कारवां गुज़र गया, ग़ुबार देखते रहे

प्रेम की पाती लिखने वाले ‘नीरज’ हमारे बीच नहीं रहे। यह सुनकर यकीन नहीं हो रहा। उनके गीतों ने, गीत के मायने ही बदल डाले। जब हिन्दी कवि सम्मेलनों से भीड़ गायब हो रही थी, तभी अचानक नीरज युग का अभ्युदय हुआ, और फिर कवि सम्मेलनों में भीड़ बढ़ने लगी।

लोग उनको सुनने पागल हो उठते। जिस मंच पर वो नहीं, वो कवि सम्मेलन ही नहीं। “जलाओ दिये पर रहे ध्यान इतना, अँधेरा धरा पे कहीं रह ना जाये, अब तो कोई ऐसा मज़हब चलाया जाये, जिसमें इंसान को इंसान बनाया जाये, मैं तूफानों में चलने का आदी हूँ…. ये नीरज ही कह सकते थे।

बढ़ती उम्र और बीमारी के कारण लगभग एक दशक से वे मंचों पर कम ही दिखते थे। लगभग तीन साल पहले, मेरा सपना सच हुआ जब, लखनऊ के गोमतीनगर में एक डिग्री कॉलेज में उनके सानिध्य में मुझे काव्य पाठ करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।

बता नहीं सकता कैसा लगा था उस दिन। नीरज सामने कुर्सी पर बैठे थे। उनकी तबीयत ठीक नहीं थी। जिसकी एक लाईन पर लोग पागल हो ‘वाह – वाह’ कर मदहोश हो जाते, जिसे दूर से बस मंचों पर देखा, वो आज बेहद करीब था और मेरी कविता पर अपना हाथ उठा कर शाबाशी दे रहा था। बस आखें नम हो आई और मैंने उनके पांव छू लिए।

फिर नीरज को प्रत्यक्ष नहीं देख पाया। और आज ये मनहूस खबर आ गई। नीरज जी बाद के कवि सम्मेलनों में अक्सर यही गाते – “इतने बदनाम हो जायेंगे हम इस जमाने में, तुम्हें सदियां लग जायेंगी हमें भुलाने में।”

उनके मुंह से यह सुनना अच्छा लगता था लेकिन ये सच है नहीं। सच तो है – भले सदियाँ गुजर जायें लेकिन कालजयी रचनाकार कभी गुज़रते नहीं, वो अमर हो जाते हैं और वो तब तक अमर रहेंगे जब तक ये धरती और आकाश रहेगा।

अलविदा गोपाल दास ” नीरज ” जी। यदि हो सके, तो फिर भारत में आना और नयी पीढ़ी के लिए गुनगुनाना।

अंधियारा जिससे शरमाये,
उजियारा जिसको ललचाये,
ऐसा दे दो दर्द मुझे तुम
मेरा गीत दिया बन जाये!

– डॉ. शरदेन्दु कुमार त्रिपाठी

वहीदा जन्मोत्सव : दुःख मेरा दुल्हा है, बिरहा है डोली, आंसू की साड़ी है, आहों की चोली

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