अविश्वास प्रस्ताव : एक भटकी राजनीति

सदन में सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव को आज मंजूरी मिल चुकी है, जिस पर कांग्रेस ने अपने समर्थन की घोषणा कर दी है. इसी शुक्रवार को सदन में इस विषय पर चर्चा होगी, और बाद में वोटिंग के माध्यम से सरकार की शक्ति का परीक्षण होगा.

इतिहास में ऐसा नहीं है कि ये पहली दफा होने जा रहा है! पहला अविश्वास प्रस्ताव सन 1963 में नेहरू सरकार के खिलाफ जे बी कृपलानी ने लाया था जिसमें नेहरू के खिलाफ मात्र 62 वोट पड़े थे. किसी एक सरकार में सबसे ज्यादा अविश्वास प्रस्ताव का रिकार्ड इंदिरा गांधी के पास है, जिसमें लगभग 15 बार अविश्वास प्रस्ताव लाया गया था! अटल विहारी बाजपेयी जी के खिलाफ भी प्रस्ताव आया जिसमें उन्हें एक मत से पराजय मिली.

खैर आइए जरा एक नज़र डाल लेते हैं सरकार के मौजूदा संख्याबल पर –

NDA के पास कुल मिला कर 311 सांसदों का समर्थन है जो बहुमत के आंकड़े 268 से 43 अधिक है!

अकेले बीजेपी के पास 272 सांसदों का संख्या बल है जो इस प्रस्ताव की चूलें हिलाने के लिए काफी है।

अब सवाल उठता है कि विपक्ष की आखिर मंशा क्या है?

जहां तक मेरा मानना है, विपक्ष ने एक तीर से दो निशानों को साधने की सोची है।

अगर बीजेपी के 272 सांसदों मे से कुछ लोगों नें बगावत की, तो एक विपक्ष सरकार की लोकप्रियता घटने की छवि बनाने के लिए प्रोपेगैंडा बनाएगी। लगे हाथों एक जुट विपक्ष का पहला वार्म अप भी हो जाएगा।

पर संभव ये भी है कि विपक्ष का ये दांव उल्टा पड़ जाए। नरेंद्र मोदी एक कुशल वक्ता और मंझे राजनीतिज्ञ हैं। विपक्ष की लामबंदी को बेनकाब करने का उनके लिए ये मौका साबित हो सकता है।
बहस शुक्रवार को होगी, और शनिवार, रविवार अवकाश का दिन है। हो सकता है कि इस दिन बड़े स्तर पर प्रधानमंत्री लोगों को संबोधित करें और विपक्ष को बेनकाब करें।

चलिए ये हुआ राजनीतिक पहलू। अब सिक्के का दूसरा पहलू देखते हैं।

तीन तलाक और इन्हीं जैसे कुछ बहुत अहम बिल अभी पास किये जाने के इंतज़ार में हैं। और इस खींच-तान में संभव है कि ये मुद्दे दब जाएं।

लोकतंत्र में विपक्ष का बड़ा योगदान होता है। अब आखिरी कुछ महीने बचे हैं। इसमें विपक्ष की ज़िम्मेदारी बनती है कि वो ज़रूरी मुद्दों पर सार्थक बहस होने में सहयोग दे और विपक्ष के रूप में बिगड़ी उसकी छवि को सुधारे।

अविश्वास प्रस्ताव की भी एक मर्यादा होती है, उसे अपने राजनीतिक फायदे के लिए इस्तेमाल करना जनता के पैसे और समय का अपमान है। ये लीक से भटकी राजनीति है, जिसका सुधार आवश्यक है।

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