी यह सत्य मुझे हैरान करता है।

जब मैं हड़प्पा और मोहनजोदड़ो के बारे में पढ़ता हूँ और पाता हूँ कि वैदिक आर्यों की नगर सभ्यता उस काल में भी अति विकसित थी यह ऐतिहासिक तथ्य मुझे हैरान करता है।

मेरे हैरान होने का सिलसिला यहां समाप्त नहीं होता। उपरोक्त स्वर्णिम काल को जब विश्लेषित करता हूँ तो पाता हूँ कि वैदिक काल में हम कभी भी व्यक्तिवादी समाज नहीं रहे। उन दिनों हर आम नागरिक आर्य था, अर्थात श्रेष्ठ था।

राजा तो उस कालखंड में भी अनेक हुए, मनु व पुरुरवा से लेकर दिवोदास और सुदास आदि आदि का उल्लेख तो आता है मगर नायक के रूप में नहीं।

त्रेता के राम भी सत्ता के कारण युगपुरुष नहीं कहलाये बल्कि पिता के आदेश पर सत्ता को छोड़ देने के कारण आमजन के द्वारा पुरुषोत्तम कहलाये। श्रीकृष्ण ने महाभारत के बाद हस्तिनापुर पर राज नहीं किया था। और यह परम्परा आगे तक भी चली जब चाणक्य ने चन्द्रगुप्त को राजगद्दी पर बैठाया। हमने विश्व को सत्ता छोड़ने वाला बुद्ध दिया।

यह सूची यहीं समाप्त नहीं होती। यह हमारी आदि परम्परा रही है। हमारे संस्कारों की पराकाष्ठा तब देखने को मिलती है जब इनमें से किसी ने भी अपने लिए, अपने किसी के हाथों कोई इतिहास नहीं लिखवाया, ना ही कोई स्मारक, महल, स्तम्भ खड़े किये, जहां इनके नाम का ध्वज फहराया जा सके।

ऐसे थे मेरे पूर्वज, यह मुझे हैरान करता है। मैं उनका वंशज हूँ, यह मुझे हैरान करता है। उनके विचारों का स्तर और हमारा चरित्र, मुझे हैरान करता है। दोनों के बीच तुलना संभव नहीं, यह देख मुझे हैरानी होती है। सच कहूँ तो मैं अपने वर्तमान से परेशान होता हूँ और अपने इतिहास से हैरान।

हमारा यह पतन मुझे सर्वाधिक हैरान करता है।

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