जाने किस वेश में, मिल जाए अग्निवेश!

अन्ना आंदोलन के समय की बात है। स्वामी अग्निवेश पर कुछ सामग्री इकट्ठा कर रहा था।

आश्चर्य हुआ था जानकर कि अग्निवेश तो आर्यसमाजी हैं ही नहीं। ईसाई होने और आर्थिक गड़बड़ी के आरोप में आर्य समाज ने उन्हें दशकों पहले से बाहर किया हुआ है।

ऐसे ही अनेक तथ्यों के साथ एक बड़ा सा लेख लिखा था ‘ना जाने किस वेश में अग्निवेश मिल जाए।’

पाँचजन्य में उस समय बलदेव भाई सम्पादक थे। उन्हें भेजा। फ़ोन आया उनका कि बहुत बड़ा आरोप लगा रहे हैं आप! इन लोगों के हाथ काफ़ी लम्बे हैं, अगर कुछ क़ानूनी मामला हुआ तो आप दायित्व लेंगे।

अपना दो टूक कहना था कि भाई साहब शत-प्रतिशत ज़िम्मेदारी मेरी है, जो भी क़ानूनी मामला होगा हम झेलेंगे, चाहें तो मैं लिख कर दे सकता हूं।

फिर पाँचजन्य में वह आवरण कथा के रूप में छपा। इंडियन एक्सप्रेस ने अपने कॉलम में उसका रिव्यू भी छापा। उसके बाद और कुछ अख़बारों के लिये हमने इस आशय के लेख लिखे।

उस समय जब अन्ना आंदोलन चरम पर था और अग्निवेश उस का चेहरा बने हुए थे, तब मित्र संजीव सिन्हा के साथ जंतर-मंतर पर जा कर स्वामी को घेरा था।

चिल्ला-चिल्ला कर अन्ना और उनके लोगों को बताया था कि इस पवित्र आंदोलन का चेहरा मत बनाइये अग्निवेश को। दाग़दार हैं काफ़ी ये।

इस घटना पर पहले भी लिख चुका हूं। विस्तार से दुहराना आत्मश्लाघा जैसा होगा। ख़ैर!

आरोप सारे पुख़्ता थे। जल्द ही एक स्टिंग में यह ख़ुलासा भी हुआ कि वस्तुतः स्वामी उस आंदोलन में वाया कपिल सिब्बल कांग्रेस के एजेंट थे। उसके बाद अग्निवेश के पराभव की शुरुआत हुई। कल की पिटाई के बाद शायद फिर उनकी ‘वापसी’ का रास्ता खुला है। कम से कम कोई और बड़ा विदेशी पुरस्कार तो ज़रूर मिलेगा इन्हें, यह तय है।

जंतर-मंतर पर जब बकझक हुई अपनी तब देश भर का मीडिया वहां पर था। मौजूद पत्रकारों में से कुछ तो मित्र-सहपाठी भी थे लेकिन, निजी आग्रहों के बाद भी किसी ने इसे कवर नहीं किया।

मित्रों का साफ़ कहना था कि सामूहिक रूप से मीडिया ने यह निर्णय लिया है कि ऐसा कुछ भी कवर नहीं करना है, जिससे आंदोलन की निगेटिव छवि बने, हालांकि अपन आंदोलन के नहीं अपितु, अग्निवेश के ख़िलाफ़ थे। बहरहाल!

यह सबकुछ याद करते हुए यही सोच रहा हूं अभी कि अगर मीडिया सुपारी लेकर या तय एजेंडा के साथ पत्रकारिता नहीं करे, तो किसी अग्निवेश का फ़ैसला लोग सड़क पर करें ही नहीं शायद।

दु:खद है इस तरह सड़क पर किया जाता फ़ैसला लेकिन, कल ही सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है कि भीड़ को क़ानून हाथ में लेने नहीं देंगे।

स्वामी अग्निवेश के शीघ्र स्वस्थ होने की कामना करता हूं।

वास्तविक संन्यास वही है जो भारत माँ की सेवा के लिए लिया जाए

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