बिना पाकिस्तानी-चीनी आक्रमण के ही ‘ये’ डुबो देंगे भारत की नैया

ऊपर दिए चित्र को देख कर बताएँ, कि लाल रंग कहाँ ख़त्म होता है और हरा कहाँ शरू होता है (या विपरीत)।

आप नहीं बता पाएँगे!

क्यों कि कोई एक रेखा नहीं है जहां लाल की हद ख़त्म हो कर हरा शुरू होता है। दोनों रंग मध्य में धूसर हो जाते हैं और घुल-मिल जाने की वजह इन की सीमाएं तय है ही नहीं!

बलात्कार और स्वेच्छा सम्भोग के बीच का अंतर ऐसा ही है। कहने को तो दोनों में अंतर आसानी से हो जाए, लेकिन अमूमन यथार्थ कल्पना से परे क्लिष्ट होता है, सरल नहीं होता है। मानव के मनोव्यापार और क्रियाएं एकदम से आसानी से परिभाषित नहीं की जा सकती।

बलात्कार की परिभाषा से एक क्षेत्र अब तक अछूता हुआ करता था – परिणीत जोड़े के यौन सम्बन्ध!

कानूनन विवाह को यौन संबंधों के बारे में जोड़े की आपस में सम्मति का सूचक मान कर पति-पत्नी के आपस के यौन सम्बन्ध बलात्कार की परिधि से दूर रखे गए है।

लेकिन जिन लोगों को और काम नहीं होते हैं उन्होंने न्यायालय से इन संबंधों में दखल दिलवा कर यहां किसी भी अनैच्छिक सम्बन्ध को बलात्कार की श्रेणी में लाने के लिए याचिका प्रस्तुत की है।

गौरतलब बात है कि 2016 तक ही सर्वोच्च न्यायालय में 48 हज़ार 418 दीवानी और 11 हज़ार 50 आपराधिक मामले लंबित चल रहे थे, जिन में से 1132 दीवानी और 84 आपराधिक मामले 10 वर्षों से अधिक समय के लिए लंबित चल रहे थे।

उच्च न्यायालय और निचली अदालतों में ये आंकड़े कुछ इस प्रकार है: 1 करोड़ 13 लाख 50 हज़ार 773 दीवानी और 1 करोड़ 92 लाख 91 हज़ार 589 आपराधिक मामले लंबित, जिन में से 12 लाख 1 हज़ार 289 दीवानी और 16 लाख 20 हज़ार 78 आपराधिक मामले 10 वर्षों से अधिक समय के लिए लंबित!

अब न्यायालयों में इतनी भसड़ मची हुई है कि उस में और व्यर्थ के मामले मिला कर उन पर और बोझ डालना सर्वथा अनुचित है। जो मामले सद्य स्थिति में आपराधिक या दीवानी मामलों की शक्ल लेते हैं वे वैसे भी दाखिल हो जाते हैं, उस में और हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।

और ऐसे क़ानून लाने की भी कोई आवश्यकता नहीं की “मी लॉर्ड, कल ना, मेरे बहुत सरदर्द हो रहा था, और ना, उन्होंने मेरी एक न मानी! उन्हें डांटिए ना ज़रा!” जैसी दलीलें सुनने को मिलें!

और वैसे भी मियाँ बीवी के झगड़े में दूसरे को दखल नहीं देना चाहिए, न जाने कब दोनों एक हो कर बिचौलिए की ही खाल खींच लें!

इस परिप्रेक्ष्य में भारतीय दंड विधान का 498ए अनुच्छेद याद कीजिए – क़ानून बना था दहेज़ प्रताड़ना पर अंकुश लगाने के लिए, पर इस के 98% मामले शुद्ध फ़र्जी और पति और ससुराल के लोगों को बिलावजह परेशान करने के लिए दर्ज किए गए थे।

मामला इतना बिगड़ गया कि सर्वोच्च न्यायालय को ‘बिना जांच गैरज़मानती जेल’ वाले प्रावधान को खारिज करना पड़ा और बगैर मज़बूत मामले के ससुराल वालों की गिरफ्तारी पर रोक लगानी पड़ी।

आज न्यायालय में प्रविष्ट मामला भारतीय न्याय व्यवस्था को ध्वस्त करने के लिए एक टाइम बम रोपने के समकक्ष माना जाएगा। इसमें न्यायाधीशों की टिप्पणियां देखें तो ऐसा लगता है कि या तो इन्होंने शादी की ही नहीं, या फिर दुनियादारी का इन्हें कोई ज्ञान है ही नहीं!

ऐसे और दो-चार न्यायाधीश हो जाए, भारत की नैया बगैर पाकिस्तानी/ चीनी आक्रमण के वे खुद ही डुबो सकते है! भगवान बचाए इस प्रकार के न्याय से!

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