मौजूदा सामरिक हालात में भारत की ज़रूरत है एक मज़बूत सरकार और प्रभावशाली नेतृत्व

मैं कूटनीति या डिप्लोमेसी पर लिखने से बचता रहा हूँ क्योंकि यह मेरे कार्य क्षेत्र से सम्बंधित है।

फिर भी, यह तो लिख ही सकता हूँ कि विश्व कूटनीति में काफी उथल-पथल है; राजनयिकों और विशेषज्ञों के सारे पूर्वानुमान और विश्लेषण गलत निकल रहे है। एक तरह से भ्रम की स्थिति बनी हुई है।

लेकिन वर्तमान स्थिति को समझने के लिए यह जानना आवश्यक है कि पिछली शताब्दी में कूटनीति की नींव क्या थी और कौन से मापदंड उसे प्रेडिक्टेबल या पूर्वानुमानित विश्लेषण के अनुसार चलाते थे।

दो विश्व युद्धों ने पिछली शताब्दी की कूटनीति पर गहरा प्रभाव छोड़ा था। एक तरह से विश्व युद्ध कहना गलत है। दोनों युद्ध मुख्य रूप से यूरोपीय देशों के मध्य थे।

यूरोप की कॉलोनी होने के कारण एशिया और अफ्रीकी देशों की सेनाएं भी इन यूरोपीय देशों की तरफ से बेगाने युद्ध में सम्मिलित हो गयी थीं. कुल मिलाकर कम से कम 5 करोड़ लोग इन दो युद्धों में मारे गए थे, कई शहर बर्बाद हो गए थे.

युद्ध की इस विभीषिका से बचने के लिए द्वितीय विश्व युद्ध में विजयी हुए देशों ने भू-मंडलीय शांति, सुरक्षा और विकास के लिए संयुक्त राष्ट्र बनाया; निर्धन देशों के विकास के लिए वर्ल्ड बैंक, वित्तीय स्थिरता के लिए IMF, अमेरिका और पश्चिमी यूरोप के देशो की सैन्य सुरक्षा के लिए नैटो (सोवियत यूनियन ने वॉरसॉ पैक्ट बनाया था), और पश्चिमी यूरोप के आर्थिक विकास के लिए यूरोपियन यूनियन।

चूंकि विश्व युद्ध के बाद अमेरिका और पश्चिमी यूरोप ने त्वरित आर्थिक और सैन्य विकास कर लिया था, जिसमें उन्हें एशिया और अफ्रीका में अपने उपनिवेशों से मदद मिली थी, उन्होंने अपने देशों में व्याप्त धर्म और संस्कृति के अनुसार बाकी देशों के ऊपर व्यक्ति को केंद्र में रखकर मानवाधिकार लाद दिए और उन पश्चिमी प्रभुत्व वाले मानवाधिकारों की आड़ में विकासशील देशो के लोकतंत्र और आर्थिक विकास में बाधा डाली.

चूंकि अधिकतर औपनिवेशिक देशों के अभिजात्य वर्ग अंग्रेजी और फ्रेंच को जानते थे, और इस वर्ग का शासन और मीडिया पर एकाधिकार था, पश्चिमी देशों ने इन भाषाओं के प्रभावी मीडिया और अभिजात्य वर्ग के द्वारा पब्लिक ओपिनियन और विचारधारा को कन्ट्रोल किया.

इसके अलावा, संयुक्त राष्ट्र सुक्षा परिषद् में पांच स्थाई सदस्यों में से चार पश्चिमी जगत से हैं. इस वर्ष और अगले वर्ष अकेले यूरोपियन यूनियन से पांच सदस्य सुरक्षा परिषद में है. यूरोप से छटा सदस्य रूस है. एशिया जैसे विशाल महाद्वीप से चीन के अलावा इस वर्ष केवल कुवैत और कजाखस्तान सदस्य हैं और अगले वर्ष कुवैत की जगह इंडोनेशिया ले लेगा.

विश्व के टॉप टेन समृद्ध देशों में सब के सब (जापान को छोड़कर) पश्चिम के थे. विश्व व्यापार में इनका प्रभुत्व था, डॉलर का दबदबा था और विश्व में किसी भी करेंसी का आदान-प्रदान पश्चिम के नियंत्रण में था.

अतः पिछली शताब्दी के अंत तक पश्चिमी देशों ने अपने हितों के साधन के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (जिसके चार वीटो पावर वाले सदस्य पश्चिम से है), वर्ल्ड बैंक (जिसका प्रेसिडेंट सिर्फ अमरीकी हो सकता है), IMF (जिसका मुखिया सिर्फ फ़्रांसिसी हो सकता है), यूरोपियन यूनियन, मानवाधिकारों, वित्तीय और सैन्य शक्ति, तथा विकासशील देशों के पश्चिम में पढ़े अभिजात्य वर्ग के द्वारा कूटनीति पर कन्ट्रोल किया और अपनी मनमानी की.

लेकिन इस शताब्दी में हवा की दिशा परिवर्तित हो गयी. इसमें सबसे बड़ा योगदान डिजिटल तकनीकी का है जिसने विचारों पर अभिजात्य वर्ग और उनके मीडिया का एकाधिकार तोड़ दिया.

द्वितीय, चीन विश्व की दूसरी सबसे बड़ी आर्थिक और सैन्य शक्ति के रूप में उभरा है जिसने पश्चिमी देशों की नींव हिला दी है. इसका एक कारण यह भी है कि चीन ने पश्चिम के द्वारा प्रचारित लोकतंत्र और मानवाधिकारों को अस्वीकार कर दिया है.

तृतीय, यूरोप के चारों तरफ असुरक्षा का माहौल है. एक बार आप यूरोप का नक्शा उठाकर देखिए और जॉर्जिया, यूक्रेन, अर्मेनिया, अजरबेजान, टर्की, सीरिया, लेबनान, मध्य पूर्व, लीबिया इत्यादि में व्याप्त परिस्थितियों पर ध्यान दीजिए.

इस अस्थिरता के कारण लाखों लोग यूरोप की तरफ पलायन कर रहे हैं और कई लोगों ने हाल ही के वर्षों के आतंकवादी गतिविधियों से यूरोप को हिला दिया. यूरोपियन यूनियन में घमासान मचा हुआ है.

पश्चिमी यूरोप के कई देशों में लोकतंत्र का हनन हुआ है. जब पश्चिमी यूरोप पर आतंकवाद, रिफ्यूजी तथा आर्थिक संकट आया, तब उन्होंने अपने सारे मानवाधिकारों के सिद्धांतों को किनारे कर दिया.

चतुर्थ, राष्ट्रपति ट्रंप ने यूरोप की गतिविधियों और कार्यवाहियों पर प्रश्नचिह्न लगाना शुरु कर दिया. उन्होंने पूछा कि यूरोप की सुरक्षा की जिम्मेदारी नैटो के द्वारा अमेरिका क्यों वहन करें (नैटो में सबसे ज्यादा निवेश अमेरिका का है)?

साथ ही, अमेरिकी उद्योगों और कृषि जगत द्वारा यूरोप और चीन को किए जाने वाले निर्यात पर उन्हें अमेरिका में होने वाले आयात की तुलना में अधिक ड्यूटी क्यों देना पड़ती है?

इसके अलावा, राष्ट्रपति ट्रंप संयुक्त राष्ट्र का बजट कम करते जा रहे हैं; सुरक्षा परिषद में यूरोपियन देशों को लताड़ लगवा रहे हैं; और मानवाधिकारों पर उन्होंने यूरोप से अलग राय रखी है. उदाहरण के लिए उन्होंने माइग्रेशन और क्लाइमेट चेंज समझौते से अमेरिका को अलग कर लिया है.

पांचवा, भारत अब विश्व की पांचवी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था हो गया है. पहले चार नंबर पर अमेरिका, चीन, जापान, और जर्मनी है. अगर विकास की यही दर रही, तो अगले 15 वर्षों में चीन विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था हो जाएगी, उसके बाद अमेरिका और भारत हो जाएगा.

एक समय के लिए सोचिए कि अगले कॉमनवेल्थ सम्मेलन में ब्रिटेन नहीं बल्कि भारत कॉमनवेल्थ देशों की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होगा. लेकिन पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और विश्व में एक महान सैन्य शक्ति होने के बावजूद भी भारत सुरक्षा परिषद का स्थाई सदस्य नहीं है.

अतः आज के युग में पश्चिम को अपनी शक्ति और प्रभाव में क्षय को स्वीकार करना होगा. अगर वह पिछली शताब्दी जैसे दबदबे को बनाए रखना चाहता है, तो उसे अनैतिक रास्ता अपनाना होगा, अपने द्वारा थोपे मानवाधिकारों का हनन करना होगा और लोकतंत्र की उपेक्षा करनी होगी; और शायद विश्व की उभरती शक्तियों जैसे चीन और भारत से टकराना होगा.

ऐसे सामरिक परिप्रेक्ष्य में भारत को एक मज़बूत सरकार और प्रभावशाली नेतृत्व की आवश्यकता है जो प्रधानमंत्री मोदी दे रहे हैं और आगे भी देते रहेंगे. उन पर भरोसा बनाए रखिए.

जिन्हें जनता से खतरा था, उन्होंने विकसित ही नहीं होने दिए यात्रा और संचार के साधन

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY