हरेला : पहाड़ियों की जीवटता का पर्व

“जी रया…जागि रया…आकाश जस उच्च,
धरती जस चाकव है जया…स्यावै क जस बुद्धि,
सूरज जस तराण है जौ…सिल पिसी भात खाया,
जाँठि टेकि भैर जया…दूब जस फैलि जया…”

सुदूर तमिलनाडु के जल्लिकट्टु से आप परिचित हैं पर आपसे बहुत नजदीक उत्तराखंड से शायद नहीं। आज उत्तराखंड के प्रमुख त्योहारों में से एक “हरेला” पर्व है। गंगा के विशाल मैदान नहीं हैं यहां। इसलिए उस स्तर पर खेती नहीं हो सकती पर फिर भी ये जीवटता है पहाड़ियों की जो पर्वत में भी फसल अंकुरित कर लेते हैं।

सीढ़ीनुमा खेत, पानी रोकने को बनाए गए मेढ़, लबालब पानी में बीज लगाती गाती-गुनगुनाती पहाड़ी महिलाएं। इतना मनभावन, इतना रूहानी, इतना पवित्र अहसास है यह जिसे लिखकर व्यक्त नहीं किया जा सकता। आजकल धान की रोपनी कर रहे होंगे अपने यहाँ के किसान। उस समय मिट्टी, पानी और मौसम की जो खुशबू आती है न, कुछ वैसी ही, बस थोड़ी सी प्रकृति की सुंदरता मिला दी जाए।

हमारे और पहाड़ के कैलेंडर में करीब पंद्रह दिन का फर्क होता है इसलिए सभी हिन्दू महीने यहाँ पंद्रह दिन पहले शुरू हो जाते हैं। यह सावन ऋतु का स्वागत करने वाला त्योहार है जिसमें आज से 9 दिन पहले पांच या सात तरह के अनाज (जौ, गेहूं, मक्का, गहत, सरसों, उड़द और भट्ट) को गांव या घर के मंदिर में रिंगाल कही जाने वाली एक टोकरी में रोपित किया जाता है। फिर आज जब बीज अंकुरित हो जाता है तो गृह-स्वामी इसे काट कर तिलक-चन्दन-अक्षत से अभिमंत्रित करता है, मंत्र है “रोग, शोक निवारणार्थ, प्राण रक्षक वनस्पते, इहागच्छ नमस्तेस्तु हर देव नमोस्तुते”। इसे ही हरेला कहते हैं।

फिर इसे देवता को चढ़ाया जाता है, जिसके बाद घर की सभी महिलाएं (कहीं कहीं केवल बुजुर्ग महिला) सभी सदस्यों को हरेला पूजती हैं। पूजने का मतलब कि हरेला सबसे पहले पैर, फिर घुटने, फिर कन्धे और अन्त में सिर पर रखा जाता है और हरेला पूजते समय आशीर्वाद स्वरुप ऊपर कुमाऊँनी में लिखी पंक्तियां गाई जाती हैं। ये पंक्तियां अलग-अलग जगह अलग-अलग हो सकती हैं।

ये जो हरेला लगाने का क्रम है, उससे आपको (यूपी बिहार) याद आ रहा होगा जहाँ शादी से तुरंत पहले ऐसा ही कुछ किया जाता है भावी दूल्हा-दुल्हन के साथ।

तो जी रया जागि रया….

शुरू में कुमाऊँनी में लिखी पंक्तियों का अर्थ है:-

“जीते रहो जागृत रहो। आकाश जैसी ऊँचाई, धरती जैसा विस्तार, सियार की सी बुद्धि, सूर्य जैसी शक्ति प्राप्त करो। आयु इतनी दीर्घ हो कि चावल भी सिल में पीस के खाएं और बाहर जाने को लाठी का सहारा लो, दूब की तरह फैलो (यशश्वी हों)”

जानिए एक दूसरे को।

स्वस्थ रहें, प्रसन्न रहें, महादेव सबका भला करें।

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