‘पूर्वांचल एक्सप्रेस वे’ पर पकड़ा गया समाजवादी झूठ

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 14 जुलाई को आजमगढ़ के मंदुरी हवाई अड्डे पर देश के सबसे बड़े ‘पूर्वांचल एक्सप्रेस वे’ का शिलान्यास करेंगे।

जब से इस कार्यक्रम की घोषणा हुई है तब से अखिलेश यादव समेत समूचे समाजवादी पार्टी खेमे में एक अजीब सी खलबली मची हुई है।

अखिलेश यादव लगातार बयान देकर तथा ट्वीट करके इसे अपने खाते में जोड़ रहे हैं तो बलिया से राज्यसभा सांसद नीरज शेखर इनसे भी आगे जाते हुये बजट कम होने का फार्मूला तक बताते फिर रहे हैं।

कल गाजीपुर के समता भवन में नीरज शेखर की अध्यक्षता में सपाईयों की एक बैठक हुई जिसमें इस शिलान्यास कार्यक्रम के विरोध करने का फैसला किया गया।

वैसे तो राजनीति में प्रतिपक्ष का काम ही विरोध करना होता है लिहाजा यह बात उतनी महत्वपूर्ण नहीं है। लेकिन मेरे लिये यह जरुर महत्वपूर्ण है कि नीरज शेखर जैसे व्यक्ति जिन्हें अब तक मैं ईमानदार और सच बोलने वाले राजनेता के तौर पर गिनता था, वह भी राजनीति के लिये इस तरह के सफेद झूठ बोल सकते हैं।

दरअसल नीरज शेखर ने कहा कि “तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने लखनऊ से बलिया के माझीघाट तक समाजवादी पूर्वांचल एक्सप्रेस-वे की परियोजना को मंजूरी दी थी। शिलान्यास का काम पूरा होने के साथ ही 50 फीसद किसानों को मुआवजा भी दे दिया गया था। मौजूदा सरकार जिस बजट के कम होने की बात कह रही है वह इसलिये हुआ क्योंकि इसे बलिया से घटाकर गाजीपुर तक ही बनाया जा रहा है।”

जहां तक मुझे याद है विधानसभा चुनावों से कुछ दिन पहले जब अखिलेश यादव को ताबड़तोड़ शिलान्यास करने का भूत सवार हुआ था तो उसी क्रम में 22 दिसंबर 2016 को एक शिलापट्ट लगाकर शिलान्यास का कोरम पूरा किया गया था।

यह काम वैसा ही था जैसे कोई आज चांद तक रेलगाड़ी चलाने की परियोजना का शिलान्यास कर दे। मतलब न तो उसके लिये बजट का प्रावधान हुआ था और न ही भूमि अधिग्रहण ही शुरू हो पाया था।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि जिसे मैं सच्चा और ईमानदार समझता था वह नीरज शेखर भी उस कार्यक्रम में उपस्थित थे। रिमोट के माध्यम से जिस शिलापट्ट पर से परदा हटाया गया उस पर लिखा था ‘लखनऊ से गाजीपुर तक बनने वाला समाजवादी पूर्वांचल एक्सप्रेस वे’!

फिर कल किस आधार पर इसे बलिया के माझीघाट तक बनाने की बात बताई जा रही थी? क्या यह सफेद झूठ सिर्फ इसलिये बोला जा रहा था कि बलिया की जनता भ्रमित होकर इसका विरोध करे?

अब जब तथ्य सामने हैं तो स्पष्ट है कि अखिलेश यादव ने जिस शिलापट्ट का अनावरण किया था, उतनी ही दूरी तक एक्सप्रेस वे बन रहा है।

दोबारा शिलान्यास होने की बात के लिये पहले वाले शिलान्यास की सच्चाई भी समझनी होगी। कायदे से किसी प्रोजेक्ट के शिलान्यास का मतलब होता है कि धरातल पर काम की शुरुआत की जाय।

एक्सप्रेस वे जैसे प्रोजेक्ट में टेंडर से पहले 90% भूमि अधिग्रहण होना आवश्यक शर्त होती है। भूमि अधिग्रहण के लिये आवश्यक है कि प्रोजेक्ट के लिये बजट का आवंटन हो चुका हो।

क्या कोई समाजवादी यह बताने की कोशिश करेगा कि ‘समाजवादी पूर्वांचल एक्सप्रेस वे’ के लिये अखिलेश यादव ने कितने बजट का आवंटन किया था? कितनी भूमि का अधिग्रहण तब तक हुआ था? टेंडर की क्या स्थिति थी? फिर चांद पर रेल लाइन बिछाने की योजना के शिलान्यास का क्या मतलब? क्या सिर्फ एक शिलापट्ट पर से परदा हटा देने भर से कोई प्रोजेक्ट पूरा हो जाता है?

बाकी नीरज शेखर जी को विरोध करना है, जम कर करें। लेकिन विरोध के लिये झूठे तथ्यों का सहारा लेना खुद उनकी छवि को ही धूमिल करेगा।

अब तक मैं उनमें एक घाघ राजनेता का कोई भी गुण नहीं पाता था, लेकिन कल समता भवन के उनके वक्तव्य ने सिद्ध कर दिया कि वह भी नयी परिपाटी के अनुसार अब पक्के समाजवादी बन चुके हैं। फिर छल,फरेब, और झूठ से इतर उनसे कुछ भी उम्मीद करनी बेमानी है।

क्या पूछेंगे नहीं लोकतंत्र के चौथे खंभे से पहला सवाल!

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