Success Story : आप बदल के देखो, आपकी दुनिया बदल जाएगी

आप सब में से ज्यादातर लोगों को पता है कि बनारस में मेरा एक छोटा सा रेस्त्रां है Food Bindaas के नाम से जिसको हमने 11 Nov 2016 को open किया था, हां वही 8 Nov वाले नोट बंदी के दो दिन बाद।

मुद्दे पे आने से पहले बता दूं कि जब open किया था तो उसको Fast Food Corner के रूप में open किया था। Chinese & South Indian items के साथ, तब Indian खाना नहीं था। आज से कोई 6-8 महीने पहले Chinese & South Indian को secondary कर दिया था और Indian खाने को base बना लिया।

Indian खाने में भी “थाली” को सबसे महत्वपूर्ण स्थान दिया, Menu के items (Paneer masala, paneer butter masala, kadahi paneer etc) को secondary कर दिया। पिछले एक महीने से South Indian को बंद ही कर दिया हमने। मेरा एक instruction था कि कोई भी थाली खाने आया हुआ ग्राहक वापस नहीं जाना चाहिए, भले वो 40 rs वाला थाली ही खाने क्यों ना आया हो। मतलब साफ है कि एक साथ दो लोग आए जिसमें से एक थाली लेगा और दूसरा menu से order करके खाएगा, पहले थाली वाले को देना है, भले order वाला चले जाए।

ऐसा क्यों?

ये सवाल ही मुद्दा है और आज इस पर ही बात करना चाहता हूं।

एक रेस्तरां चलाना है तो आपको Chef चाहिए, Helper चाहिए, मसालची (बर्तन धोने वाला, सबसे important part) चाहिए, service वाला चाहिए, आप खुद बैठते हैं तो ठीक वरना वहां भी एक चाहिए जो सब चीजों को properly manage करे।

Chinese, South Indian, Continental Indian (as per menu) etc के लिए chef चाहिए और वो भी अच्छा तभी आपके यहां लोग आएंगे पर थाली वाले भोजन में ऐसा नहीं है। थाली वाले भोजन में बस ये ध्यान देना होता है कि खाना खाते समय ग्राहक को ये लगे कि वो अपने घर का खाना खा रहा है।

Chef के नखरे को झेलना सबके बस की बात नहीं है और ये line ऐसा है कि कोई भी chef आपके पास रह कर 2-4 साल काम नहीं करेगा, हर 4-6 months में आपको तैयार रहना होता है नया chef खोजने के लिए, पुराना वाला बिना बताए चल देगा। केवल chef ही नहीं, मसालची से लेकर service वाले तक का यही हाल है। 500 rs कहीं ज्यादा मिला नहीं कि चल देगा बिना बताए।

शुरुआत के एक साल तो मैं बहुत परेशान रहा। हर दूसरे तीसरे महीने रेस्त्रां 24 दिन के लिए बंद और मैं रोज टूटता जा रहा था। थक चुका था कि एक दिन अंदर से आवाज़ आई कि बंद कर ये सब और खाना खिला… Dosa, Paneer Masala और Paneer Chilli जैसे item से focus हटा और 40 rs में लोगों को बैठा कर खाना खिला और मैं लगा थाली भोजन कराने।

40, 60, 80, 100, 120, 150 रूपये की थाली। थाली के भोजन को बनाने के लिए कोई भौकाली chef की जरूरत नहीं, किसी खाना बनाने वाले को रख कर बनवाया जा सकता है अपने हिसाब से घर जैसा।

देखते देखते थाली मेरे रेस्तरां की पहचान बन गयी, लोग थाली खाने के लिए आने लगे।

मैंने दो महिला कर्मियों को रख लिया रोटी बनाने और बर्तन साफ करने के लिए। महिलाओं s में नखरा नहीं होता और वो बैठ के पंचायत नहीं करती, उनको अपने काम से मतलब रहता है। एक खाना बनाने वाले को रखा जो सुबह 8 बजे आता है और ढाई घंटे में पूरे दिन का खाना बना कर 10.30 तक चला जाता है। एक chef है और 3 supporting staff… खाना घटा तो back up खाना supporting staff भी बना लेता है।

आज रेस्त्रां को उस position में लाकर खड़ा कर दिया है कि chef ना भी रहे तो चलता रहेगा, नहीं खिलाएगें लोगों को paneer masala और kadahi paneer, थाली का भोजन करेंगे। चावल-दाल-सब्ज़ी बनाना है थाली के लिए, कोई नहीं रहा तो खुद से बना कर खिला देंगे, बस 2-3 supporting staff लेकर।

मैंने ज़रूरत के हिसाब से खुद को बदल लिया, आज मेरी दुनिया ही बदल गई है, रेस्त्रां को लेकर अब मैं डरता नहीं, वो समय था जब डरता था कि फलां छोड़ देगा तो कैसे चलेगा, आज निकालने की ताकत रखता हूं।

आप भी बदलो, अपनी कमज़ोरी को ही अपनी ताकत बना लो, यकीन मानो आपकी दुनिया बदल जाएगी।

– मनोज कुमार सिंह(बिंदास बनारसी)

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