क्या हम सचमुच अपने देश से प्यार करते हैं?

1989 में पहली बार विदेश जाने का मौका मिला – इंजीनियरिंग करने के लिए – यूरोप के बीचोंबीच स्थित – पोलैन्ड।

रुस के अप्रत्यक्ष नियन्त्रण में फंसा पोलैन्ड पहला देश था जो उन्हीं दिनों में कम्युनिस्ट शासन से तंग आकर एक लोकतन्त्र में बदल रहा था। और 1989 में यूरोप के सबसे गरीब देशों में एक था।

दुकानों पर कोई अच्छा सामान दिखना भी मुश्किल था। खाने पीने के सामान में भी वहीं की उपज – आलू, आटा, अन्डे, टमाटर, मटर, सेब, चीनी, नाशपाती, खीरा और मांसाहार मिलता था। बाकी -सब्जी दालें न के बराबर, और कोई फल न के बराबर।

सब कुछ इतना सस्ता था कि उस समय के 20 डॉलर (कुल लगभग 400 रूपए) में हमारे खाने-पीने, ट्रान्सपोर्ट (ट्रॉम, बस में) आदि के महीने भर के खर्चे आराम से निकल जाते।

यहां यह बताना जरुरी है कि उससे तुरन्त पहले लखनऊ में रहता था और वहां सिर्फ दो समय के शाकाहारी भोजन – वैष्णव भोजनालय में – का महीने का खर्चा ही 500-600 रुपये का होता था।

सच यह है कि पोलैन्ड उस समय एक बहुत गरीब देश था। बहुत कम लोगों के पास कार होती थी – वो भी पुरानी फिएट या हमारी ‘नैनो’ जैसी Maluch (जिसका हिन्दी में मतलब हुआ – ‘छोटी’)। तब बहुत कम सैलरी होती थी।

लेकिन कुछ चीजें थीं जिनकी तारीफ करनी ही होगी। पोलैन्ड के लोग बेहद ईमानदार होते थे। साथ ही बहुत मेहनती। काम से कभी जी न चुराने वाले। और साथ ही किसी भी मेहनत के काम को छोटा न मानने वाले।

1989 से अब आइये 2008 में।

पोलैन्ड का लगभग हर शहर बाकी यूरोप की तरह चमकने लगा था। महंगी गाड़ियों की भरमार, हर कहीं शानदार घर बने दिखते थे। दुनिया भर की महंगी चीजें, हर तरह के ऐशोआराम का सामान बाज़ारों में भरा हुआ।

2008 के पोलैन्ड का लगभग हर बन्दा एक अच्छी गाड़ी में घूमता, बढ़िया रैस्टोरैन्ट में मंहगी शराब पीता शानदार ज़िन्दगी जी रहा था।

जानते हैं ऐसा क्यों हो सका?

पोलैन्ड के अधिकतर लोग अभी भी बहुत ईमानदार हैं। अभी भी वो किसी भी काम को छोटा नहीं समझते। और उन्हें अपने देश से बहुत प्यार है।

यूरोप के तमाम देशों में जाकर पोलैन्ड के लोगों ने हर तरह की मेहनत मजदूरी करी। पैसे बचाये और आकर अपने देश में लगाये।

अपने देश से प्यार की ये भावना इतनी ज़बरदस्त है कि जब सीरिया और ईराक से लाखों की संख्या में शरणार्थी यूरोप में आने लगे और लगभग शुरु से ही – यूरोप में आते ही – शरण देने वाले लोगों को ही भारी संख्या में मारने -लूटने व बलात्कार करने लगे – तो पोलैन्ड ही वह पहला देश था जिसने एक भी शरणार्थी को अपने देश में आने की अनुमति नहीं दी।

फ्रांस और जर्मनी ने बहुत दबाव डाला लेकिन पोलिश जनता ने हर शहर में इतने विरोध प्रदर्शन किये कि वहां की सरकार ने यूरोपियन यूनियन से निकाले जा सकने की धमकी के बावजूद एक भी शरणार्थी स्वीकार नहीं किया।

भारत में रोहिंग्या शरणार्थियों के विरोध में कितने प्रदर्शन हुए? क्या हम सचमुच अपने देश से प्यार करते हैं? सोचियेगा ज़रूर.

और हां

जय हिंद.

क्या होता अगर कुछ महीने और जी जाते गांधी!

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