आज मेरे यार की शादी है

उत्तर प्रदेश के कासगंज जिला का निजामपुर गांव आज से 6 महीने पहले… गांव के सवर्ण ठाकुर समुदाय द्वारा गांव में दलित संजय जाटव की बारात घोड़ी और गाजे-बाजे के साथ न निकलने देने के लिए चर्चा में रहा, बदनाम हुआ।

कल यानी बीते इतवार को उसी गांव में पड़ोसी जिले हाथरस का वही 27 वर्षीय दूल्हा संजय जाटव… दो घोड़ी सजी बग्गी पर गाजे-बाजे सहित अपनी बारात लेकर न सिर्फ पहुंचा, बल्कि पूरी शांति, हंसी-खुशी के साथ घुड़चढ़ी, द्वारपूजा सहित रस्में निभाई गयीं।

18 साल की दुल्हन शीतल के लिए अपनी बारात को यूं आते देखना एक लड़की के लिए ही नहीं बल्कि पूरे समाज के लिए किस भाव का अवसर रहा होगा इसे समझना कोई मुश्किल नहीं।

जहां संजय ने कहा कि न तो मेरा दलित समुदाय और न ही मैं कभी भी गांव के ठाकुर समुदाय से कोई बैर नहीं रखता है या था… लेकिन सनातनी हिन्दू रीति और परंपरा से शादी करना मेरा अधिकार था और मैंने अपने इस धार्मिक-सामाजिक अधिकार के लिए संघर्ष किया, तो वहीं दुल्हन शीतल ने अपने पति के इस संघर्ष की वजह से गांव में जाति के आधार पर फैली इस कुरीति के खत्म होने पर खुशी जाहिर की।

जिला प्रशासन के अनुसार दूल्हे संजय को कासगंज पुलिस ने दोनों जिलों की सीमा पर अपने साथ लिया और वहां से अपनी देख-रेख में बारात को गांव और दुल्हन के घर तक ले गए। पुलिस और प्रशासन के इस सहयोग की वजह से यह संजय की बारात पूरे 2 घँटे का समय लेते हुए उसी रास्ते से गयी जिससे न जाने देने पर विवाद हुआ था।

संजय-शीतल की यह शादी दरअसल 20 अप्रैल को ही होनी थी लेकिन दुल्हन की उम्र उस समय तक 18 साल से कम पाये जाने पर मजिस्ट्रेट द्वारा जांच के बाद आगे बढ़ा दी गयी थी।

आज के समय में किसी जातिगत सामाजिक कुरीति की वजह से कोई बारात पुलिस सुरक्षा में निकालनी पड़े, और शादी प्रशासन को अपने देख-रेख में कराना पड़े यह कोई गर्व का विषय नहीं हो सकता किसी भी जिंदा समाज के लिए।

लेकिन कासगंज की इस घटना को उत्तर प्रदेश सरकार और उसके राजनैतिक नेतृव की सामाजिक-जातिगत समरसता और समाज में जातिगत भेदभाव की कुरीति को खत्म करने की उच्चतम प्राथमिकता और दृढ़संकल्प नीयत का उदाहरण है।

इसी के साथ बधाई संजय, शीतल और पूरे समाज को देनी बनती है कि उन्होंने अपने शादी करने के धार्मिक अधिकार से वंचित किये जाने पर किसी तरह के धर्मत्याग जैसी ब्लैकमेलिंग और नकारात्मकता का सहारा लेने के बजाय…. समाज, प्रशासन का सहयोग लेकर सनातनी विधि परंपरा के साथ अपने हिन्दू धर्म के अनुसार विवाह और नवजीवन शुरू करने के हक को हासिल किया।

उत्तर प्रदेश की सरकार ने यह दिखाया है कि समाज मे जातिगत स्तर पर किसी तरह का भेदभाव, शारीरिक, सामाजिक, आर्थिक भेदभाव उसे स्वीकार नहीं। यही वजह है कि यह जानते हुए कि प्रशासन की इतनी मौजूदगी कोई सामान्य और स्वस्थ बात नहीं, फिर भी भारी सुरक्षा के बीच अपने सामाजिक-धार्मिक अधिकार के लिए खड़े दलित युवा और उसके समाज को वह सामाजिक हक हासिल हो जिससे एक कुरीति के चलते वे वंचित रहे।

यह सही है कि इस तरह के प्रशासनिक दबाव कोई दीर्घकालिक हल नहीं है ऐसी समस्याओं के निस्तारण के लिए और इसे सामाजिक जागरूकता और चेतना, सहयोग के जरिये ही खत्म किया जा सकता है, सुधार लाया जा सकता है। फिर भी कई बार नियम, सख्ती, और कानून भी समाज से ऐसी कुरीतियों को खत्म करने में मदतगार साबित होती हैं।

इसी सामाजिक उपलब्धि का साक्षी बना निजामपुर गांव और राजनैतिक नेतृत्व और सरकार द्वारा सामाजिक-धार्मिक हक-हकूक कल हासिल करने के प्रतीक बने संजय और शीतल।

इस सारी सकारात्मकता के बीच जो सबसे खटकने और ध्यान देने की बात है.. वह यह, कि अबसे 6 महीने पहले जब इसी संजय कक बारात जातिगत भेदभाव के चलते गांव में नहीं निकलने दी गयी तो स्थापित मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक तमाम पाखंडी शुद्धतावादी कलमकारों, स्तंभकारों, टीवी पैनलिस्टों ने इसे पूरी नकारात्मकता के साथ खबर बाज़ार का समोसा और पकौड़ी बना कर बेंचा और दलित अधिकारों के हनन के झंडे बुलंद किये।

लाल-पीले गिरोहों के साथ जय भीम-जय मीम के नकारात्मक नारेबाजों ने भी जातिगत जहरीली टिप्पणियों से लेकर दलित अधिकारों के नाम पर समाज और हिन्दू समुदाय में मतभेद फैलाने का सामान बनाया इस खबर को।

जातिगत राजनीति करने की धनी राजनीतिक पार्टियों से कभी किसी सकारात्मकता की उम्मीद बेमानीं है क्योंकि इनकी राजनीतिक दूकानें इन्ही जातिगत नफरतों और ब्लैकमेलिंग पर सजती आईं हैं।

इस सबके बाद भी मैं कहूंगा…. ऐसा करना कोई गलत नहीं.. ऐसे सामाजिक अपराधों पर आवाज उठाना कभी भी अनुचित नहीं लेकिन दुख तब होता है जब उसी निजामपुर में… उसी दलित समुदाय के बीच ऐसा कुछ सकारात्मक और सुखद हो तब ये सभी जमातें मौनव्रत में होती हैं या ऐसी उपलब्धियों पर चर्चा-संवाद-ख़बरबाजी उन्हें लाभ के विषय नहीं लगते।

मैं मानता हूं कि ऐसे अवसरवादी और विषयों, खबरों, घटनाओं पर प्रतिक्रिया देने के सलेक्टिव चुनाव भी किसी सामाजिक अपराध से कम नहीं बल्कि देश-समाज की भावी पीढ़ी को एक बेहतर माहोल देने की जबाबदेही और जिम्मेदारी से पलायन है।

उत्तर प्रदेश जाति आधारित राजनीति के कोढ़ वाले इतिहास के बीच वर्तमान प्रदेश सरकार और उसके राजनैतिक नेतृत्व की यह समतामूलक दृष्टि… निश्चित ही शुभ है, ऐतिहासिक है और देश-प्रदेश-बहुसंख्यक समाज के वर्तमान-भविष्य हित में है।

“हम बदलेंगे युग बदलेगा, हम सुधरेंगे युग सुधरेगा” के पवित्र लाइनों के साथ उत्तरप्रदेश सरकार, पुलिस, प्रशासन को इस सामाजिक क्रांति में सहभागी होने पर साधुवाद।

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