कब तक ज़ीरो और दशमलव के गाने बनाकर थपथपाते रहेंगे अपनी पीठ

1970 में अभिनेता मनोज कुमार की एक फिल्म आयी थी ‘पूरब और पश्चिम’।

इस फिल्म में एक गीत के शुरूआती बोल थे कि “जब ज़ीरो दिया मेरे भारत ने, तब दुनिया को गिनती आयी’।

भारतीय बौद्धिकता को प्रदर्शित करने वाले इस पूरे गीत को सुनकर हर भारतीय का सीना कुर्ता फाड़ने लगता था।

लेकिन अगर ज़ीरो और दशमलव जैसी उपलब्धियों को अपने देश के पुरातन काल के विद्वानों की झोली में डाल दें तो आज हमारे पास दुनिया को देने के लिये कौन सा अविष्कार है?

आज़ादी के बाद के भारत को देखें तो हम पाते हैं कि इन सत्तर सालों में हमने कोई ऐसी उपलब्धि हासिल नहीं की है जो दुनिया को एक नयी दिशा देने वाली साबित हुई हो।

भारत में ऐसा कोई अविष्कार नहीं हुआ है जो दुनिया को हिलाकर रखने की ताकत रखता हो।

भारत से बाहर हुये अविष्कारों को देखें तो एक बहुत लम्बी फेहरिस्त सामने दिखने लगती है। एक छोटे से माइक्रो चिप जैसी चीज जो कि भारत से बाहर ही बनी थी, दुनिया को बदलने का दम रखती है।

आधुनिक विश्व में कम्प्यूटर से लेकर विभिन्न प्रकार के वाहन तथा यंत्र और हथियार, दुनिया के अन्य देशों में समय-समय पर विकसित किये गये। ऊर्जा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी भारत के बाहर ही ऐसे अनेक अविष्कार हुये जिन्हें मील के पत्थर के तौर पर याद किया जाता है।

पिछले सौ-दो सौ सालों की बात की जाय तो कार, बल्ब और रेडियो से लेकर आधुनिक समय के कम्प्यूटर, इंटरनेट तथा रोबोट तक के अविष्कार में भारत का कोई खास हाथ नहीं रहा है।

इस समय आपके हाथ का एंड्रायड फोन या वाइफाइ जैसे तकनीकी भी दुनिया के दूसरे हिस्से की मेहनत का नतीजा है। इस बीच भारत में कोई ऐसी खोज नहीं हुई जो दुनिया के सामने एक नयी इबारत लिखने का दम रखती हो।

ऐसा भी नहीं है कि यहाँ बौद्धिकता की कमी है या उसका ह्रास हो गया है। क्योंकि यहीं के डॉ हरगोविन्द खुराना जैसे वैज्ञानिकों ने प्रयोगशाला में न्यूक्लिक अम्लों का संश्लेषण करके जीन तथा आनुवांशकीय गुणों के अध्ययन को सुगम बना दिया। लेकिन तथ्य यह भी है कि ऐसा करते समय डॉ खुराना अमेरिकी नागरिकता ग्रहण कर चुके थे।

आज भी भारत की बहुत सारी प्रतिभाओं को अपना हुनर विदेशी विश्वविद्यालयों या शोध संस्थानों में ही दिखाने का मौका मिल रहा है। माइक्रोसॉफ्ट से लेकर नासा तक में भारतीयों की पूरी फौज मौजूद है।

ऐसे में विचारणीय प्रश्न है कि आखिर कब तक भारत का रिसर्च क्षेत्र, नयी खोजों से अछूता रहेगा? कब तक यहाँ के विश्वविद्यालय सिर्फ कागज़ की ऐसी डिग्रियां बांटते रहेंगे जिनकी कीमत रद्दी के भाव भी नहीं आती?

कब तक यहाँ के खुराना को अमेरिका जाकर शोध करना पड़ेगा? और कब तक हम ज़ीरो और दशमलव के नाम पर गाने बनाकर अपनी पीठ थपथपाते रहेंगे?

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