हिन्दुओं की दुर्दशा के ज़िम्मेदार केवल ऐसे साधु-संत हैं?

आज एक मित्र के फेसबुक वॉल पर पोस्ट देखी कि ‘क्या आप मानते हैं कि हिन्दुओं की दुर्दशा के ज़िम्मेदार केवल निकम्मे साधुसंत है?’ तो लगा कि इस पर मंथन होना आवश्यक है। क्योंकि ऐसा प्रश्न क्यों मन में उभरा इसके भी कारण समझना आवश्यक है।

इसका एक कारण मेरे समझ में आता है कि मीडिया लगातार कई तथाकथित साधु, बाबा, बापू, महाराज आदि का पर्दाफाश करती रही है जिसकी वजह से साधु-संतों का मान घटता गया है।

एक समय था जब समाज में इनका सम्मान आज से कई गुना अधिक होता था। मीडिया ने कईयों को बेनकाब किया।

इसमें दिल्ली प्रेस की सरिता, सरस सलिल जैसी मैगज़ीनों की बड़ी भूमिका रही है। वैसे भी चैनल्स की भरमार होने से लोगों का पढ़ना कम हुआ है।

उसके पहले महिलाओं के लिए जो भी मैगज़ीन या अखबारों में कॉलम या सप्लिमेंट आते थे उनमें साधु संत और बाबाओं पर तथा हिन्दू मान्यताओं पर ही बहुत ही कठोर तरीके से लिखा जाता। इसके बाद चैनल्स में भी वही एजेंडा दोहराया जाने लगा।

दो दिन पहले ही गरुड़ पुराण की पीडीएफ़ खोज रहा था तो लिंक्स में एक सरिता की लिंक भी मिली। कोई पीडीएफ़ नहीं दे रही थी फिर भी सर्च में काफी ऊपर आई थी पहले ही पेज में।

उसमें गरुड़ पुराण की भरपूर निंदा थी। मुझे उस पर कोई सफाई नहीं देनी लेकिन अगर सामाजिक ज़िम्मेदारी से काम करना है तो इन्हें समाज की मानसिकता का भान जरूरी है कि उन्होने केवल हिंदुओं के साधु संत, तथा केवल हिंदुओं की रीतियों का ही भंडाफोड़ किया है, मज़ाक उड़ाया है। साथ साथ यह भी खयाल रखते कि श्रद्धा कहें या अंधश्रद्धा, हर समाज की यह मानसिक ज़रूरत है जो हर धर्म को ज़िंदा रखती है।

किसी भी समय समाज का एक बड़ा हिस्सा संकटों से गुज़रता है। ऐसा नहीं होता कि कोई संगठित तबका कष्ट सहे, सहता तो व्यक्ति और उसका संबन्धित परिवार ही है, लेकिन ऐसों की संख्या काफी बड़ी होती है जो ईश्वर या किसी साधु संत के पास इसका दैवीय समाधान ढूंढती है।

समाधान होता है, या महज placebo होता है या निरा छल होता है उसके साथ, इस पर मुझे विवाद में नहीं पड़ना। मुझे बस इतना कहना है कि समाज की यह गरज होती है और हमेशा रहेगी। अगर हिन्दू धर्म से उसका विश्वास हट गया या ऐसे तरीकों से हटाया गया तो उसका समाधान अन्यत्र खोजा जाएगा।

जिनको मीडिया ने हिन्दू धर्म से विमुख किया है, वे और कहीं जाएंगे। ऐसा नहीं कि मीडिया वाले इस बात को नहीं समझते, बस कोई इनसे यह बात बुलवा नहीं सकता तो लगे रहते हैं।

लेकिन ईसाई और मुस्लिम पर लिखा नहीं जाता था। इस्लाम और ईसाइयत पर मीडिया का यह आज तक मुंह बंद रखना हमारे लिए अधिक घातक साबित हुआ है। हमारा नुकसान करने वाले केवल बदमाश बाबा लोग नहीं।

समाज में यह समाधान की भूख रहती है और हमेशा रहेगी, और यह भूख दुकान ढूंढती है सो वह भूखी भीड़ मज़ार और चंगाई सभाओं में जाने लगी – क्योंकि मीडिया ने अब तक उन्हें एक्सपोज़ नहीं किया था।

और चूंकि मीडिया ने इन पर कभी नहीं लिखा, न ही सीरियलों में कभी इनके कारनामे दिखाये गए। ज़ेवियर और टेरेसा जैसे लोगों को सेंट-वाया गया और ज़ेवियर के शुष्क शॉ को चमत्कारी बताया गया, उसमें सवाल पूछने को किसी मीडिया वाले या सायंटिफिक टेम्परामेंट वाले की जीभ या लेखनी नहीं उठी।

मौलवी, खादिम आदि के कांड छुपे रहे। इतना बड़ा बलात्कार स्कैंडल होकर भी अजमेर शराफत ओढ़े रहा। वैसे इन कथित संतों और पीरों की असलियत से भी हिन्दू अंजान ही रखा गया और समस्याओं से पीड़ित भेड़ भीड़ को मज़ार और चर्चों तक channelize किया गया।

उसमें किसी को कोई सामाजिक नुकसान दिखा नहीं और न किसी को कोई अंधश्रद्धा। पादरियों के वासना कांड बेचारा येशु असहायता से देखता रहा, उसके हाथ-पाँव कील से जो जकड़े गए थे क्रॉस से। पता नहीं उसने कहा कि नहीं कि हे आकाशस्थ पिता इनको इनके पापों की क्षमा कर, वे क्या कर रहे हैं वे नहीं जानते। God only knows!

बस, मुझे इतना ही कहना था। किसी का कोई समर्थन नहीं कर रहा हूँ। लेकिन हिन्दू धर्म की आज की दुर्दशा के लिए केवल साधु-संतों को ही ज़िम्मेदार मानना सही नहीं लगता। अन्य factors का भी संज्ञान लेना आवश्यक है।

मीडिया ने जो हेतुत: किया उसके लिए हम उसे बरी करें तो बड़ी भूल कर रहे हैं। समाजशास्त्र से अंजान नहीं होते मीडियावाले, और अपने लिखने बोलने का क्या परिणाम होता है उन्हें पता होता है। हिंदुओं का उन्होंने जो नुकसान किया है उसकी ज़िम्मेदारी को वे झटक नहीं सकते।

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