जौहर (अल्पसंख्यक) विश्वविद्यालय : हर मोमिन ने अदा किया मोमिन होने का फ़र्ज़

2006 में मुलायम सिंह मुख्यमंत्री थे। मग़र उप्र के बेताज बादशाह थे मो. आज़म खान।

सत्ता… शौहरत और दौलत आज़म खान के कदमों को चूमती थी। नगर विकास मंत्रालय उनका पसंदीदा मंत्रालय रहा है।

क्योंकि सभी निकाय, नगर पालिकाएं, नगर महापालिका, पूरा विकास फंड, भूमियों का आवंटन, सरकारी कॉलोनियां काटना, ज़मीन अधिग्रहण इसी मंत्री के आधीन होता है।

सो जितनी बार आज़म खान मंत्री रहे… नगर विकास मंत्रालय के साथ वक्फ मंत्रालय जैसा दुधारू मंत्रालय भी इन्ही के अंगूठे के नीचे रहा।

वैसे जानने वाले जानते हैं कि ट्रेड यूनियन नेता के रूप में अपना करियर शुरू करने वाले आज़म खान, रिक्शा-तांगा यूनियन के अध्यक्ष भी रहे थे।

फिर समाजवादी जनता पार्टी ज्वायन हुई… भारत माता को डायन की पदवी से भी नवाज़ा… कहते हैं, अयोध्या में गोली चालन के सलाहकार भी रहे थे मंत्री जी।

‘मुयायम सिंह’… रूठे हुए अपने मंत्री जी को महीने में 2 बार मनाते ज़रूर थे। जब मंत्री जी रूठते थे, तो मनाने के लिए मुलायमसिंह एक वर मांगने के लिए कहते थे।

ऐसे ही कमज़ोर क्षणों में आज़म खान ने मौलाना जौहर यूनिवर्सिटी मांग ली। मुलायम सिंह ने शायद 100 एकड़ जमीन के साथ जौहर यूनिवर्सिटी को तथास्तु कह दिया।

यह ज़मीन 1300 एकड़ कैसे हो गई?

अखबार कहता है कि सिर्फ लोक निर्माण विभाग ने 2100 करोड़ के कार्य कराए हैं इस निजी अल्पसंख्यक यूनिवर्सिटी में।

यूनिवर्सिटी बाउंड्री में शत्रु संपत्ति, एक स्कूल, एक स्टेडियम, झील, सरकारी गेस्ट हाउस, कोसी नदी का डूब क्षेत्र कैसे आ गया… यह सब तो अल्लाह जानता होगा या मुलायम सिंह।

क्योंकि आज़म खान साहब तो मासूम हैं… खुद ही आजीवन चांसलर बन गए… प्रो-वाइस चांसलर हैं उनकी राज्यसभा सदस्या बेगम श्रीमती तंज़ीन फातमा।

मग़र 2006 में समाजवादी शासन में यूनिवर्सिटी तो बन गई, मग़र स्टेट यूनिवर्सिटी होने के नाते सरकारी कायदे-कानून-नियुक्तियां, स्कॉलरशिप और फंडों पर सरकारी शिकंजा था।

यदि यूनिवर्सिटी अल्पसंख्यक घोषित हो जाती तो सरकारी बन्धन खत्म… कोई नियंत्रण नहीं… भई… हमेशा समाजवादी सरकार ही तो नहीं रहने वाली थी।

अल्पसंख्यक यूनिवर्सिटी का बिल विधानसभा ने पास कर राज्यपाल के पास भेज दिया। मग़र राज्यपाल ने कहा कि यह कार्यक्षेत्र राष्ट्रपति का है… और अनेक आपत्तियां लगाकर बिल वापस कर दिया।

2007 में बसपा सत्ता में आ गई। कुछ दिन बाद नए राज्यपाल ने भी बिल पर साइन करने से मना कर दिया। 2012 में सपा फिर सत्ता में आ गई मग़र मामला ढाक के तीन पात ही रहा क्योकि आपत्तियां हटी नहीं।

तत्कालीन राज्यपाल का मानना था कि अल्पसंख्यक यूनिवर्सिटी की अनुमति देना, राष्ट्रपति का काम है। हालांकि यूजीसी से अनुमति प्राप्त थी इस स्टेट यूनिवर्सिटी को… मग़र UGC की अनुमति और अल्पसंख्यक यूनिवर्सिटी की अनुमति में कोई संबंध नही है।

बिल्ली के भाग से छींका टूट गया, उत्तर प्रदेश के राज्यपाल को बीजेपी की नई सरकार ने हटा दिया और उत्तराखंड के राज्यपाल श्री अज़ीज़ कुरैशी, जोकि कांग्रेस द्वारा नियुक्त थे, उन्हें सिर्फ 15 दिन के लिए यूपी का कार्यभार दिया गया।

वे भी आज़म खान की तरह अलीगढ़ यूनिवर्सिटी के छात्र रहे थे। उन्होंने तुरंत यूपी सरकार के एडवोकेट जनरल को बुलाया… जो शायद जफरयाब जिलानी थे।

उन्होंने तुरंत अज़ीज़ कुरैशी को राय दी कि चूंकि UGC से अनुमति प्राप्त यूनिवर्सिटी है, अतः जौहर यूनिवर्सिटी को अल्पसंख्यक यूनिवर्सिटी की अनुमति दी जा सकती है।

अज़ीज़ कुरैशी ने तुरंत बिल पर साइन कर जौहर यूनिवर्सिटी को अल्पसंख्यक यूनिवर्सिटी घोषित करने की अनुमति दे दी।

मौलाना जौहर यूनिवर्सिटी के अल्पसंख्यक घोषित होते ही… यूनिवर्सिटी की हर गतिविधि, फंड, अनुदान, नियुक्तियों पर मंत्री जी का नियंत्रण हो गया… प्रत्येक मोमिन ने मोमिन होने का फ़र्ज़ अदा कर दिया।

शेष फिर…

मुझे और मुझ जैसों को, हिंदुओं ने हमेशा दिया धोखा और रुसवाई

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