पल पल दिल के पास, तुम रहती हो, जीवन मीठी प्यास, तुम कहती हो

प्रेम की आरंभिक गुंजनों का ध्येय गीत है ये।

नायक अपने एकांत में नायिका को कल्पना से निर्मित करता है, और उससे कहता है : “पल पल दिल के पास / तुम रहती हो!”

यथार्थ दूरस्थता की उपस्थिति में भी निकटता का भाव लिए हुए गीत है। मीठे जल का सागर हृदय के सन्निकट हो और स्वयं कहे : “ये जीवन प्यास है!”

ऐसी अनुपस्थितियों के उत्सव का गान है ये। और नायक तिस पर भी मीठी प्यास का अनुसरण करता हुआ उससे निकटता चाहता है।

नायक की स्वीकारोक्ति है ये, कि इतना सब मेरे ख़्वाबों में हो रहा है तो वास्तविकता में क्योंकर ये सब अनुपस्थित रहे। एक धीमी सी पुकार है सपनों को, कि आओ और इस कठोर वास्तविकता को अपनी उपस्थिति से भर दो।

“हर शाम आँखों पर / तेरा आँचल लहराए।
हर रात यादों की / बारात ले आए।”

साँयकाल में आखें अँधियारे की एक परत से टकराती हैं। हर ओर उस उस कृष्णवर्ण के तिमिर को अपनी प्रेमिका का आँचल मान लेना, हर ओर केवल स्वप्न की उपस्थिति को दर्शाता है।

नायक की हर रात स्मृतियों के एक हुजूम के साथ आती है। क्या मालूम, अपनी हर एक स्मृति को सितारों का रूप दे दिया है उसने! क्या मालूम कि उसकी प्रेमिका ही उसकी सर्वश्रेष्ठ स्मृति बनकर चंद्रमा बन चमकती है!

“मैं सांस लेता हूँ / तेरी खुशबू आती है।
एक महका महका सा / पैगाम लाती है।”

स्वयं को एक उपवन में खड़ा पाना और प्रेमिका को उपवन के स्वरूप में अनुभव करने जैसी पंक्तियाँ हैं। प्रत्येक श्वास में प्रेम को पाना, ठीक वैसे ही जैसे हाल ही के दिनों में एक गीत की आरंभिक पंक्ति थी : “तू आता है सीने में / जब जब साँसें भरती हूँ!”

इस गाने के दृश्य देखेंगे तो पाएँगे कि धर्मेंद्र और राखी एक दूसरे से ख़तों के माध्यम से जुड़े हैं। पूरी की पूरी दृश्य-श्रृंखला में परस्पर भेंट काल्पनिक होती है। महज़ स्वप्न से स्वप्नों को संदेश प्राप्त होने जैसा कौतूहल भी गीत में ही निदर्शित होता है।

और फिर अंत में पूरक पंक्ति के साथ ध्येय-वाक्य : “मेरे दिल की धड़कन भी / तेरे गीत गाती है!”

तो साहिबान, ये था इस नग़मे के पहले मुखड़े का सूरते बयाँ! धर्मेंद्र यहीं नहीं रुकते, बल्कि क़रीब छः मिनट के इस गीत में कुल तीन मुखड़े हैं।

जब मैं छोटा था तो एक रोज़ मैंने पढ़ा : “अभिज्ञानशाकुन्तलम् में कुल एक सौ अस्सी उपमाओं प्रयोग है!” मैं आश्चर्यचकित था कि मल्लिनाथ कालिदास में कितने डूबे होंगे, उन्होंने कथा-कथानक से परे उपमानों तक को गिन डाला। लेकिन आज प्रत्येक गीत में उपमानों की संख्या गिनना मेरा प्रिय शग़ल है।

इस गीत में कुल दस कल्पनाएँ हैं, जैसे ख़्वाबों में बुलाकर जलने की ख़्वाहिश करना, राखी को अपने आँगन में देखना, इस ख़ूबसूरत स्वप्न की आवाज़ और अपना बनाने की गुज़ारिश सुनना!

गीत की आख़िरी पंक्ति तुलसी से प्रेरित है, भय बिनु होय न प्रीति। धर्मेंद्र कहते हैं : “मैं सोच में रहता हूँ / डर डर के कहता हूँ!” ये डर ही तो इस लौकिक प्रीति को अलौकिक रूप दे रहा है।

इस गीत को फ़िल्म “ब्लैकमेल” में धर्मेंद्र और राखी के लिए फ़िल्माया गया है। प्रेम की ऐसी अभिव्यक्ति जिसे एक युगल विवाह से ठीक पूर्व अनुभव करता है।

इस गीत के बोल राजेंद्र कृष्ण ने लिखे हैं। उन्नीस सौ इकतालीस से लेकर छियत्तर तक, राजेंद्र के लिखे तीन सौ अड़तीस गीत भारतीय हिंदी सिनेमा को मिले। राजेंद्र ने कृष्ण की बाल मनुहार “मइया मोरी, मैं नहीं माखन खायो!” से लेकर युवा मन के अनुनयन “मैं प्यासा तुम सावन, हो ना?” को अपनी कलम से रेखांकित किया।

उनके लिखे गीतों में “तुम्हीं मेरे मंदिर / तुम्हीं मेरी पूजा”, “एक चतुर नार” व “जहाँ डाल डाल पर सोने की चिड़िया करती हैं बसेरा” उल्लेखनीय हैं।

कल्याण जी व आनंद जी की जोड़ी ने इस गीत की कालजयी धुन को निर्मित किया है। उनके नाम ढेर सारी बेहतरीन धुनें हैं, जो स्वयं उनकी क्षमताओं के विषय में पर्याप्त वर्णित कर देती हैं।

कुछ गीत ऐसे होते हैं, जिन्हें गाए बिना कोई भी स्वयं को गायक सिद्ध नहीं कर सकता। उन गीतों का रीऐलिटी शोज़ व स्टेज पर्फ़ोर्मन्स आदि में अशेष स्थान होता है। उन्हीं कुछ गीतों की एक सूची में इस गीत का स्थान है।

इंटरनेट पर खोजें तो हज़ारों कवर और वर्जन मिलेंगे इसके। किसी ने धीमा तो किसी ने रीमिक्स कर के प्रयोग किया है। कोई एक वाद्ययंत्र के साथ तो कोई पूरे साज के साथ इसपर रियाज़ कर रहा है।

किंतु धुन वही रहेगी : “पल पल दिल के पास / तुम रहती हो!”

अभी तो दशकों और लगेंगे, उस तरह का नग़मा नई पीढ़ी को देने में। तब तक के लिए हर रोज़ ही नहीं बल्कि हर एक पल के लिए भी कोई उत्कट प्रेमी अपनी भावनाओं के अतिरेक का प्रकटीकरण चाहेगा तो वो इसी गीत को चुनेगा।

और कहेगा : “जीवन मीठी प्यास / तुम कहती हो!”

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