इतिहास के पन्नों से – 2 : 7 का चक्कर और सृष्टि का सृजन

हम कुड़मि हैं (जाति सूचक में न ले) और हम खेरवाल समूह से आते हैं। खेरवाल में संताली, बिरहोर, बेदिया आदि भी हैं। खेरवाल का मतलब बताते चले, ‘खेर’ मने ‘चिड़िया’ और ‘वाल’ मने ‘वंश’ ! मने हम चिड़िया के वंशज है। अब चिड़िया में से कौन चिड़िया? तो हँस और हँसिनी.. मने हम हँस और हँसिनी से पैदा हुए हैं।

मोटा-मोटी बताते चलते हैं… हमारे सुप्रीम गॉड हुए ठकुर और ठकुराईन! उन्हीं ने ये सारी सृष्टि बनाई और बेशक हमें भी।

जब पृथ्वी जलमग्न थी और समुद्री जीव उत्पन्न होने लगे थे बल्कि अस्तित्व में भी थे तब वे मनुष्य बनाने की भी सोचे। उन्होंने एक जोड़ा हँस और हँसिनी बनाये और उसमें जान फूंके। जब जान फूंके तो वे आकाश में उड़ने लगे। बहुत उड़े और उड़ते ही रहे।

चूंकि इन्हीं जोड़े से मनुष्य की उत्पत्ति होने वाली थी तो ठकुर जी को भूमि/जमीन की चिंता हुई। मरांगबुरु के माध्यम से कछुआ और नाग आधार बने जमीन का और केंचुआ समुद्र की तलहटी से मिट्टी ला-ला कर कछुवे के ऊपर रखते गए जिससे कि भूमि का निर्माण हुआ।

और भूमि में जो सबसे पहले पहले जो घास उगा वो ‘दूब’ घास था। और जब भूमि निर्माण हुआ तो हँस और हँसिनी ने दो अंडे दिए। ये अंडे हिहिरी-पिपरी नाम स्थान में दिए जहाँ ‘करम’ का पेड़ था।

जब अंडा फूटा तो उसमें से दो प्यारे बच्चों का जन्म हुआ। एक लड़का और एक लड़की। लड़का कहलाया ‘पिलचु हड़ाम’ और लड़की कहलाई ‘पिलचु बूढ़ी’। यही हमारे आदिपुरूष हुए और आदिनारी। आगे पले-बढ़े और सृष्टि के विकास हेतु संतानोत्पत्ति की।

इनके आठ बेटी व सात बेटे हुए। सबसे बड़ी बेटी हुई। नाम मरांग दइ! ये कुंवारी रही और यहां नहीं रही।

सात बेटी :- सोम्बरी, मुंगली, बुदनी, गुरुबारी, सुनी और राईमत।
सात बेटे :- सोमरा, मुंगला, बुदराई, गुरुबा, सुकरा, सुना और रोबी/एतवा/रुइबु।
ये आपस में शादी किये और वंश आगे बढ़ा।
लेकिन इनके बच्चे कभी आपस में शादी न किये मने सगोत्रीय नहीं।

ये जनरल कहानी बताया। इसका विस्तार और भी है।

सोमरा, मंगरा, बुधना, बिरसा, शुकरा, शनिचर और एतवा/एतवारी.. लड़का का नाम और फीमेल में लड़की का भी ऐसे ही. ये बहुत कॉमन नाम हैं। और ये इन सातों जोड़ों को ही समर्पित है। हमारे कूल देवी में इन्हीं की पूजा होती। सात-बहनी भी बोलते।

मेरी कुलदेवी पांचवे नम्बर की है। मने शुक्र-शुक्री। मेरे बप्पा का भी नाम शुकर महतो।

हम अब तक अपने गौहाल पूजा में पाँच गड्ढे वाली गौरेया-खुंटी गाड़ता था जो समझ से परे था। लेकिन बाद में इसे जान पाया।

अब ‘सात’ का चक्कर पूरी दुनिया में देख लीजिये… सब सात ही सात दिखाई पड़ेंगे.. हर तरफ.. हर जगह। जितने भी प्राचीन सभ्यताएं हैं सब में आपको ‘सात’ दिखेगा बल्कि आपके बॉडी के अंदर भी सात.. याने ‘सात चक्र’!

और हलेलुइया/जोल्हेलुइया के भी सात परा और परी।

आगे सात देवी/माता/बहन भी जानेंगे अलग-अलग जगहों के। क्योंकि लिखे गए इतिहास में आप ‘सात’ देख सकते हैं व पढ़ भी सकते हैं लेकिन हम अपनी श्रुति बता दिए इस क्रम में कि इधर भी सात है।

एक बात और ध्यान देते चलिये कि ‘दूब’ घास क्यों पवित्र है सो और दूजा हम ‘करम पूजा’ में करम गाछ की डाली गाड़ कर पूजा करते हैं। क्योंकि ये हमारे अस्तित्व के साथ जुड़े हुए हैं।

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