‘परिवार’ को भारत के सत्ताशीर्ष पर बनाए रखने के, हम भी तो हैं कुछ ज़िम्मेदार

स्वतंत्रता के बाद एक परिवार ने लॉलीपॉप, स्लोगन, इमरजेंसी, तुष्टिकरण, गुंडागर्दी, चमचों के द्वारा अपने आप को सत्ता के शीर्ष पर बनाये रखा।

पिता, बिटिया, नाती, बहू (सरदार जी सिर्फ कठपुतली थे) ने सत्ता पर कब्ज़ा बनाये रखा, अपने और अपने खानदान को खरबों रुपये लूटकर समृद्ध किया। अब अपने परिवार के एक अन्य ‘चिराग’ को थोपने की तैयारी चल रही है।

ऊपर से इस परिवार की बिटिया के पति सांसद, स्टेनो सांसद और मंत्री, यार-दोस्त सांसद और मंत्री; और ‘चिराग’ की बहन और किसान बहनोई सरकारी बंगले में।

अब यूपी और बिहार के यादव परिवारों को ले लीजिये। मुलायम यादव ने मुख्य मंत्री के नाते अंग्रेज़ी का विरोध किया, जनता की वाह वाही लूटी, लेकिन सत्ता में रहते हुए अपने पुत्र को अंग्रेजी भाषा में शिक्षा दिलवाई और ऑस्ट्रेलिया में पढ़वाया। कुछ ही वर्षो में अरबों की संपत्ति एकत्रित की। इसके अलावा एक समय उनके परिवार के 17-18 लोग सांसद, विधायक, और मंत्री थे।

मेरी मित्र सूची के कुछ यादव बंधुओं ने फेसबुक पर लिखा कि प्रधानमंत्री मोदी ने कौन सा नया काम कर दिया है? पूर्वांचल का पत्थर तो अखिलेश लगवा गए थे। यूपी की हर स्कीम का पत्थर भी वे लगा गए थे। प्रधानमंत्री के द्वारा बनारस में किए जा रहे जा रहे विकास कार्यों का मजाक उड़ाया।

मेरा उनसे एक प्रश्न है : मुलायम सिंह यादव स्वयं रक्षा मंत्री थे। तब वे वन रैंक वन पेंशन क्यों नहीं लागू करवा पाए?

बाप-बेटे मिलकर 12-13 वर्ष यूपी के मुख्यमंत्री रहे और बदले में क्या किया?

सैफई में नाँच-गाना, बर्थडे पार्टी मनाना, और योजनाओ की घोषणा कर देना, फाउंडेशन स्टोन लगवा देना। अधिकतर अपनी जात वालो और अल्पसंख्यकों को नौकरी दिलवाई, ठेके दिलवाये। क्या कोई विज़न था? गुजरात छोड़िये, क्या यूपी को अपने शासन काल में आंध्र प्रदेश या कर्नाटक के पास भी ला पाए?

प्रधानमंत्री मोदी ने जनवरी 2018 में बाड़मेर में कहा था “कई सरकारें आईं और गईं – रेलवे बजट में 1500 से ज्‍यादा, 1500 से ज्‍यादा ऐसी-ऐसी योजनाओं की घोषणाएं की गईं- जो आज उसका नामोनिशान नहीं है, वैसे ही कागज पर लटकी पड़ी हैं।”

उन्होंने कहा कि बाड़मेर की रिफाइनरी में सिर्फ पत्‍थर जड़कर फोटो खिंचवाई गई थी और लोगों की आंखों में धूल झोंकी गई थी।

अभी हाल ही में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की काफी आलोचना हुई थी। उनकी आलोचना करने वालों में ब्राह्मण सबसे आगे थे। राजनाथ सिंह की भी ठाकुरों ने आलोचना करने में कोई कमी नहीं रखी।

प्रधानमंत्री मोदी स्वयं पिछड़ी जाति से हैं। पर उनके समर्थकों में सभी समुदाय सम्मिलित हैं। मैं स्वयं प्रधानमंत्री मोदी का पुरजोर समर्थन करता हूं लेकिन वह तो मेरी जात के नहीं है। इसके अलावा अगर उनकी कोई नीति नहीं पसंद आती तो उसकी आलोचना भी की जाती है।

प्रधानमंत्री मोदी यह भी कह चुके हैं कि अगर माता-पिता अपने लड़कों से पूछते हैं कि रात को देर से क्यों आए? कहां थे? तो शायद महिलाओं के खिलाफ हो रहे अपराधों में कमी आती। क्या एक बार भी उन यादव मित्रों ने मुलायम, अखिलेश या लालू की कार्य पद्धति पर प्रश्नचिन्ह उठाया?

यूपी और बिहार के यादव राजनैतिज्ञों तथा मायावती को पता है कि उनके समर्थक उनके सौ खून माफ कर देंगे। उनकी कार्य पद्धति पर कभी भी प्रश्नचिह्न नहीं उठाएंगे। सिर्फ उनकी जात देखकर उनके जात बंधु वोट दे देंगे। अगर वोट सिर्फ जात के नाम पर मिलना है तो विकास क्यों किया जाए?

यादव परिवार – चाहे यूपी में या बिहार में – या मायावती या केजरीवाल अभिजात्य वर्ग में पैदा नहीं हुए थे। लेकिन वह बहुत जल्दी यह समझ लेते हैं कि कैसे सत्ता पर स्लोगनों के द्वारा, बदलाव के नाम पर, कब्ज़ा करना है।

एक बार जब सत्ता मिल गयी तो वे स्वयं उसी अभिजात्य वर्ग के सदस्य हो जाते हैं और फिर वह अपनी नयी सामाजिक स्थिति एवं स्टेटस को बनाये रखने में लग जाते है।

आप नोट करिये कि सत्ता में आने के बाद कैसे वे सबसे पहले मीडिया को विज्ञापन, प्लाट, मकान, विदेशी यात्रा, कॉलेज में सदस्यता, ठेके इत्यदि की ‘घूस’ देते हैं, जिससे वे अपनी दुम हिलाएं और उनकी कारगुजारियों को अनदेखा करें।

अगर आप भारत को एक सशक्त राष्ट्र बनाना चाहते हैं तो सबसे पहले जात पात के दायरे से बाहर निकलकर अपनी जात के नेताओं से प्रश्न पूछना शुरू करिए। अगर आप यदुवंशी हैं तो उस यदुवंश की मर्यादा, विवेक और गौरव का ध्यान रखिए।

भारत में हमारी आंखों के सामने हो रहे हैं क्रांतिकारी परिवर्तन

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY