गति और ठहराव का संजीदा साधक : मदन मोहन

आज मरहूम संगीतकार मदन मोहन साहब को गुज़रे 43 बरस पूरे हो गए। उनके जीवन और सृजन से पहले उनकी मृत्‍यु पर बात कर लेना ज़रूरी है, क्‍योंकि वे ऐसे फनकारों की जमात में गिने जाते हैं जिनका काम जीते जी तो दुनिया ने देखा ही, मरने के बाद भी रोशनी में आया।

नई पीढ़ी के जिन लोगों को वास्‍तविक मदन मोहन प्रभाव का पता नहीं है, वे मदन मोहन को 2004 में आई फिल्‍म “वीर ज़ारा” के संगीत के कारण ही जानते हैं जिसमें उनकी धुनों का मरणोपरांत उपयोग किया गया था और जब इस फिल्‍म के गीत उस दौर में लोगों के मोबाइल की रिंगटोन बन रहे थे तब मदन साहब को गु़जरे 29 साल हो चुके थे।

यह केवल संयोग की ही बात हो सकती है कि यह फिल्‍म भी एकदम लीक से हटकर थी क्‍योंकि इसमें मोहब्‍बत को जिस्‍मानियत के मुलम्‍मे से उतारकर रूहानी फलसफ़े के दायरे में लाकर खड़ा किया गया था। यह चौंकाने वाली बात थी, क्‍योंकि भौतिकवाद के इस शिखर काल में पुरुष और स्‍त्री के संबंध केवल भावनाओं और आत्‍मा के ही स्‍तर पर कैसे बने रह सकते हैं, इस विचार को उपभोगवादी समाज पचा ही नहीं पाया।

जितनी संजीदा यह फिल्‍म थी उतनी ही संजीदगी मदन मोहन के कृतित्‍व का ताउम्र स्‍थायी भाव रहा। 1975 में जब उनकी मौत हुई तब उन्‍हें फिल्‍म जगत में आए पच्‍चीस बरस हो चुके थे और इस दरमियान उन्‍होंने केवल 81 फिल्‍मों में संगीत दिया। इसका अर्थ ये नहीं है कि वे सिलेक्टिव थे या कम काम करते थे बल्कि सच्‍चाई तो यह है कि उन्‍हें काम कम मिलता था।

बाद के वर्षों में तो उन्‍हें काम मिलना बहुत कम होता गया। देव आनंद की फिल्‍म “शराबी” मदन साहब के करियर में मील का पत्‍थर कही जा सकती है। इस फिल्‍म में मोहम्‍मद रफ़ी ने जहां गायन विधा के शिखर को छू लिया, वहीं गीतकार राजिंदर किशन और मदन मोहन ने क्रमश: अप्रतिम गीत-संगीत का सृजन करके हिंदी सिने संगीत की झोली को अनमोल ख़ज़ानों से भर दिया।

देव आनंद के शराबी किरदार का गीत है, “सावन के महीने में, इक आग सी सीने में, लगती है तो पी लेता हूं, दो चार घड़ी जी लेता हूं” यह गीत इतना प्रगाढ़ व सघन है कि इसे सुनने के बाद नशे के प्रभाव से मुक्‍त होने की चेष्‍टा करना कठिन मालूम पड़ता है। अपने आप से लड़ने की जो जद्दोजहद आदमी करता है, वह इसके पुर्जे-पुर्जे से जाहिर होती है।

इसी फिल्‍म का गीत, “कभी न कभी, कहीं न कहीं, कोई न कोई तो आएगा” अकेलेपन और अंतहीन प्रतीक्षा का मानो आर्तनाद है। एक यशोगान। जिसे डिवाइन सागा कहें तो ठीक रहेगा। मदन साहब ने इन दो गीतों में शराब को मस्‍ती के रूपक से बाहर निकालकर बेचैनी और बेकली के रूप में स्‍थापित किया।

अकेलेपन के खूंखार पंजों से बचता एक किरदार अपने दुख की कहानी कहते हुए भी इस आशावाद को बनाए रखता है कि, “कभी न कभी, कोई न कोई तो आएगा”, और इस विचार को पूरी परिपक्‍वता के साथ सुरबद्ध करते ही मदन मोहन संगीत की विधा को एक सोपान और ऊपर ले जाते हैं।

शराब, नैराश्‍य, अकेलेपन और संजीदगी के प्‍लॉट पर इतना आला दर्जे का संगीत रचने वाले मदन मोहन के शायद अवचेतन में ये भाव गहरे पैठे रहे होंगे, जो बाद के बरसों में सामने आए। उनकी मौत लीवर सिरोसिस से हुई थी जो कि बेहद शराबनोशी के चलते होने वाली बीमारी है। संगीत में माधुर्य का संतुलन बनाए रखने के बावजूद उन्‍हें समकालीन संगीतकारों की तुलना में कम काम मिला और उनकी सृजनात्‍मक ऊर्जा विध्‍ंवसकारी ऊर्जा में तब्‍दील होने लगी।

ग़म ग़लत करने के लिए उन्‍होंने खुद को शराब में डुबोना शुरू कर दिया और कुछ सृजन न कर पाने का बदला इस फनकार ने स्‍वयं को खत्‍म करके लिया। यह आत्‍म-प्रतिशोध था। असल में, हर जीनियस आत्‍मघाती होता है। सृजन के क्षणों में भी और उसके बाद भी। फिर, मदन मोहन जैसा बिरला आदमी अपवाद कैसे हो सकता है।

इराक के बगदाद में एक कुर्दीश परिवार में जन्‍मे मदन मोहन का जीवन सैन्‍य सेवाओं के अनिश्चित क्षेत्र में गुजर सकता था लेकिन परिवार हिंदुस्‍तान आया तो किस्‍मत उन्‍हें मुम्बई भी ले आई। गायन और संगीत से वास्‍ता रखने वाली मां से विरासत में मिली संवेदनशीलता को मदन ने मौ़का मिलने ही संगीत की धुनों में रूपांतरित करना शुरू किया और बाद के वर्षों में अपनी मौलिक शैली से वह जगह बनाई जिस पर किसी भी प्रकार का अतिक्रमण इसलिए संभव नहीं है क्‍योंकि उसमें भी प्रतिभा की दरकार होती है।

मदन मोहन को हम महज संगीतकार ही निरुपित करके उनके जिक्र से मुक्‍त नहीं हो सकते। वे गति और ठहराव को साधने वाले साधक थे। जितना संगीत उनके भीतर कूट-कूटकर भरा था, उतना ही फूट-फूटकर निकला भी। हम कोई भी फे़हरिस्‍त उठाकर देखें, जितनी भी बंदिशें अमर मानी जाती हैं, उनमें मदन मोहन द्वारा कंपोज की बंदिशें नुमाया ही होती हैं। आमतौर पर हिंदी सिनेमा में कलाकार एक छबि से बंधे हुए होते हैं। टाइप्‍ड।

यदि राहुल देव बर्मन की छवि पाश्‍चात्‍य संगीत के प्रभाव वाली बनी हुई है तो नौशाद की शास्‍त्रीयता की। हालांकि ये संगीतकार वर्सेटाइल थे लेकिन इनका अधिकतम ही इनका सर्वस्‍व बन गया। मदन मोहन के साथ मामला दूसरा है। उन्‍हें हम किसी एक तय परिभाषा में कैद नहीं कर सकते। उन्‍होंने हर गायक से उसकी सीमा से बाहर जाकर गवाया।

उन्‍होंने हर गायक से उसका सर्वश्रेष्‍ठ निकलवाया। “शराबी” का ही गीत, “मुझे ले चलो” मोहम्‍मद रफी के गाए श्रेष्‍ठ गीतों में एक तो है ही, इसे सिने संगीत के इतिहास में भी सर्वश्रेष्‍ठ गाए गीतों में शुमार किया जाता है। मदन मोहन के ज़ेहन में मौसिक़ी कब क्‍या ख्‍याल ले लेगी यह कहा नहीं जा सकता था। बिना पार्श्‍व संगीत के गीत उतने ही प्रभावशाली हैं जितने कि संगीत से भरे हुए। फिल्‍म “जहां आरा” के युगल गीत “ऐ सनम आज ये कसम खाएं” को कौन भूल सकता है जिसका कि आरंभ ही इतना लंबा है कि यह गीत दो भागों में विभक्‍त मालूम होता है। पहला हिस्‍सा केवल संगीत के टुकड़े का और दूसरा वोकल का।

4.40 मिनट अवधि के इस लता-तलत युगल गीत की धुन को वर्षों तक विविध भारती के कार्यक्रम “मनभावन” की पहचान के रूप में इस्‍तेमाल किया गया। इस धुन से ही कार्यक्रम की शुरुआत होती थी, यह एक प्रकार से सिग्‍नेचर ट्यून बन गई थी। टाइटल ट्रैक। आकाशवाणी के लंबे इतिहास में आज तक किसी गीत के म्‍यूजिकल पीस का इस तरह इस्‍तेमाल नहीं किया गया कि वह उसका पूरक ही बन जाए। या यू कहें कि उन्‍हें इसका उपयोग करना ही पड़ा क्‍योंकि इतना वैविध्‍यवान आकेस्‍ट्रा फिल्‍म जगत के किसी और गीत में मिलता ही नहीं जो लंबा भी हो और ऊबाऊ भी न हो।

मधुरता का कमाल मदन साहब ही रच सकते थे, बावजूद उनका केंद्रीय भाव इससे इतर ही था। वे गति और ठहराव को इस प्रकार अन्योन्याश्रित कर देने का माद्दा रखते थे कि एक नया ही तल निर्मित हो जाता था। मेरी बात का यकीं ना आए तो “हंसते ज़ख्‍म” का “तुम जो मिल गए हो” सुनिये और खै़र मनाइये। गति और ठहराव के अद्भुत ताने-बाने के इस सृजन जैसा दूसरा उदाहरण खोजना मुश्किल है। गीत दो भागों में बंटा है। पहले में धीमा, दूसरे में तेज।

धीमा हिस्‍सा सुनें तो लगता है यह कोई ग़ज़ल है जो मद्धम ही चलेगी लेकिन अचानक ट्रांसफार्मेशन होता है और आकेस्‍ट्रा किसी स्‍टेशन से छूटी ट्रेन की भांति गति पकड़ता है तो लगता है यह तो चपलता की म्‍यूजिकल ट्रीट है। स्‍लो है तो लगता है ग़ज़लों की महफिल में हैं, फास्‍ट होने पर लगता है किसी पार्टी में आ गए। दृश्‍यांकन से ऐसा गजब का साम्‍य कि जहां गीत के दृश्‍य में सूखे मौसम के बाद अचानक बारिश शुरू हो जाती है, वहीं गीत में ड्रम भी बारिश की बूंदों की मानिंद ही बरसते हैं। गायकों ने भी कमाल किया है। रफ्री और लता ने इतनी इंटेंसिटी से गाया है कि वे ही नायक-नायिका मालूम पड़ते हैं। “जहां आरा” में लता ने एक कमाल का मुजरा गाया है। “वो चुप रहें तो मेरे दिल के दाग़ जलते हैं” इससे मेरा निजी अनुराग जुड़ा है।

बचपन में दर्जनों बार रिवर्स करके सुनने पर भी इस गीत से मन नहीं भरता था और बाकी क़सर इसी फिल्‍म से रफ़ी की ग़ज़ल “किसी की याद में” पूरा कर देती थी जिसे एक ही वक्‍त में बीसियों दफ़े सुनकर भी तसल्‍ली न मिलती। मदन साहब के संगीत को अगर हम कोई मुमकिन तश्‍बी दे सकें तो इतना ही कहेंगे कि जो पूरी तरह पाश में बांधकर रख दे वह संगीत मदन मोहन का हो सकता है। लता के एवरेज वोकल टेंपरामेंट से उन्‍होंने कई बेमिसाल नगमें निकलवाए और वह मुक़ाम भी आया जहां मदन को बंदिशों का बादशाह तो लता को बंदिशों की बेगम तक कहा गया।

व्‍यवसायिक फिल्‍में होने के बावजूद मदन अपने संगीत को रूहानी शक्‍ल ही बख्‍श्‍ते, वे उसे रूहानी तबीयत का ही बनाए रखते। “मेरा साया” “हीर, रांझा” के गीत गजब की इंपेथी या समानुभूति लिए मालूम पड़ते हैं। सिने संसार में खेमेबाजी सदा से रही लेकिन सृजन के प्रति संजीदा मदन मोहन इन बातों से परे रहे, इसीलिए उनके स्‍टूडियो में तलत भी दिखाई दिए, रफी भी। जितनी लता नज़र आई उतनी आशा भी। यहां तक कि लता के समकक्ष ही उन्‍होंने सुमन कल्‍याणपुर से रफी के साथ मशहूर दोगाना “बाद मुद्दत के ये रात आई” गवाया तो यह मुख्‍यधारा के प्रति एक प्रकार की बगा़वत ही थी। लता जैसी आवाज वाली सुमन को लता के ही समानांतर स्‍थापित करना, बावजूद खटपट न होने देना, मदन के बूते की बात थी।

गायन की विधा में एकल और युगल गायन ऐसी धारा है जिसमें समान रूप से निष्‍णात नहीं हुआ जा सकता। मदन मोहन ने दोनों धाराओं में न केवल मधुरतम गीत पैदा किए बल्कि बाज़ार की ज़रूरतों के मुताबिक़ उन्‍हें कर्णप्रिय से लोकप्रिय भी बनाया। उन्‍हें शैली के मापदंडों के आधार पर नहीं आंका जा सकता बावजूद उनकी छबि ग़ज़ल और बंदिश की बन गई। फिल्‍म “अनपढ़” के जिन दो गीतों “है इसी में प्‍यार की आबरू” और “आपकी नज़रों ने समझा” के बाबत नौशाद साहब का मशहूर बयान था कि, “मेरा सारा संगीत ले लें और बदले में ये दो गीत दे दिएं” मेरे नज़रिये में दाद भरा जरूर है बावजूद संगत नहीं।

मदन मोहन की लीगेसी, उनकी विरासत इतनी समृद्ध है कि उसके लिए दो गीतों का आंकड़ा गणनीय ही नहीं है। गीत को धीमी शुरुआत देकर उसे तेज गति में ले जाना उनकी शैली रही। रफ़ी का गाया “रंग और नूर की बारात किसे पेश करूं” इसकी बेजोड़ मिसाल है। अपने आकेस्‍ट्रा में संतूर को बेहद पसंद करने वाला यह संगीतकार शास्‍त्रीय संगीत का प्रयोग करता तो इसी परंपरा का अनुगामी मालूम पड़ता लेकिन पाश्‍चात्‍य को हाथ में लेता तो कदम थिरकने पर मजबूर देता।

असल में, मदन मोहन जैसे लोग सृजनशीलता का ऐसा लबालब तालाब हुआ करते हैं जो बने तो प्‍यास बुझाने के लिए ही हैं लेकिन यदि इससे वंचित हो जाएं तो आत्‍मघात के क्षणों में वे स्‍वयं को पीकर नष्‍ट भी कर देते हैं। राजिंदर किशन ने “शराबी” के गीत में अंतरा लिखा था – “लंबे जीवन से अच्‍छा वो इक पल जो अपना हो, उस पल के बाद ये दुनिया क्‍या गम है अगर सपना हो”।

इस पर तर्ज बनाते-बनाते मदन मोहन कब इसे अपनी प्रेरणा बना ले गए, पता न चला। ज़माने ने उन्‍हें सृजन से वंचित किया वे खुद को मिटाने की राह पर चल पड़े। लंबे जीवन के बनिस्‍बत वे “अपना इक पल” अपनी आगोश में लेकर चले गए और हमें धुनों का अनमोल ख़जा़ना कभी न खत्‍म होने वाले ऐसे जलस्‍त्रोत की तरह दे गए जो बरसों बरस हमारी प्‍यास बुझाता रहेगा और कभी सूखेगा नहीं।

– नवोदित सक्‍तावत

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