दबाव से उत्पन्न तनाव का प्रभाव

आजकल की भाग – दौड़ भरी जिंदगी में रूककर दूसरे के लिए देखने का तो छोड़ ही दो, अपने लिए ही वक़्त नहीं है किसी के पास। खुद से नहीं मिलते हैं अब तो!

कुछ दिन से तबियत थोड़ी ठीक नहीं चल रही है, बुखार के साथ सिरदर्द ज़ुकाम और खाँसी भी है। इस वजह से लिख नहीं पा रहा था। पर्सनल प्रॉब्लम को पीठ पर ढोते – ढोते इतना वक़्त हो गया कि अब वो शारीरिक रूप से प्रताड़ना दे रहा है। कहीं ऑफिस से रिलेटेड कोई बात से परेशान होकर उसे दिमाग में बिठा लेते हैं, तो वो दूसरे दिन उस दिन की प्रॉब्लम के साथ ‘कैरी फोरवर्ड’ होकर दुगनी हो जाती है। उसके बाद दिन की कुछ और उलझने सुलझाने बैठ जाता हूँ तो खुद उलझ जाता हूँ।

दबाव से तनाव पैदा होता है, और कॉर्पोरेट वर्ल्ड में ‘दबाव’ को एक “मोटिवेटर” के रूप में लिया जाता है। सभी ऑफिसों में और व्यवहारिक रूप से भी यह माना जाता है कि दबाव देने से ही काम पूरा होगा। पर एक बात समझ नहीं आई कि – कोई नेगेटिव चीज़ (दबाव), कैसे प्रायः पॉजिटिव (मोटिवेशन) में बदल सकती है? नेगेटिव चीज़ का रिएक्शन नेगेटिव ही आएगा।

हम ऐसा सोचते हैं कि अगर हम तनाव में न रहें, या किसी पर प्रेशर न डालें तो काम होगा ही नहीं? हम किसी को डरा करके, उसके अंदर भय पैदा करके, मोटिवेशन कैसे पैदा कर सकते हैं भई?

ऑफिस में बॉस ने कहा – अगर ये नहीं किया, तो तुम्हे छुट्टी नहीं दूँगा और अगर छुट्टी ली तो सैलरी काट लूँगा। यहाँ तक उसने तनाव दिया और आपने अपने अंदर उसको ले लिया, अब आपने सोचना शुरू किया, अगर काम नहीं हुआ, तो छुट्टी नहीं मिल पाएगी, बिना काम के चला गया तो पैसे काट लेंगे और अगर पैसे काट लिए तो किराया और खाने वाले को क्या दूँगा? इन सब बातों को रखकर आप वो काम करते हैं, जिसमें आप शारीरिक रूप से तो वहाँ होते हैं, मगर मानसिक रूप कई जगह होते हैं, और फिर वह विफल हो जाता है तो आने वाले कल का प्रतिफल आपको और तनाव देने लगता है, वो भी आने से पहले ही।

इसी वजह से जिन लोगों को ज्यादा चिंता हो जाती है किसी भी बात की उसका सीधा असर उनके ‘डाइजेस्टिव सिस्टम’ पर पड़ता है, कुछ लोगों में किसी भी बात का डर बहुत जल्दी बैठ जाता है जिसका सीधा असर उनके ‘हार्ट’ पर पड़ता है, यहाँ तक कि जिनको गुस्सा करने की ज्यादा आदत हो जाती है उसका रिजल्ट कभी – कभी ‘कैंसर’ के रूप में भी सामने आता है। इन सभी बाहरी तनाव का हमारे शरीर पर भी प्रभाव पड़ता है।

वहीँ कुछ कम्पनीज़ में उनके मैनेजर और बॉस समझते हैं इस बात को, तो वो उसी काम को घुमाकर करवाते हैं, इससे परिणाम भी प्रायः पॉज़िटिव ही आते हैं, जैसे मैनेजर ने कहा इस बार जो भी इतना काम कर लेगा उसको सैलरी के बाद अलग से इतने रूपए का बोनस और ये लैपटॉप फ्री मिलेगा। अब इस शर्त में तनाव है ही नहीं किसी को, नहीं किया तो भी क्या? बोनस नहीं मिलेगा बस! कोशिश सभी करेंगे और सामान्य महीने या सप्ताह से उस महीने या सप्ताह की प्रोडक्टिविटी खुद अपने आप ही इतनी बढ़ जाएगी कि एक व्यक्ति के 5% भी एफर्ट से, वो बोनस और लैपटॉप कंपनी हँसते हँसते उस एक व्यक्ति को दे देगी।

तनाव की मात्रा भी आपकी सक्सेस लाइफ के बारे में बताने लगती है, एक व्यक्ति जो ये कहता है कि मुझे तो कॉलेज का टेंशन, अटेंडेंस, सेमिनार, घर का, गर्लफ्रेंड का अलग; तो वहीँ दूसरा कहेगा कि बस इतने में ही रो दिए मुझसे पूछो घर की जिमेदारी अलग है, इसमें पैसे फंसा रखे हैं, इतना हार गया, इतना कर्जा देना है, और इतना तो लेकर बैठा हूँ।

तो तीसरा कहेगा मुझे कोई प्रॉब्लम नहीं भाई! सुबह उठा, मम्मी ने खाना बना दिया कॉलेज गया, आकर खाना खाया, गर्लफ्रेंड से बात करके सो गया। इसमें सबसे ज्यादा सोशली स्टेबल और जीवन में कुछ कर रहा है, ऐसा शख्स वो ‘दूसरा व्यक्ति’ लगेगा जो कर्जा लेकर बैठा है। बाकि क्या कर रहे हैं? कुछ नहीं ! जितना कम स्ट्रेस, उतना ही कम सक्सेसफुल दिखेंगे आप।

तनाव और दबाव दोनों ही अलग अलग बातें हैं, सबसे पहले ये समझना जरुरी है। लोग तनाव को ही दबाव समझते हैं। जबकि मेरे हिसाब से –

तनाव; दबाव और आपकी ‘प्रतिक्रिया’ दोनों पर निर्भर करता है। जिसमें हम उस ‘दबाव’ से आये हुए ‘तनाव’ को ही देखते हैं, ‘प्रतिक्रिया’ को भूल ही जाते हैं।

मेरे ऑफिस में मेरे बॉस ने सभी एम्प्लॉई को डाँटा। 10 लोग उस डाँट के बाद इतने परेशान लग रहे थे जैसे पता नहीं अब कल वो लोग जिन्दा भी रहेंगे या नहीं? 5 लोग अभी से जुट गए अगले मंथ के लिए, 2 लोगों पर कुछ असर ही नहीं दिखा, जैसे वो डाँट के पहले थे, वैसे ही अभी। यहाँ से सुना वहां से निकाला… ऐसा क्यों?

बॉस ने उनको तो कोई अलग से कम नहीं डाँटा था, सभी को समान डांटा, पर डांटने के बाद की प्रतिक्रिया सबकी अलग – अलग क्यों?

इन सब में वैसे सबसे ज्यादा स्ट्रेस में बॉस भी होता है, इस बात को भी नहीं नकारा जा सकता। उस स्ट्रेस का गुस्सा 10 लोगों पर डाँट कर निकाला और सभी का अलग ही रिएक्शन? ऐसा क्यों?

जरा सोचना इस बारे में !!!

आपके साथ भी होता होगा ऐसा ? स्कूल और कॉलेज में ही देखलो !! जब एग्ज़ाम होते होंगे तो सभी को टेंशन होती होगी और ऐसा भी नहीं जिसको टेंशन नहीं है वो एग्ज़ाम के लिए सीरियस नहीं है। लेकिन जिसके चेहरे पर टेंशन नहीं दिखेगी, लोगों को वो उतना ही बेवक़ूफ़ और गैर जिम्मेदाराना लगेगा।

मेरे ही साथ बहुत बार हुआ है जब स्कूल में था तो कुछ सब्जेक्ट के एग्ज़ाम का मतलब यही था मेरे लिए कि इन सब्जेक्ट की छुट्टियों में हम दूसरा विषय पढ़ लेंगे और उसकी तैयारी कर लेंगे। लेकिन घर पर सब कहते थे कि जिसका है वो तो पढ़ लो? मतलब जिस बात को लेकर टेंशन नहीं तो समझ लो आप एब्नार्मल हैं? आप टेंशन में दिखेंगे तभी सीरियस लगेंगे।

मगर ध्यान रखना ”सीरियस” लगते – लगते आपकी ‘कंडीशन सीरियस न हो जाए….

तेरे नाम की कोई सड़क… धड़क!

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