पाक अधिकृत जम्मू कश्मीर तथा गिलगित बल्तिस्तान: एक सामान्य परिचय

भूराजनैतिक पक्ष:-

1947 में जब देश ब्रिटिश राज से मुक्त हुआ तब जम्मू कश्मीर का विलय भारत में उस प्रकार नहीं हुआ जिस प्रकार अन्य रियासतें भारत संघ का अंग बनीं। जम्मू कश्मीर राज्य भूराजनैतिक विविधताओं से भरा पड़ा है। सन् ’47-48 में भारत-पाक युद्ध के पश्चात 27 जुलाई 1949 को कराची समझौते में युद्धविराम पर हस्ताक्षर कर तत्कालीन सरकार ने उस भूमि को पुनः हासिल करने का प्रयास नहीं किया जिस पर पाकिस्तान ने जबरन कब्जा कर लिया था।

जानने लायक बात यह भी है कि पाक अधिकृत जम्मू कश्मीर पाकिस्तान का कोई आधिकारिक प्रांत नहीं है। आज जिसे हम PoK अथवा PoJK कहते हैं उसके प्रशासनिक अधिकारों पर पाकिस्तान का संविधान मौन है।

बहरहाल, पाकिस्तान ने जो भूमि हथियाई थी उसे उसने दो भागों में बाँटा: एक का नाम रखा आज़ाद कश्मीर तथा दूसरे को कहा उत्तरी क्षेत्र (Northern Areas). कथित आज़ाद कश्मीर दरअसल नियंत्रण रेखा के पश्चिम में मीरपुर मुजफ्फराबाद का क्षेत्र है, इसकी सीमा जम्मू और कश्मीर घाटी के थोड़ा ऊपर तक लगती है। यह पाक अधिकृत कश्मीर का छोटा भाग है।

यह उस पूरी भूमि का मात्र 15% भाग है जिस पर पाकिस्तान ने कब्जा किया था। पाकिस्तान ने बड़ी चालाकी से इस क्षेत्र को छद्म स्वतंत्रता प्रदान की है। शेष पाकिस्तान से अलग यहाँ का एक वजीरे आजम, सुप्रीम कोर्ट इत्यादि है। मीरपुर मुजफ्फराबाद का क्षेत्र रावलपिंडी के समीप है जहाँ पाकिस्तानी फ़ौज का जनरल हेडक्वार्टर स्थित है।

इसलिए रणनीतिक रूप से पाकिस्तानी फ़ौज को इस क्षेत्र को आज़ाद कश्मीर घोषित कर यहाँ से भारत विरोधी गतिविधि संचालित करने में सुविधा होती है। पाक अधिकृत कश्मीर का दूसरा तथा बड़ा भाग (85%) गिलगित बल्तिस्तान है जिसे 2009 तक नॉर्दर्न एरिया कहा जाता था। इसकी सीमा दक्षिण में मीरपुर मुजफ्फराबाद क्षेत्र, कश्मीर घाटी और कारगिल से लगती है।

पूर्व में गिलगित बल्तिस्तान की सीमा पॉइंट NJ9842 तक लेह से लगती है। पॉइंट NJ9842 के ऊपर सियाचेन ग्लेशियर है और उसके ऊपर काराकोरम दर्रा है। सियाचेन के ठीक ऊपर शक्सगाम घाटी है जो गिलगित बल्तिस्तान का ही अंग है। पाकिस्तान ने 1963 में शक्सगाम घाटी अनधिकृत रूप से चीन को दे दी थी।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:-

गिलगित तथा बल्तिस्तान ऐतिहासिक रूप से दो भिन्न राजनैतिक इकाइयों के रूप में विकसित हुए थे। गिलगित को दर्दिस्तान भी कहा जाता है क्योंकि यहाँ दरदी भाषा बोलने वाले लोग रहते हैं। बल्तिस्तान को मध्यकाल में छोटा तिब्बत कहा जाता था।

गिलगित और बल्तिस्तान का एक प्रांत के रूप में एकीकरण डोगरा शासनकाल में हुआ। पुरातन काल में गिलगित मौर्य वंश के अधीन रहा। कराकोरम राजमार्ग पर स्थित सम्राट अशोक के 14 शिलालेख इसका प्रमाण हैं। ललितादित्य (724-761 ई०) और उसके पश्चात कार्कोट वंश के समय भी गिलगित बल्तिस्तान काश्मीर साम्राज्य का अभिन्न अंग रहा।

ललितादित्य ने अपने शासनकाल में शेष भारत से काश्मीर के ऐतिहासिक सम्बन्धों को मजबूत किया। कालांतर में गिलगित और बल्तिस्तान मुग़ल शासन के अधीन भी रहा। मुग़ल शासन के दुर्बल होने के पश्चात साठ वर्षों तक काश्मीर में अफगान शासन रहा। उस समय भी गिलगित और बल्तिस्तान काश्मीर साम्राज्य का अंग था। अफगानी शासन के अत्याचारों से पीड़ित होकर एक काश्मीरी पण्डित बीरबल धर के नेतृत्व में काश्मीर की जनता ने सिख महाराजा रणजीत सिंह से गुहार लगाई।

तब महाराजा रणजीत सिंह जी ने 15 जून 1819 को काश्मीर पर आक्रमण किया और अफगानी शासन से मुक्ति दिलाई। महाराजा रणजीत सिंह जी ने जम्मू का क्षेत्र गुलाब सिंह को जागीर के रूप में दिया। कालांतर में कई लड़ाईयां हुईं और राजनैतिक घटनाक्रम परिवर्तित हुए। अंग्रेजों द्वारा सिखों को पराजित करने और 9 मार्च 1846 की लाहौर सन्धि के फलस्वरूप समूचे जम्मू कश्मीर राज्य पर गुलाब सिंह का एकछत्र राज स्थापित हुआ। बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में रूस में हुई क्रांति और सत्ता परिवर्तन के कारण बिगड़ते शक्ति सन्तुलन से घबराये अंग्रेजों ने डोगरा महाराजा से गिलगित एजेंसी 60 वर्षों के पट्टे पर छीन ली।

सन् 1947 में जब अंग्रेज भारत से जाने लगे तो उस समय अनेक षड्यंत्र तथा नाटकीय घटनाक्रम हुए। परन्तु यह भी सत्य है कि अंग्रेजों ने 1 अगस्त 1947 को गिलगित एजेंसी के सभी क्षेत्र महाराजा हरि सिंह को सौंप दिए थे।

इस संक्षिप्त ऐतिहासिक वर्णन से यह सिद्ध होता है कि गिलगित बल्तिस्तान पर शासन करने का पाकिस्तान का ऐतिहासिक रूप से भी कोई अधिकार नहीं बनता क्योंकि प्राचीनकाल से लेकर 1947 तक यह क्षेत्र अधिकांश समय भारतीय राजाओं के अधीन रहा। ऐसे में पाकिस्तान प्रायोजित यह प्रोपेगैंडा निराधार है कि गिलगित बल्तिस्तान भारत को अंग्रेजों ने दिया था।

वर्तमान परिप्रेक्ष्य:-

आज के समय में गिलगित बल्तिस्तान सामरिक रूप से अतिमहत्वपूर्ण क्षेत्र है। यहाँ प्रचुर मात्रा में प्राकृतिक संसाधन हैं तथा सांस्कृतिक संरचना पर इस्लामी प्रभाव होने के बावजूद विविधता है। यहाँ कई इस्लामी सम्प्रदाय के लोग रहते हैं जैसे- नूरबक्शी सम्प्रदाय, ट्वेलवर शिया सम्प्रदाय और सुन्नी मतावलंबी। गिलगित बल्तिस्तान के सिंकरी प्रदेश के निवासी गाय को पवित्र मानते थे किंतु इस्लामियों के भय के मारे अब वे अपनी प्राचीन मान्यताओं को तजने के लिए बाध्य हैं।

पाकिस्तान की सरकार ने कथित आज़ाद कश्मीर में बाहरी लोगों के बसने पर पाबन्दी लगा रखी है किंतु गिलगित बल्तिस्तान में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। इसलिए यहाँ शेष पाकिस्तान से आये इस्लामियों ने जनसंख्या परिवर्तन कर कट्टरपंथ को बढ़ावा देने का काम किया है। गिलगित बल्तिस्तान में पाकिस्तान सरकार के अत्याचारों और मानवाधिकार उल्लंघन पर ब्रिटिश बैरोनेस एम्मा निकोलसन ने यूरोपियन पार्लियामेंट (जब ब्रिटेन EU का सदस्य थ) में एक रिपोर्ट प्रस्तुत की थी। एक उदाहरण देखिये- गिलगित बल्तिस्तान के निवासियों को पाकिस्तान कोई नागरिक अधिकार नहीं देता। गिलगित बल्तिस्तान का कोई निवासी वहाँ कोई रोजगार प्राप्त नहीं कर सकता।

नौकरी के लिए उसे बाहर शेष पाकिस्तान के किसी नगर में जाना होगा। पाकिस्तान गिलगित बल्तिस्तान में बांध बना रहा है जिसका पानी बिजली या रॉयल्टी कुछ भी इस क्षेत्र को नहीं मिलने वाला। इस क्षेत्र के ऊपर से चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) होकर गुजरता है और शक्सगाम घाटी से निकटता के चलते चीन बड़ी आसानी से यहाँ अपने कर्मचारी भेज कर निर्माण कार्य करवा रहा है। गिलगित बल्तिस्तान में कई प्राचीन भाषाएँ विलुप्त होने की कगार पर हैं।

गिलगित के समीप स्थित चित्राल घाटी के आसपास कलश समुदाय के लोग रहते हैं। इनकी बेटियों को विवश होकर इस्लाम कबूल करना पड़ता है क्योंकि गर्मियों में कामांध भेड़िये अपनी हवस मिटाने इनके पास आते हैं। पाकिस्तानी शासन में ऐसी अनेक विषमताओं से जूझते हुए गिलगित बल्तिस्तान और आसपास के लोग कश्मीर नामक स्वर्ग में नरक का सुख भोग रहे हैं। सन् 2005 में आये भूकंप के पश्चात स्थिति और खराब हुई है।

भविष्य की चिंताएं तथा उपाय:-

भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज जी ने 1 ऑक्टूबर 2015 को पाक अधिकृत जम्मू कश्मीर की राजनैतिक दुर्व्यवस्था पर अंतर्राष्ट्रीय समुदाय का ध्यान आकर्षित कराया था। IDSA की एक रिपोर्ट बताती है कि 2006 में गिलगित बल्तिस्तान के छात्रों ने भारत के IIT और IIM में आरक्षण की मांग की थी। गिलगित बल्तिस्तान और अफगानिस्तान की सीमा पर वाखन दर्रा एवं सड़क मार्ग स्थित है जो शक्सगाम घाटी के समीप ही है।

युद्धकाल में यह चीन को अपनी सेनाएं गिलगित में घुसाने का अवसर प्रदान करेगा। सेंगे हसनान सेरिंग अमरीका में Institute for Gilgit Baltistan Studies नामक संस्था चलाते हैं। वे बताते हैं कि चीन गिलगित में मिसाइलें ले जाने हेतु सुरंगे बना रहा है। अजमल आमिर कसाब और डेविड कोलमैन हेडली इन दोनों ने स्वीकार किया था इन्हें PoK में आतंकी प्रशिक्षण मिला था।

उपरोक्त तथ्य एवं चिंताओं पर समूचे भारत में विमर्श तथा जागरूकता आवश्यक है। हमारी सीमाओं पर यह समस्याएँ एक दिन अथवा एक दशक में समाप्त नहीं होने वालीं। इसके लिए व्यापक जनसमर्थन आवश्यक है। जब हम रोहिंग्यों के लिए आँसू बहा रहे होते हैं तब गिलगित बल्तिस्तान की सिसकियां हमें सुनाई नहीं देतीं।

दिल्ली स्थित समर्थ स्टडी सर्कल ने आम लोगों को जम्मू कश्मीर राज्य की समस्याओं की वास्तविकता बताने का बीड़ा उठाया है। इसी विषय पर 22 जुलाई 2018 को एक कार्यशाला आयोजित की जायेगी। इसमें प्रख्यात सामरिक चिंतक एवं पूर्व नौसेना अधिकारी कैप्टन आलोक बंसल (रि०) मुख्य वक्ता हैं। मेरे इस लेख में जम्मू कश्मीर स्टडी सेंटर द्वारा प्रकाशित उनकी पुस्तक और व्याख्यान की सहायता ली गयी है। इस विमर्श को आगे बढ़ाने के लिए आप सभी आमन्त्रित हैं।

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