महिला सशक्तिकरण का वास्तविक अर्थ सिखा गयी सब्ज़ी बेचनेवाली लड़की

Symbolic Photo

पिछली बार शिलांग (मेघालय) जाना हुआ. शाम के तक़रीबन 5 बजे हम पुलिस बाजार में थे। इस वक्त वहां अमूमन गुलाबी ठण्ड हो रही होती है। होटल की ओर बढ़ते हुए हमने कुछ लड़कियों को देखा जो फूटपाथ पर सब्ज़ियां बेच रही थी। ऐसा असम में भी होता है। पर गौर करने वाली बात ये थी कि उनके जीन्स ब्रांडेड थे, जैकेट पर NIKE छपा था और पैरों में एडिडास के खूबसूरत जूते थे ।

एक लड़की ये ज़रूर ध्यान देती है की सामने वाली ने क्या पहन रखा है, मैंने भी एक नजर मार ली। सामने देखा तो एक भूरे और तार की तरह सीधे बालों वाली लड़की थी दुकान पर। वो मेरी ही उम्र की नज़र आई तो मेरा देखना लाज़मी था। वैक्सिंग किये हुए हाथ साफ़ दिख रहे थे।

मैंने जिज्ञासावश उनसे बात करने की कोशिश की, माय गॉड! फर्राटेदार अंग्रेज़ी में उसने बताया कि वो MBA फाइनल इयर की स्टूडेंट है। परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी अच्छी नहीं, पढ़ने का जूनून भी है, तो दिन में क्लास अटेंड करके शाम को college से सीधे दुकान पर आती है।

शानदार और आकर्षक व्यक्तित्व, साफ़ सुथरे कपड़े और मार्केटिंग ज्ञान का अद्भुत प्रदर्शन उसे कुछ घण्टो में इतनी कमाई दे देता है कि वो अपने परिवार के पांच सदस्यों का न सिर्फ पेट पालती है बल्कि अपनी पढ़ाई और अपने कपड़ों का खर्च खुद उठाती है।

महिला का असली एम्पावरमेंट ये है, वो मजबूत होने के लिए 33% का रोना नहीं रोई। मैंने मुस्कुराते हुए विदा ली। रात में सोने तक उसकी बातें दिमाग में गूंजती रही। कमाल की जीवटता देख ली थी मैंने। महिला सशक्तिकरण का जीवंत उदहारण मेरी आँखों के सामने था।

घर में बहनों में सबसे छोटी हूँ, बस अभि मुझसे छोटा है, बचपन में काफी बीमार रहने की वजह से हमेशा माँ से चिपकी ही रही हूँ। अब अकसर काम के सिलसिले में जब भी बाहर होती हूँ तो माँ को दिन में आठ से दस से बार फ़ोन कर देती हूँ, पर क्या मजाल की माँ ने कभी भी व्यस्त होने का बहाना किया हो। अक्सर अकेले आती जाती हूँ, पर ऐसा कोई काम नहीं कर सकी जिससे खुद पर गर्व हो। उस लड़की ने मुझे अनजाने में ही बता दिया था कि सशक्तिकरण का असली मतलब क्या है।

मैं कोई अलग नहीं, पढ़ाई के साथ साथ लगभग हर चीज़ें ज़्यादातर एक लड़की अपनी माँ से ही सीखती है – मैंने भी सीखा। नॉर्थईस्ट में विभिन्न भाषायी लोगों के प्रवास करने के कारण हमारे लिए कई सारी भाषाओं को सीखना निहायत ज़रुरी हो जाता है।

कई सारी आंचलिक भाषाओं को मैं माँ से ही सीखी हूँ। मेरे घर का प्रत्येक सदस्य कम से कम एक म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट जरूर बजा लेता है, पर मैं सबसे बेहतर हूँ क्योंकि माँ ने नृत्य और गायन में भी मुझे कौशल प्रदान किया हैं। हाँ भाषायी ज्ञान में दीदी बेस्ट है, उनकी हिंदी अंग्रेज़ी और असमिस् एकदम माशाल्लाह है।

मेरा यही मानना है इंसान को लिंगभेद से ऊपर उठकर ज़्यादा से ज़्यादा चीज़ों को सीखने की कोशिश करनी चाहिए। कोई भी कला पुरुष या महिला विशेष के लिए नहीं होती। कला का नाता इंसानियत और अध्यात्म से होता है।

नॉर्थईस्ट इस मामले में बहुत ही खास है, कोकराझार से लेकर तिनसुकिया तक अनेकों जनजातियां हर किसी की अपनी भाषा और संस्कृति, और हर किसी ने इसे खूबसूरती से सम्हाल रखा है, हम विज्ञान वर्ग या अभ्यांत्रिकी में परास्नातक होने के बावजूद भी अपनी विरासत और संस्कृति को ज़िन्दा रखते हैं। ये हमें अपने परिवार में अपनी मां से ही सीखने को मिलता है। यहाँ लैंगिक भेदभाव बाकी भारत की अपेक्षा बहुत कम है।

अगर देखा जाय तो लड़कियों में सर्वगुणसम्पन्न होने की सम्भावनाएं थोड़ी ज़्यादा होती हैं। भारत में लैंगिक भेदभाव को मद्देनज़र रखते हुए मैं नार्थईस्ट को लड़कियों के लिए भारत में सबसे अच्छी जगह मानती हूँ। हमारा जब मन करता है जहाँ कहीं भी जाने का मन हो, हम जा सकते हैं, बस सेल्फ मारने भर की देर होती है।

यहाँ लड़कियां सायकिल पंप से स्वयं हवा भर लेती है, हम तो स्टेपनी तक खुद ही चेंज कर लेते हैं। हमें परिवार की आर्थिक व्यवस्था में योगदान करने का अवसर मिलता है और यहाँ की लड़कियों को मैंने बहुत ही ज़िम्मेदारी से उसका निर्वाह करते देखा है।

महिला सशक्तिकरण को वास्तव में किसी आरक्षण जैसी बैसाखी की शायद ज़रुरत नहीं, बैसाखी तो बेचारों का सहारा होती है। आरक्षण के आधार पर हासिल मजबूती Fragile होती है। सशक्तिकरण अपने दम से होता है – यही सिखा गयी वो भूरे बालों वाली खूबसूरत लड़की, सब्ज़ी बेचने वाली लड़की।

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY