मौलाना कासमी के बचाव में, उतरे मुसलमान मैदान में

टीवी डिबेट में महिला पर हाथ छोड़ने वाले मौलाना कासमी के पक्ष में मुस्लिमों के लिखे गए लेखों को पढ़ना चाहिए, गलत को भी कैसे सही ठहराया जाता है उसका वस्तुपाठ साबित होंगे। वैसे जहां गलत को सही ठहराने की बात है, क्या कहें, कितना कहें…

कल एक ऐसी ही पोस्ट को मैंने सैंपल की तौर पर मेरे वॉल पर लगाया था तथा कई ग्रुप्स में भी शेयर किया था।

उसके साथ स्पष्टीकरण भी जोड़ा था कि देखिये कितने जल्द सफाई आ गयी और वह भी कितने बढ़िया अंदाज में। इससे सीखने की जरूरत है।

पोस्ट की लिंक यह रही https://bit.ly/2O0Nf6z

उस पोस्ट में सब से पहले मौलाना कासमी को जज्बाती ठहराया गया, और उनको ‘ज़ी हिंदुस्तान’ का बुलाना ही षडयंत्र करार दिया गया।

भाई अगर वे जज्बाती हैं यह बात अब पता चली जब इतनी घटिया हरकत करने तक इंतजार क्यों किया? क्यों बस ताकीद करते रहे, क्यों पहले ही उनको पद से हटाकर उनसे अलग नहीं हुए और आज भी उनको जालसाज़ी का victim बताया जा रहा है, हद है।

उस वाहियात लेख में एक महिला अंबर ज़ैदी पर शुरुआत में ही एक ऐसा झूठा आरोप लगाया गया है जिसको पढ़कर ही आम मुसलमान को इशारा दिया जाता है कि वो उनसे किनारा कर लें; जो उनका साथ देगा इस्लाम का दुश्मन गिना जाएगा।

लेख में कहा गया है कि “अंबर ज़ैदी की शख्सियत भी ऐसी है कि वह हमेशा इस्लाम और मुसलमानों के खिलाफ जहर उगलती रही हैं।”

अंबर ज़ैदी ने इस्लाम के खिलाफ क्या आग उगली? उनके वीडियो देखे हैं, वे केवल इस्लाम के ठेकेदारों को इस्लाम के पैमानों में ही सवाल पूछती है, जो उन्हें गवारा नहीं होते। इस्लाम, कुर’आन और मुहम्मद पर उसने कभी सवाल या उंगली नहीं उठाई है,

एक मिनट की भी क्लिप दिखा दीजिये जहां उन्होंने इस्लाम, कुर’आन और मुहम्मद पर सवाल किया हो या उंगली उठाई हो। बाकायदा एक मुस्लिम की तरह ही सम्मान से उनका उल्लेख करती हैं।

हाँ, उनके सामने पड़ते मौलाना सुन्नी होते हैं और ज़ैदी अक्सर शिया होते हैं। शायद टीवी देखने वाली गैर मुस्लिम जनता को यह बात पता नहीं।

अंबर के बाद नंबर लगता है एडवोकेट फरहाना फैज़ का। उनके बारे में ये बात कही जा रही है कि उनका नाम लक्ष्मी वर्मा है।

मुझे कनफर्म जानकारी नहीं है कि इसका आधार क्या है। और यहाँ मैं सीधा एक महिला को दूसरे महिलाओं पर होते अन्याय के विरुद्ध लड़ते देख रहा हूँ, अगर वे लक्ष्मी वर्मा हैं तो उससे क्या फर्क पड़ता है ?

या मुसलमानों के लिए ये मामला हिन्दू मुस्लिम हो जाता है, और इस्लाम खतरे में आ जाता है?

ये मोहतरमा फरहाना फैज़ का नथुराम गोडसेजी के पुतले साथ खींचा हुआ फोटो लेकर बताया जाता है कि वे गोडसेजी की प्रशंसक हैं – मतलब इस कारण निंदनीय है।

गोडसेजी से मुझे कोई लगाव नहीं, गांधीजी को गोली मार कर उन्होंने मूर्खता की और गांधीजी को हुतात्मा बनाया। अपनी ही कर्मों से गांधीजी देश में इज्जत खोते जा रहे थे, गोडसेजी उन्हें गोली मारकर सब से बड़ी मूर्खता की, उन्हें महात्मा बना दिया।

लेकिन पता नहीं आप के लिए एक ही आदमी को मारने वाला आदमी इतना तिरस्करणीय क्यों है, जबकि आप के पूजनीय का चरित्र क्या है?

गोडसेजी ने किसी हम उम्र दोस्त की मासूम बच्ची पर नज़र नहीं डाली, न ही किसी को इसलिए क़त्ल किया या करवाया क्योंकि वो उनको कुछ मानने से इंकार कर रहा था। गोडसेजी यह कभी नहीं कहा कि गर्दनें मारो और उँगलियों के पोर पर चोट करो (8:12)।

गोडसेजी ने यह कभी नहीं कहा कि काफिरों का नुकसान करनेवाले के खाते में अल्लाह नेकी लिखेगा (9:120)। गोडसे जी अपने काम के लिए खुद मर गए, ये नहीं कहा कि मेरी ज़िंदगी आप लोगों से कीमती है (9:120)। और भी बहुत है, ये बस बानगी है।

लेकिन आप अगर गोडसेजी की निंदा इसलिए कर रहे हैं कि उन्होंने गांधीजी को मारा, और आप हर किसी की निंदा करेंगे जो उनको चाहता है, तो ज़रा अपने आदर्श को भी खुली आँखों से देखा कीजिये।

और हाँ, अगर मैंने गोडसे ‘जी’ लिखा है तो यह सामान्य संस्कार हैं, मैं सोनिया जी, ममता जी ही लिखता हूँ, अत: इससे आप की मर्जी से कोई अलग और गलत अर्थ न निकाले जाएँ।

संघ का नाम जोड़ लेना मुसलमान की नज़र में गाली है यह बात अब कहने की भी आवश्यकता नहीं रही। ‘ज़ी हिंदुस्तान’ को भगवा चैनल कहना, फरहाना फैज़ पर संघी होने का आरोप लगाना क्या है?

ज़रा ये तो बताएं कि ये लोग सय्यद जिलानी साहब, यासीन मालिक साहब जैसों के बारे में क्या रवैया रखते हैं? वैसे इनके नाम के साथ साहब जोड़ा है वह भी संस्कार हैं, अन्यथा न लें। गोडसे जी लिखना भी वही है।

बस इतना ही बताना था कि कितने संगठित लोगों से पाला पड़ा है अपना, रामगढ़ वालों। स्वाभिमान से जिएंगे आप या गब्बर के आतंक में?

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