राजेश खन्ना : माँओं ने तेरे नाम से बच्चों के नाम रख लिए!

साठ के दशक का अंतिम दौर था, सत्तर की सुगबग़ाहट में हर गली हर मोहल्ले में एक “राजेश” ज़रूर ही होता था!

इस मुल्क की आवाम अपने सिनेमा के पहले सुपरस्टार का इस्तक़बाल कुछ यूँ कर रही थी।

इत्तेफ़ाक से, सिल्वर स्क्रीन पर “काका” को हँसते गाते और लोगों के दिल में समाते देख ही फ़राज़ साहब ने लिखा होगा :

“और अब कितनी मोहब्बत तुझे चाहिए फ़राज़ / माँओं ने तेरे नाम से बच्चों के नाम रख लिए!”

हिंदी सिनेमा में अभिनय के “आका” बन चुके “राजेश खन्ना” के बारे में तुकबंदी मशहूर थी : “ऊपर आका और नीचे काका!”

दो हज़ार बारह में जब “काका” इस जहाँ से रुख़सत हो रहे होंगे, तब उन्होंने वो गीत ज़रूर गुनगुनाया होगा :

“दिल का सूना साज़ तराना ढूँढेगा / तीर-ए-निगाह-ए-नाज़ निशाना ढूँढेगा / मुझको मेरे बाद ज़माना ढूँढेगा!”

क्या ही इत्तेफ़ाक था कि ये गाना कुछ दिनों उनके प्रबल राजनैतिक प्रतिद्वंदी रहे “शत्रुघ्न सिन्हा” पर फ़िल्माया गया, और फ़िल्म के वो दृश्य भी किसी की “मृत्यु” के हैं।

हिंदी सिनेमा अपने पहले सुपरस्टार और आख़िरी दिलवाले को कहाँ से लाएगा, जो मात्र दो तीन घंटे बचाने के लिए “ख़य्याम” को गाड़ी का तोहफ़ा दे दे।

वाक़या कुछ यूँ था कि फ़िल्म “दर्द” की म्यूज़िक रिकॉर्डिंग में संगीतकार “ख़य्याम” देर से पहुँचे और जब “काका” ने कारण जाना तो बोले : “ये लीजिए आपकी नई गाड़ी की चाबी। यदि यूँ ही आप ऑटो-ट्राम-ट्रेन में घंटों बर्बाद करते रहे, तो हमें ये दिलकश धुनें कैसे मिलेंगी!”

चूँकि “आका” और “काका”, अब दोनों ही एकसाथ हैं। आज उन दोनों के साथ के सात बरस पूरे हुए, अब हिंदी सिनमा की ये सदी बहुत कुछ खो देगी!

अलबत्ता, हिंदी सिनेमा अब नहीं देख सकेगा कि किस तरह से एक स्ट्रगलर बेहद महँगी स्पोर्ट्स कार से उतरता है और निर्देशकों से फ़िल्म में किरदार माँगता है। वैसी स्पोर्ट्स कार, जो उस ज़माने में किसी भी निर्देशक या अभिनेता के पास नहीं थी।

निस्सन्देह, अब कभी ऐसा स्टारडम किसी को न मिलेगा, कि लोग उस इंसान के कुर्तों जैसे कुर्ते सिलवाएँ!

अब शायद ही कभी कोई ऐसा अभिनेता आए, जिसको फ़िल्म की कहानी सुनाने के लिए हस्पताल के तमाम कमरे निर्देशकों से भर जाएँ!

अवश्य ही, अब इस देश के अख़बार कभी ये समाचार प्रकाशित न कर सकेंगे कि फ़लाँ शहर में एक लड़की ने “काका” के चित्र से विवाह किया!

या कि लड़कियाँ “काका” का काग़ज़ी फ़ोटोग्राफ़ तकिए के नीचे रख कर सोती हैं!

या कि “काका” के लैटर बॉक्स में खूँ से लिखे ख़त मिले!

या कि जब “काका” अपनी शूटिंग ख़त्म कर के निकले तो अपनी चमचमाती सफ़ेद कार पर पिंक लिपिस्टिक के निशाँ देखकर दंग रह गये!

नई पीढ़ी को जब जब देखना होगा कि किस तरह संवाद स्वर के उतार चढ़ाव के साथ गर्दन मोड़ने और पलकें झपकाने का सामंजस्य बिठाया जाता है, तब तब “काका” की फ़िल्मों से धूल हटाई जाएगी!

“काका” को ख़ुद “काका” से बहोत प्यार था। सत्तर के दशक के बाद जब अभिनेताओं की नई खेप हिंदी सिनेमा को मिली, “काका” अपना वो स्टारडम खोने लगे।

और तब वे आशीर्वाद के टॉप फ़्लोर की छत पर हाथों में ज़ाम लेकर टहलते, शायद कहते होंगे :

“मैं अपनी ज़िन्दगी से बहुत ख़ुश हूँ। ग़र फिर से मौक़ा मिला तो मैं राजेश खन्ना ही बनना चाहूँगा, और हर वो ग़लती भी फिर से करना चाहूँगा जो इस ज़िंदगी में की!”

यूँ तो पसंद के अपने अपने अलग मायने हैं, किंतु “काका” की सबसे आमपसंद फ़िल्म “आनंद” है।

क्या ही आश्चर्य है कि फ़िल्म “आनंद” में नादान-सा लगने वाला युवा, क़रीब सोलह वर्ष बाद फ़िल्म “नादान” में आनंद को जिया।

“आनंद” के नादान, “नादान” के आनंद, आज तुम्हारे बिना सातवे मेंह में तुम्हारी अदाकारियाँ भींज रही हैं और दुनियाभर को भींजा रही हैं!

अस्तु।

[ पुनश्च : मानसून में रोमांटिक मूड के लिए राजेश खन्ना के फ़िल्माए कुछ गीतों का उतना ही महत्त्व है, जितना कि अधिक-मास में आध्यात्मिक माहौल के लिए प्रभु संकीर्तन का। मानसून के प्रसिद्ध गानों में “अजनबी” का “भीगी भीगी रातों में”, “अपना देश” का “कजरा लगा के”, “दो रास्ते” का “छुप गये सारे नज़ारे” और “शहज़ादा” का “झिम झिम रिम झिम” बेहद खास रहे। “बंदिश” का “रंग भरे मौसम से रंग चुरा के” भी बेहद निसबती है यहाँ! ]

[ चित्र : फ़िल्म “अजनबी” के गीत “भीगी भीगी रातों” का एक दृश्य। ]

पल पल दिल के पास, तुम रहती हो, जीवन मीठी प्यास, तुम कहती हो

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