फर्क होता है गले मिलने और गले पड़ने में

लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव का जवाब देते हुए जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कांग्रेस की दोहरी (दोगली नीति) की बात कही, तब उनका सीधा निशाना राहुल गांधी की उस बचकानी हरकत पर था, जब वो एक तरफ तो उनका अपमान करने के लिए आँख से आँख न मिला पाने का ताना देते हैं, तो दूसरी तरफ उनकी सीट पर जाकर जबरदस्ती लगे मिलने के लिए उन्हें खड़ा होने का आदेश देते हैं.

राहुल गांधी के अपरिपक्व दिमाग का यह अंतिम उदाहरण होना चाहिए कांग्रेस के नेताओं के लिए कि वो प्रोटोकोल तोड़कर ऐसी बचकाना हरकत कर बैठे.

ये वही मोदीजी हैं जिनके जब कोई महिला पैर छूने झुकती हैं तो वो पलटकर उनके पैर छू लेते हैं, ये वही मोदी जी हैं जिनकी बुज़ुर्ग औरतें बलाएं लेती हैं… और ये वही मोदीजी हैं जो राहुल के गले मिलने के पीछे की मंशा भांप जाते हैं फिर भी आशीर्वाद स्वरूप उनकी पीठ थपथपाना नहीं भूलते..

राहुलजी आशीर्वाद छीना नहीं जाता, आशीर्वाद कमाया जाता है जैसे मोदीजी अपने कर्मों से कमा रहे हैं. उनके कर्मों का अनुकरण करना तो दूर यदि आप उनके जैसे खड़े होने, उनके जैसे देखने और उनके जैसे बोलने का अनुसरण भी कर पाए तो समझना, ये आज जो जबरन गले पड़े ना उसके एवज में पीठ थपथपा देने भर से मिला आशीर्वाद है जो इस जन्म के लिए काफी है.

वैसे भी मोदीजी से आँख मिलाने जितनी काबिलियत तो पहले कमा लीजिये, उसके लिए एक कामगार माँ का कामगार बेटा होने का गर्व होना चाहिए, और ऐसे ही कामगार बेटों के सुख दुःख का “भागीदार” होने का हौसला होना चाहिए, तब जाकर खुद को चौकीदार या प्रधान सेवक कहने का साहस जागता है, मुंह में चांदी का चम्मच लिए पैदा होने पर आसपास सिर्फ “चमचे” नुमा लोग जमा हो जाने से कोई नेता नहीं हो जाता…  नेता होने के लिए सवा सौ करोड़ जनता का प्यार और आशीर्वाद चाहिए होता है जो उन्होंने उनसे आँख मिलाकर नहीं आँख झुकाकर काम करते हुए कमाया है…

 

दिनभर के प्रमुख समाचार एक साथ

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY