लाखों की मौत पर चुप्पी साधकर 28 मौतों पर कलपती काँग्रेस

राष्ट्रीय क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 1 जनवरी 2010 से 31 दिसम्बर 2016 तक की 7 वर्ष की समयावधि में देश में 2 लाख 60 हज़ार 709 लावारिस लाशें बरामद हुईं।

अर्थात इन 7 वर्षों की समयावधि के दौरान देश में प्रतिवर्ष औसतन 37 हज़ार 244 लावारिस लाशें बरामद होती रही हैं।

यहां यह स्पष्ट कर दूं कि NCRB के वर्षवार आंकड़े यह बताते हैं कि सरकार चाहे कांग्रेस की रही हो या भाजपा की, लेकिन देश में मिलने वाली लावारिस लाशों की संख्या में बड़ा अन्तर कभी नहीं रहा। दोनों ही सरकारों के कार्यकाल में यह संख्या एक-दूसरे के आसपास ही रही है।

ज़रा सोचिए कि ढाई लाख से अधिक की संख्या वाले वो लोग किसी के माता, पिता, भाई, बेटा, बेटी, पति या पत्नी ही थे लेकिन उनके घर वाले आज भी यह नहीं जानते कि उनके पिता, माता, भाई, बहन, बेटा बेटी, पति, पत्नी ज़िंदा हैं या मर गए?

वो ढाई लाख से अधिक परिवार रोजाना किस मानसिक यंत्रणा से गुजरते होंगे, तिल तिल कर मरते होंगे, इसकी कल्पना मात्र से शरीर सिहर उठता है।

लगभग 35 साल की नौकरी के बाद रिटायर हुए एक पुलिस अधिकारी से कई वर्ष पूर्व इस सन्दर्भ में एकबार मैंने बात की थी तो उन्होंने मुझे बताया था कि इन लावारिस लाशों की पोस्टमार्टम रिपोर्टों से यह पता चलता है कि इनमें से 80 से 90 प्रतिशत मामले ऐसे होते हैं जो उस व्यक्ति की हत्या किए जाने की स्थितियों की तरफ इंगित करते हैं।

अतः संचार क्रांति की इस 21वीं सदी के वर्तमान दौर में देश में जब दो लाख से अधिक लोगों की हत्या हो जाए और हत्यारे को पकड़ना तो दूर की बात, यह भी पता नहीं चल पाए कि मरने वाला कौन है? तो यह भयानक स्थिति मन मस्तिष्क को झिंझोड़ देती है।

लावारिस लाश के मिलने की खबर अखबारों में सिंगिल कॉलम में संक्षिप्त में छपकर खत्म हो जाती हैं। उन ढाई लाख से अधिक लाशों और उनके परिजनों की पीड़ा पर ना कोई राजनीतिक दल तमतमाता है, ना ही न्यायालय को गुस्सा आता है।

आप मित्रों में से बहुत कम लोगों को यह ज्ञात होगा कि इस सन्दर्भ में वर्ष 2012 में सुप्रीम कोर्ट में PIL (जनहित याचिका) दाखिल की गई थी। 6 वर्ष से यह मामला सुप्रीम कोर्ट में ठण्डे बस्ते में पड़ा हुआ था।

PIL करनेवाली संस्था ने इस वर्ष मई में जब पुनः गुहार लगाई तो सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र सरकार से जवाब मांगा। ध्यान रखिये कि ये वही सुप्रीम कोर्ट है जिसने रॉबर्ट वाड्रा के बहनोई तहसीन पूनावाला तथा तुषार गांधी द्वारा केवल 10 महीने पहले मॉब लिंचिंग के खिलाफ दायर की गई याचिकाओं पर लम्बा चौड़ा फैसला भी सुना दिया।

एकमात्र सुखद तथ्य है यह है कि इसी वर्ष स्वयं प्रधानमंत्री मोदी की पहल पर केन्द्र सरकार ऐसी लावारिस लाशों की DNA प्रोफाइलिंग करने का कानून बनाने जा रही है। ताकि लावारिस लाशों के घरवालों की खोज भविष्य में सम्भव हो सके।

अतः आज सवाल यह है कि यह काम पिछले 71 वर्षों में क्यों नहीं हुआ। इस सन्दर्भ में कोई कानून क्यों नहीं बना? जबकि प्रतिवर्ष हज़ारों लावारिस लाशों के मिलने का सिलसिला दशकों पुराना है।

अतः आज़ादी के बाद देश पर 55 साल शासन करती रही कांग्रेस को देश से बताना चाहिए कि इन लाखों गुमनाम मौतों पर कार्रवाई के बजाय उस कांग्रेस की सरकारें कुम्भकर्णी नींद क्यों सोती रहीं जो कांग्रेस आजकल 4 वर्षों में हुई 28 मौतों पर बुक्का फाड़कर रोने का सियासी पाखण्ड कर रही है।

आज उपरोक्त उल्लेख इसलिए क्योंकि गत 16 जुलाई के अपने संस्करण में अंग्रेज़ी अखबार हिंदुस्तान टाइम्स ने प्रमुखता से यह खबर छापी थी कि देश में 2010 से 15 जून 2018 तक गौरक्षा से सम्बंधित मॉब लिंचिंग की कुल 63 घटनाएं हुईं जिनमें 28 लोगों की मौत हुई। इसके बाद अखबार ने यह भी लिखा कि इनमें से 97% घटनाएं मई 2014 में मोदी सरकार बनने के बाद हुईं।

CBI, ED और इनकम टैक्स विभाग की गम्भीर जांचों के शिकंजे में बुरी तरह फंसा हुआ कुख्यात पत्रकार अभिसार शर्मा भी अखबार की इसी खबर को अपने न्यूज़ चैनल की एक्सक्लूसिव खबर बताकर सवेरे 9 बजे से ABP न्यूज़ चैनल पर मोदी विरोधी पोथी पत्रा लेकर बैठ गया था और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनकी सरकार को पानी पी पीकर कोसने में जुट गया था।

हद तो यह है कि जिस आंकड़े को लेकर अखबार और न्यूज चैनल ने मोदी सरकार के खिलाफ छाती पीटी थी, वह आंकड़ा किसी सरकारी जांच एजेंसी के बजाय INDIA SPEND नाम के एक NGO का था।

दरअसल मोदी विरोधी यह पूरी कवायद इसलिए की गई थी ताकि मॉब लिंचिंग पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने से पहले मोदी विरोधी माहौल बनाया जाए। हुआ भी वही। इन खबरों के प्रकाशन प्रसारण के कुछ घण्टों बाद ही सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुनाया।

देश में भीड़ द्वारा पीट-पीटकर हत्या यानी मॉब लिंचिंग की बढ़ती घटनाओं को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार 16 जुलाई को आदेश दिया। कोर्ट ने संसद से मॉब लिंचिंग के खिलाफ नया और सख्त कानून बनाने को कहा।

आदेश देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ‘कोई भी नागरिक अपने आप में कानून नहीं बन सकता है। लोकतंत्र में भीड़तंत्र की इजाजत नहीं दी जा सकती।’ सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकारों को सख्त आदेश दिया कि वो संविधान के मुताबिक काम करें। कोर्ट ने कहा कि राज्‍य इन बढ़ती घटनाओं के खिलाफ बहरे नहीं हो सकते।

प्रथम दृष्टया सुप्रीम कोर्ट के उपरोक्त फैसले में कुछ भी आपत्तिजनक बात नहीं है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट का फैसला आते ही कांग्रेसी फौज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के विरुद्ध टूट पड़ी थी।

कांग्रेसी प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला लगभग गाली गलौज पर उतारू होते हुए भद्दी भाषा शैली में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को कोसने लगे थे।

ढाई लाख से अधिक मौतों पर चुप्पी और 28 मौतों पर देश की छाती पर ताण्डव और सरकार के खिलाफ हाहाकार यह बताता है कि कहीं कोई बड़ी साज़िश है।

चूंकि लेख काफी लंबा हो गया है अतः मॉब लिंचिंग पर प्रधानमंत्री के खिलाफ छाती कूट रही कांग्रेस का स्वयं का दामन मॉब लिंचिंग के सन्दर्भ में कितना दूषित कलुषित और कलंकी रहा है, इसका ज़िक्र अगले लेख में।

काँग्रेस का हिन्दूविरोधी राजनीतिक दोगलापन

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