क्या इस बहुरूपिये के कारनामों से देश अनजान है?

रावण के साथ राम ने क्या किया था?

युद्ध।

राम इस दौरान राजा नहीं थे। फिर भी उन्होंने बाली का वध किया था। जबकि राम को मर्यादा पुरुषोत्तम कहा जाता है।

विश्व में श्रीराम जैसा आदर्श पुरुष अब तक नहीं हुआ। फिर भी उन्होंने शस्त्र उठाया, यह हमारे शास्त्रों में है।

दशहरा और दीपावली श्रीराम की विजय का प्रतीक है जो युगों से उत्सव के रूप में मनाई जाती है।

श्रीकृष्ण ने कंस के साथ क्या किया था? शस्त्र से उसका संहार किया था। एक बार नहीं अनेक बार धर्म की स्थापना के लिए उन्होंने भी शस्त्र उठाये।

यही नहीं, अर्जुन को भी शस्त्र उठाने के लिए प्रेरित किया। ऐसा नहीं करते तो क्या दुर्योधन-शकुनी मानते?

जिस दुष्ट राक्षस ने माता सीता का अपहरण किया था, क्या उसके साथ शांति और समझौता किया जाना चाहिए था? क्या वो अहिंसा से बात मान जाता?

ऐसी एक नहीं अनगिनत पौराणिक कथाएं हैं जहां देवताओं को राक्षसों – असुरों के साथ युद्ध लड़ना पड़ा। और युद्ध सिर्फ और सिर्फ हिंसात्मक होता है।

हिन्दू समाज में सर्वाधिक पूजा किस की होती है? महादेव की, माँ दुर्गा की, महाबली हनुमान की। ये सभी शक्ति के प्रतीक हैं।

इसलिए हे कलयुगी गांधीवादियों, सनातन जीवन दर्शन के नाम पर झूठ ना परोसो। ना ही हिन्दुओं को कायर और नपुंसक बनाओ। तुम्हारी इसी मूर्खता की वजह से हज़ार साल हम गुलाम रहे। और आज़ादी के बाद भी बने हुए हैं।

सुन रहे हैं कि एक बहुरूपिये की पिटाई भीड़ ने कर दी।

जो महानुभाव, इस घटना के संदर्भ में, विचारधारा का पाठ पढ़ा रहे हैं, उनसे सवाल है कि जब वो बहुरुपिया इतने लम्बे समय से झूठ और भ्रम फैला रहा था तब आप अपने शास्त्र का ज्ञान लेकर कौन सी गुफा में सोये हुए थे? तब आप ने उसके साथ शास्त्रार्थ क्यों नहीं किया?

मीडिया ने तो उल्टा उसका सदा ही प्रचार प्रसार किया है। सरकारें और न्यायालय संविधान से बंधे हुए हैं। ऐसा होना भी चाहिए। कानून का राज सर्वोत्तम है।

लेकिन अगर ऐसे दुष्ट कपटी बहुरूपिये कानून के हाथों से बच जाते हैं तो समाज क्या करे? क्या वो इन सिंडिकेट के षड्यंत्रों का शिकार होता रहे?

नहीं। कोई भी ज़िंदा समाज प्रतिक्रिया देगा। देना चाहिए। चिड़िया का बच्चा भी दबाये जाने पर चोंच मारता है।

जो कानून की दुहाई दे रहे हैं, सनातन की सहिष्णुता का पाठ पढ़ा रहे हैं, वो ज़मीन पर नहीं रहते। क्या वे बता सकते हैं कि कश्मीरी पंडितों को आज तक न्याय क्यों नहीं मिल पाया जबकि रोहिंग्या बाहर से आकर हम पर खुले आम अन्याय कर रहे हैं।

ये रोहिंग्या कहां से भगाये गए? क्यों भगाये गए? इन सबसे अधिक महत्वपूर्ण सवाल है किसके द्वारा भगाये गए? उन्ही के द्वारा, जो बुद्ध धर्म को मानते हैं। वही बुद्ध धर्म जो सनातन से निकला है और अहिंसा की बात करता है।

सवाल उठता है कि क्या इस बहुरूपिये के कारनामों से देश अनजान है? क्या नक्सलवाद एक गंभीर समस्या नहीं? कौन पाल रहा है इन नक्सलियों को? जब इनसे लड़ते हुए सैकड़ों जवान शहीद होते हैं तब आप का मानवतावाद कहाँ खो जाता है?

फिल्मों में सफेदपोश खलनायक को पकड़ना मुश्किल होता है। अमूमन उसकी पिटाई अंत में फिल्म का हीरो ही करता है।

प्रजातंत्र में जनता सर्वोपरि है। जनता ही हीरो है। और यहाँ जनता ने ही पिटाई की है।

अगर यकीन नहीं होता तो देखिए जनता की इस पिटाई पर किस तरह आम जनता ताली पीट रही है, ठीक उसी तरह जिस तरह जब एक हीरो फिल्म के परदे पर खलनायक की पिटाई करता है।

जीवन एक रंगमंच है। हम सब इसमें अपनी अपनी भूमिका अदा कर रहे हैं। क्लाइमेक्स का सीन चल रहा है, जो खलनायक के साथ हैं वो पिट रहे हैं भाग रहे हैं छिप रहे हैं, लेकिन जो नायक के साथ हैं वो और कुछ नहीं तो ताली पीट रहे हैं। आप किस भूमिका में हैं, दर्शक साफ़ साफ़ देख रहा है।

उनके पास समर्थक हैं, दलाल हैं, दरबारी हैं, पर स्वयंसेवक नहीं

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY